Monday, October 14, 2013

क्यों जलाते हो रावण को ..............

रावण एक अति बुद्धिमान ब्राह्मण के साथ-साथ महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था। इन सब के बावजूद वह एक दलित व शुद्र भी था। जिसने अपना होश संभलते ही देखा कि बाहुबली लोग (देवतागण) सदियों से हमारे समुदाय के लोगों पर अत्याचार व अधिकारों को दोहन करते आ रहे हैं। ताकि यह हमेशा निम्न ही बने रहें, कभी उभर न पाएं। इन निम्नता को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए रावण ने इन बाहुबलियों से न जाने कितनी बार युद्ध किया। तब जाकर रावण के समुदाय को एक पहचान मिल सकी। क्योंकि इन बाहुबलियों ने साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति के चलते हमेशा इनके अधिकारों दमन किया ताकि यह सर न उठा सके। परंतु यह कब तक मुनासिब था। कोई तो इस अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करता। रावण ने भी वो ही किया जो एक बुद्धिमान और पराक्रमी योद्धा को करना चाहिए था, अपने अधिकारों के लिए युद्ध।
रावण का अपने समुदाय, जाति के अधिकारों को पाने के लिए युद्ध करना इन बाहुबलियों को कभी गवारा न हुआ। तभी तो समय-समय पर बाहुबली अपनी निछता दिखाते रहे, जिसका जबाव रावण ने बखूबी दिया। अपनी-अपनी हार को बर्दास्त न कर पाने के चलते यह सभी बाहुबली एक हो गए। ताकि रावण का खात्मा किया जाए। परंतु सब विफल ही रहे।
जैसा कि सभी को ज्ञात है कि रावण की बहन का शूपणखां था। शूपणखां एक अति सुंदर और गुणवान युवती थी। जिसका रंगरूप देखकर कोई भी मोहित हो सकता था। एक बार वह अपनी सेहलियों के साथ वन विहार करने निकली। तभी वनवास काट रहे राजा दशराथ के दोनों पुत्र राम-लक्ष्मण की दृष्टि शूपणखां पर पड़ी। दृष्टि पड़ते ही दोनों मोहित हो गए। तभी इन्होंने शूपणखां से छेड़खानी करना तथा अभद्रतापूर्ण व्यवहार करना आरंभ कर दिया। अपनी अस्मत को बचाने के लिए उसने पुरजोर कोशिश की। अपनी इच्छापूर्ति न देखने हुए लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। ताकि वो किसी को भी अपना मुंह न दिखा सके और न ही यह बता सके कि उसके साथ ऐसा कुछ हुआ है। अब आप ही बताएं कि किसी की बहन के नाक-कान काटकर कुरूप बना देने पर कौन-सा भाई चुप बैठ सकता है। रावण भी चुप नहीं बैठा, उसने प्रतिज्ञा ली कि जैसा राम-लक्ष्मण ने मेरी बहन के साथ किया है मैं भी ठीक वैसा ही करूंगा। बाद में उसे ज्ञात हुआ कि राम-लक्ष्मण के कोई बहन नहीं है। और वो दोनों अपनी कारगुजारियों को अंजाम देने के बाद अपनी पत्नी सीता जो उनके साथ वनवास में थी उसको अकेला छोड़कर वहां से भाग निकले। तब रावण ने राम की पत्नी सीता को केंद्र में किया और उसका अपहरण कर लिया। ताकि राम अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए जरूर आएगा तभी उससे और उसके भाई से अपनी बहन का बदला लूंगा।
परंतु इन दोनों ने जंगल से भाग कर सभी बाहुबली को झूठा संदेश दिया कि रावण अब बहू-बेटियों को अपना शिकार बनाने लगा है। जब सभी बाहुबलियों ने राम और लक्ष्मण का साथ देना उचित समझा, जिससे उनकी बहू-बेटियों सुरक्षित रह सके। वहीं रावण सीता का अपहरण करके उसे अपने महल में बनी एक अशोक बाटिका ले जाकर बंद कर दिया। जहां वह कुछ सालों तक रही। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा था कि हे सीते! तुम्हारा पति तुमको छोड़कर भाग गया है अगर चाहों तो तुम मेरी पत्नी बन सकती हो और यदि तुम मेरे प्रति कामभाव नहीं रखती तो मैं तुझे कभी स्पर्श नहीं करूंगा। अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण ने मर्यादा का ही आचरण किया है। वह चाहता तो सीता के साथ जोर-जबर्दस्ती भी कर सकता था। परंतु उसने ऐसा कदापि नहीं किया क्योंकि उसमें शिष्टाचार व ऊंचे आदर्श वाली मर्यादाएं मौजूद थीं और वह नारी का मान-सम्मान करना जानता था। वह इन बाहुबलियों के जैसा नहीं था (इंद्र जैसा )जो दूसरों की बहू-बेटियों के साथ बलात्कार करते रहते थे और उनको किसी प्रकार की कोई सजा नहीं मिलती थी। अगर इंद्र की बात करें तो एक अय्याश, दारूबाज, जिसके यहां लड़कियों का नंगा नाच होता था और जहां सभी बाहुबली अपनी-अपनी कामवासना की पूर्ति करते रहते थे। अगर इंद्र को दल्ला कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। जो अपनी गद्दी को बचाने के चक्कर में हमेशा ही इन बाहुबलियों का आवभगत में जुटा रहता था। जिसकी गद्दी को रावण के पुत्र मेघनाथ ने युद्ध में जीत लिया था। जिसको पाने लिए उसने भी अपने सारे लोग राम-लक्ष्मण के पक्ष में खड़े कर दिए।
चूंकि लंका जहां सीता को हरण कर रावण ने रखा था वो भारत से बहुत दूरी पर था। जहां तक पहुंचना नमुमकिन ही था। परंतु इन लोगों ने रात-दिन एक करके समुद्र पर सेतु का निर्माण किया ताकि लंका तक पहुंचा जा सके। कई महीनों के बाद सेतु बनकर तैयार हो सका। तब सब लोगों ने राम-लक्ष्मण के साथ लंका पर चढ़ाई कर दी। जब रावण को इसकी सूचना मिली कि एक विशाल बाहुबलियों की सेना ने लंका पर चढ़ाई कर दी तो वह जरा भी नहीं डिगा और उसने युद्ध करना ठीक समझा। परंतु रावण के छोटे भाई जो विशाल सेना को देखकर भयभीत हो चुका था उसने राम से हाथ मिलना ही मुनासिब समझा। और वह राम से जा मिला। राम से मिलने के बाद उसने राम से एक शर्त रखी की जीतने के उपरांत आप मुझे ही इस लंका का अधिपत्य सौंपेंगे। तब मैं आपको रावण की सारी कमजोरियों को बताउंगा, जिससे आप उसको मार सकते हैं। राम को विभीषण की बात मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था तो उसने हामी भर दी। फिर विभीषण बताता गया और राम और उसकी सेना उन कमजोरियों पर हमला करती गई। एक के बाद एक विभीषण ने रावण के सारे पुत्रों को मरवा दिया और साथ में अपने भाई कुंभकर्ण को भी। अब रावण अकेला बचा तो उसने स्वयं ही रणभूमि में जाने का निणर्य किया परंतु अपने हथियार नहीं डाले। और राम से युद्ध करते-करते वो मार गया। यानि एक और प्रतापी शुद्र का इन दबंग लोगों ने दमन कर दिया।
रावण के मरने के उपरांत जैसा कि राम और विभीषण में तय हुआ था वैसा ही हुआ। राम ने विभीषण का राज्याभिषेक करके उसके लंका सिंहासन सौंप दिया। सिंहासन सौंपने के बाद उसने अपनी पत्नी को भी अशोक बाटिका से मुक्त कराया। अब उसके मन में यही भाव चलते रहे क्या मेरी पत्नी सीता अब भी पतिव्रता ही है तो अपनी शंका का दूर करने के लिए उसने उसको अग्नि पर चलवाया। अग्नि पर चलवाने के बाद वह सीता को लेकर वापस अपने राज्य आ गया। जहां कुछ लोगों की टीका-टिप्पणी के चलते उसने अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया। जैसा सदियों से यह बाहुबली करते आ रहे थे।
इस लेख को लिखने के बाद कुछ सवालात मेरे जहन में अभी भी बरकरार हैं अगर आपके पास इन प्रश्नों को जबाव हो तो मुझे देने की कृपा करें-
1.क्या अपने अधिकारों के प्रति लड़ना गलत है?
2.किसी की बहन के साथ कुछ गलत होगा तो क्या भाई चुप बैठ सकता है?
3.इंद्र बलात्कार करके साफ बच निकलता है फिर भी उसे क्यों पूजा जाता है?
4.क्या विभीषण को अपनी जान व सिंहासन को मोह नहीं था? अगर नहीं तो उसने अपने भाई रावण का साथ न देकर राम का साथ क्यों दिया?
5.राम ने सीता की अग्नि परीक्षा क्यों ली?
6.राम ने सीता को घर से क्यों निकाला?
7.क्या आज जो विजय दशमी मनाई जाती है यह दलित पर बाहुबली की जीत के लिए तो नहीं मनाई जाती?
8.क्या नारी का अपमान करने वाला भगवान हो सकता है?
ऐसे बहुत सारे प्रश्न मेरे मन में हमेशा से उठते रहे हैं और उठते रहेंगे? क्योंकि रावण, रावण ही था और रावण ही रहेगा! जिसके पुतलों को जलाना नहीं बल्कि उनकी पूजा करनी चाहिए.................

Wednesday, October 9, 2013

मोल की खबरें, खबरों का मोल

मोल की खबरें, खबरों का मोल

मीडिया एक, चेहरे अनेक। अनेकता में एकता सजोए हुए हमारा मीडिया। जिसके परिप्रेक्ष्य में लगातार मीडियाविद् का कथन, उसके कारनामों पर हमेशा पर्दा डालते हुए कहा जाता रहा है कि वो तो अभी बच्चा है। परंतु उन्हें अब मामूल हो जाना चाहिए कि जिसके कारनामों को नादानी का नाम देकर छोड़ा जाता रहा है यह अब बच्चा नहीं रहा, बढ़ा हो चुका है। इसने जवानी की दहलीज पर अपने कदमों को रखने के साथ ही अपनी मर्यादाओं को लांघना शुरू कर दिया है यानी अब यह बेशर्म हो चुका है। वैसे मर्यादाएं तो इसने बचपन में ही लांघनी शुरू कर दी थी, क्योंकि किसी ने इस पर रोक लगाने या इसको दंड देने की कोशिश नहीं की, ताकि यह वक्त रहते सुधर तो जाता। अब यह बेशर्म बन चुका है। छुट्टा सांड़, जिस पर लगाम लगाना, बिल्ली के गले में घंटी बांधने के समान प्रतीत होता है। आखिर मुसीबत कौन मोल ले?
अभी विगत कुछ दशकों से इसके एक चेहरे यानी पेड न्यूज पर बहुत सारी बहसें देखने और सुनने को मिलती रही हैं। वैसे पेड न्यूज का जिक्र इतिहास के पन्नों में भी मिलता है। जिससे यह ज्ञात होता है कि यह कोई नई विधा नहीं है इसका प्रयोग मीडिया सदियों से अपने हित के लिए करता आ रहा है। पहले यह लुकछिप कर होता था, परंतु वैश्विकरण के दौर में इसका उपयोग खुलेआम होने लगा है। पेड न्यूज एक ऐसा बहुरूपिया है जो समय-समय पर अपना रूप बदलता रहता है। जिसका प्रतिरूप को वर्तमान सामाजिक यथार्थ में साफ देख सकते हैं कि किस प्रकार मीडिया पर हावी बाजारीकरण इनकी आर्थिक जरूरतों की पूर्ति करता है। इस पूर्ति हेतु मीडिया अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों से भटकता जा रहा है और पेड न्यूज का सहारा ले रहा है।
हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि मीडिया की प्रक्रियाओं में प्रकट या अप्रकट रूप से नियंत्रण का तत्व मौजूद रहता है। इस नियंत्रण की प्रक्रिया को ढ़ाल बनाकर मीडिया अपना हित साधने में सदा ही प्रत्यनशील रहा है। जिसके लिए कीमत का कोई मोल नहीं होता। मीडिया में दावन की भांति हावी पेड न्यूज आज एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। जिसके संदर्भ में चाहे मीडिया चिंतक हो, मीडिया विद् हो, विश्लेषक हो या फिर आलोचक सभी इस दावन रूपी बाजारवाद के प्रभाव से सकते में हैं, कि क्या होगा आने वाले समय में इस मीडिया का? वैसे पेड न्यूज मीडिया का एक चेहरा ही है। जिसमें मीडिया खबरों के स्थान को बेचकर अपना उल्लू सीधा करता है। परंतु अब एक और चेहरा जिस पर आज तक सभी की नजरें होते हुए भी किसी ने इसके खिलाफ आवाज उठाने की जहमत नहीं उठाई। चाहे वो मीडिया के ठकेदार हो या समाज।
मैं बात कर रहा हूं खबर के बदले दाम की। जी हां, खबर के बदले दाम। जिसको मैंने अपने पिछले लेख मैं मीडिया से बोल रहा हूं, में कुछ हद तक प्रतिबिंबित करने कोशिश की थी कि, किस प्रकार मीडिया कर्मी अपने दायित्वों का पूर्णतः से निर्वाहन न करते हुए खबरों को बेचने का काम कर रहे हैं। जितनी बड़ी खबर, उतना ज्यादा रुपया। खबर के बदले रुपया से आशय है कि ‘यह वो कीमत है जिससे पत्रकार अपना मुंह बंद रखते हैं और पूरी के पूरी खबर को डकार जाते हैं।’ और जहां से इनकों खबर के एवज में रुपए मिलने की दूर-दूर कोई संभावना नजर नहीं आती, या यूं कहा जाए कि डरा-धमकाने के बाद खबर से संबंधित व्यक्ति रुपए देने से इंकार कर देता है तो उसके खिलाफ बढ़ा-चढ़ाकर, नमक-मिर्च लगाकर खबरों को परोस दिया जाता है। साथ-ही-साथ उसका अगले अंक में फॉलोअप भी किया जाता है ताकि खबर से संबंधित व्यक्ति पर कार्यवाही करवा सकें। इस प्रकार नमक-मिर्च लगाकर, बढ़ा-चढ़ाकर खबरों को परोसना और उसका फॉलोअप करना, दूसरे लोगों को सींख देता है कि देखा उस शख्स से रुपया नहीं दिया था तो उसका हमने यह हश्र करवाया। अगर तुम्हारे से संबंधित भी कोई खबरें हमारे हाथ लगती हैं तो रुपया देना ही पड़ेगा, नहीं तो तुम्हारा भी यही हश्र होगा। क्योंकि मीडिया अब भौंकने के साथ-साथ काटने पर उतारू हो चुका है। अपनी सारी मर्यदाओं को तांक पर रखकर।
अब सवालात यह उठते हैं कि मीडिया के द्वारा परोसी तथा गौण की जा चुकी सभी खबरों व जानकारियों पर विश्वास किया जाए या नहीं? सोचना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि एक तरफ तो संपादक, संपादक नहीं प्रबंधक; जो मोल के बदले खबर को प्रकाशित/प्रसारित करने के काम में लगे पड़े हैं तो दूसरी तरफ मीडिया कर्मी खबर के बदले मोल के प्रभाव में उन खबरों को दबा देते हैं जो समाज के सामने आनी चाहिए थी। जिस पर आज तक किसी भी मीडिया अखबार, चैनल ने कभी चर्चा-परिचर्चा करने की जहमत नहीं उठाई, और न ही इसको खत्म करने की कभी वकालत की। इसके मूल में जो भी हो या रहा हो, परंतु मीडिया अपने सामाजिक सरोकर से इतर होकर अपनी नैतिकता भूलता जा रहा है, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मीडिया को शर्मसार करने के लिए काफी है। यह स्थिति देश और समाज दोनों के हित में नहीं है। क्योंकि, जिस प्रकार मोल की खबरों तथा खबरों का मोल दोनों को बढ़वा दिया जा रहा है। उससे साफ प्रतीत होता है कि मीडिया और मीडिया कर्मी अपनी भूख मिटाने के चलते अपनी नैतिकता दांव पर लगाते जा रहे हैं। यह कहीं न कहीं मीडिया की प्रतिष्ठा पर एक बदनुमा दाग के समान ही उभर कर सामने आया है। जिसको किसी भी सर्फ एक्सल या टाइड से क्यों न धोया जाए, साफ नहीं हो सकता।

Sunday, October 6, 2013

मैं मीडिया से बोल रहा हूं

मैं मीडिया से बोल रहा हूं

ट्रिन.......ट्रिन.......... मैं, दैनिक.......... से बोल रहा हूं, टीवी चैनल........से बोल रहा हूं! इसी प्रकार फोन आता है.......... से बोल रहा हूं। बोलो... क्या सेवा कर सकता हूं आपकी? नहीं मैं मीडिया से बोल रहा हूं। अरे भाई मीडिया नामक इस विचित्र चीज में तो सभी कुछ समाहित है। अरे..... मैं फलां-फलां दैनिक या टीवी चैनल से बात कर रहा हूं। हां मैं समझ गया आप फलां-फलां  मीडिया से बात कर रहें हैं। तो मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? क्या लेना पसंद करेंगे???? सोना, चांदी, रुपया, पैसा, कपड़े, मिठाई बगैरह बगैरह। आप कैसी बात कर रहें हैं। अरे मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आप क्या लेना पसंद करेंगे???? चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, पान, सिगरेट, तबांकू या फिर थकावत उतारने के लिए अच्छी ब्रांड की शराब। आप मीडिया से ऐसी बातें कैसे कर सकते हैं? मैंने तो आपको इसलिए फोन किया है क्योंकि आप से संबंधित कुछ जानकारियां हमारे हाथ लगी हैं। अच्छा जी ठीक है...... तो मैं आपकी किस प्रकार से सहायता कर सकता हूं। आप मेरी बात समझ नहीं रहे हैं? मैंने आपको आपसे संबंधित जानकारी के लिए फोन किया है कि हमारे पास आप से जुड़ी यह-यह जानकारी हैं। अब इसका क्या करना है, आप बताएं। मैं क्या बताऊं आपको? वैसे आप जानकारियों का करते क्या हैं......... अपने दैनिक में या टीवी चैनल पर प्रकाशित/प्रसारित कर देता हूं। जिससे संबंधित व्यक्ति की नौकरी खतरे में आ जाती है और बहुत बार तो उसके ऊपर भी तलवार लटकने लगती हैं। अच्छा........... आपके पास तो बहुत ही पावर है.....।
वैसे मैंने आपके ऑफिस में, दफ्तर में, विभाग में फलां-फलां व्यक्ति से संबंधित, जानकारी से संबंधित, खबरों व सूचनाओं की जानकारी हेतु आपको फोन किया है। अच्छा...अच्छा, जानकारी के लिए। हां जानकारी के लिए.........। तो पत्रकार महोदय आप किस विषय से संबंधित जानकारी लेना चाहेंगे?? राजनीति, अपराध, खेल, भ्रष्टचार, आंदोलन, विकास, योजनाएं और रेल, बस, सड़क, मूर्ति, विद्यालय, विश्वविद्यालय, अस्पताल आदि आदि। जो भी मिल जाए? जो भी मिल जाए से मतलब मैं, कुछ समझा नहीं। आप कौन सी वीट देख रहे हैं यह तो बताएं। अगर आपकी वीट से संबंधित हमारे पास कोई जानकारी होगी जिसको आप खबर में तब्दील करके जनता को बेबकूफ बना सके तो हम आपको मुहैया करवा देंगे।
मुझे लगता है आप दिमाग से थोड़ खिसके हुए लगते हैं?? हां पत्रकार महोदय, मैं दिमाग से खिसका हुआ ही हूं क्योंकि आपको लगता है तो ठीक ही लगता होगा? अरे भई मैं तो साफ-साफ कोई जानकारी के बारे में पूछ रहा हूं आपको ज्ञात होना चाहिए कि मैं फलां-फलां मीडिया से बोल रहा हूं। और तुम मुझे जानकारी देने की वजह टाल-मटोल कर रहे हो। मेरे पास सूचना के अधिकार का अस्त्र भी है शस्त्र भी, समझे...........। हां जी, समझ गया। वैसे आपको कौन नहीं जानता, आपके पास सूचना के अधिकार का अस्त्र भी है और शस्त्र भी। आप इससे किसी की भी मां-बहन कर सकते हैं। यह भी मैं भलीभांति जानता हूं और मैं आपको सूचना देने में कैसे टाल-मटोल कर सकता हूं। आपके पास तो मीडिया की पावर है जिसका तंबूरा लेकर आप कहीं भी घुस जाते हैं, किसी की भी छोटी-मोटी खामियां देखकर उसकी खटिया खड़ी करने पर उतारू हो जाते हैं। उसको दबाने लगते हैं और दबा ही लेते है। पावर जो हैं आपके पास, मीडिया का। मुझे लगता है कि तुम्हारे खिलाफ कोई दो-चार काॅलम की या ब्रेकिंग न्यूज चलवानी पड़ेगी। मेरे पास तुम्हारे खिलाफ बहुत-सी जानकारियां जो हैं जिसमें तुम फंस सकते हो। नहीं-नहीं भई ऐसा मत करना, मेरे छोटे-छोटे बच्चें हैं और एक बीबी भी है। मेरी नौकरी चली जाएगी..........मेरे बाल-बच्चों का क्या होगा? तब ठीक है तुम्हारे परिवार के खातिर चुप हो जाता हूं पर खबर को दबाने के लिए कुछ चढ़ौत्री मेरा मतलब दान-दक्षिणा तो अपर्ण करनी पड़ेगी। संपादक को क्या कहूंगा? अच्छा बताओं कितना?? इतना-इतना। ओह....... यह तो बहुत हैं। अरे भई मंहगाई भी तो बढ़ गई है। इसमें से इतना विज्ञापन के लिए, इतना संपादक महोदय का और उसमें से जो थोड़ा बच जाएगा वो मेरा। मुझे तो बस इतना ही मिलेगा। और मैं किसी दूसरे मीडिया से बोलूंगा भी नहीं। सोच लो समझ लो, अगर नौकरी रहेगी तो और भी कमा लोगें, रुपयों का मुंह मत देखों, बाल-बच्चों का देखों। ठीक है यह लो.........। अगर और कोई जानकारी हो तो हमें जरूर बताना। हमारा नंबर लिख लो... नाईन वन वन वन वन वन शून्य चार दो शून्य (09111110420)।
ट्रिन.......ट्रिन, मैं फलां मीडिया से बोल रहा हूं। हां आप भी बताएं.......मैं आपकी किस प्रकार सेवा कर सकता हूं?? हमें आपके बारे में जानकारी हाथ लगी है.........। ओह तो आपको भी मेरे बारे में जानकारी हाथ लगी हैै। हां जी आपके बारे में.....। तो आप क्या लेंगे? मैं कुछ समझा नहीं......................। इसमें समझने की क्या बात है। ले देकर निपटा लेते हैं। तब ठीक है। लिया-दिया और निपट गया।
ट्रिन.......ट्रिन, मैं फलां मीडिया से बोल रहा हूं................................................. हां जी आप भी लूट लो, क्योंकि आपको मेरे बारे में जानकारी हाथ लग गई है। मेरे बाल-बच्चें हैं। आपको नहीं दूंगा तो आप मेरी नौकरी खा जाओंगे। क्योंकि आप मीडिया से बोल रहे हो। मीडिया न हो गया, खाला का घर हो गया जिसको जब मन आता है लूट ले जाता है। वाह रे मीडिया...........................?????

Thursday, October 3, 2013

जंगल का सरदार

जंगल का सरदार

आज में आप सबको एक कहानी सुनाने जा रहा हूं। अच्छी या बुरी जैसी भी लगे कृपया सूचित अवश्य करें। वैधानिक चेतावनी के साथ प्रस्‍तुत एक लेख- इस कहानी के सभी पात्र, घटनाएं व स्‍थान कालपनिक हैं इनका किसी से भी कोई सरोकार नहीं है। अगर इस कहानी का कोई भी अंश किसी पात्र या घटना से मेल रखता है तो इसे मात्र संजोग ही समझा जाएगा। वैसे इस लेख का सबसे पहले शीर्षक बकरा यानि सरदार.... यानि प्रधानमंत्री ? ? रखा गया था। जिसको बदल कर जंगल का सरदार कर दिया गया। क्‍योंकि मैं किसी भी प्राणी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। अगर इस आलेख से किसी की भावनाओं को जरा सी भी ठेस पहुंचती है तो मैं, तहे दिल से क्षमा प्रार्थी हूं।
एक जंगल है। जहां सभी प्रकार के जीव-जंतु यानि पशु-पक्षी रहते हैं। पहले इस जंगल पर बाहरी जंगल के प्राणियों का राज हुआ करता था। जिनके अत्याचारों और यातनाओं के साथ-साथ अपने जंगल को मुक्त कराने के बावत इस जंगल के सभी प्राणियों ने एकजुट होकर उनका सामना किया और अपने जंगल को उन दरिंदों से आजाद करवाया। आजाद करवाने के बाद पूरे जंगल के सामने एक ही मुद्दा था कि, जंगल का प्रधानमंत्री कौन होगा? हालांकि इसका चुनाव जंगल के प्राणियों को नहीं बल्कि कुत्ते, बिल्ली, लोमड़ी, शियार, गीदर, चील कौंवों, उल्लूओं, मगरमच्छों, घड़ियालों को करना था जो अपनी-अपनी राजनीति के कारण इस जंगल के मंत्री पद पर आसीन हो गए थे। इन सभी कुत्ते, बिल्ली, लोमड़ी, शियार, गीदर, चील कौंवों, उल्लूओं, मगरमच्छों, घड़ियालों ने कभी किसी को, तो कभी किसी को इस जंगल का प्रधानमंत्री बनाते रहे। हां यह बात और है कि कभी-कभी अच्छे व्यक्तित्व के धनी, ईमानदार, तोते जैसे भी इस जंगल में प्रधानमंत्री की शोभा बने। परंतु इनकी संख्या न के बराबर ही रही। जिस कारण यह जंगल ऐसे ही ढर्रें पर चलता गया।
वहीं 2003 में इस जंगल के सभी मंत्रियों के सामने एक बार पुनः वही स्थिति सामने आ खड़ी हुई कि, किस को आखिर इस जंगल का प्रधानमंत्री बनाया जाए। तभी सभी की निगाहें पास ही खड़े एक बकरे पर गई। जिसका नाम भूल से सरदार पड़ गया था। जो देखने में शांत, बोलने में शांत और कुछ करने में भी शांत ही रहता था। शायद इस बकरे पर भी गांधी जी के तीन बंदरों का असर था। जिसको इन मंत्रियों ने भांप लिया था। सभी ने सोचा की इस सरदार बकरे को ही प्रधानमंत्री बनाना मुनासिब होगा। नाम इसका चलेगा और काम हमारा। ठीक वैसा ही किया इन सबने। बकरे सरदार को जंगल का प्रधानमंत्री बना दिया गया।
कुछ समय के उपरांत इस जंगल के हालत ऐसे होते चले गए कि पड़ौसी जंगल के कुछ कुत्ते, बिल्लियां भी इस जंगल की सीमाओं का लांघकर गाय, बैलों, पक्षियों को अपना शिकार बनाने लगे। जिस पर इस बकरे का कोई बस नहीं चला। शायद सोचता होगा कि भाई-चारे से काम लिया जाए तो ठीक ही होगा। परंतु उसकी समझ में यह कभी नहीं आ पाया कि मेंढ़क को कितना भी नहला-धुला क्यों न लिया जाए, आखिर जाएगा तो कीचड़ में ही।
वैसे अपने जंगल में भी अब इस बकरे की स्थिति कुछ ठीक नहीं रह गई थी। जो भी कुत्ता, बिल्ली, गीदर, बंदर आदि आते इस बकरे को डरा-धमकाकर चले जाते। हालात तो ऐसे हो गए कि अब तो इन कुत्ते, बिल्लियों के बच्चे यानि पिल्ले, चूहे, बिल्ली और तो और बंदर भी अपनी हेकड़ी दिखाकर निकल जाते। यह सिर्फ उन सबका मुंह ताकता रहता। क्योंकि मुंह ताकने के सिवाय इसके पास और कोई रास्ता नहीं था। अगर विरोध करता तो कसाई के हाथों हलाल करवा दिया जाता। हालांकि नाम सरदार और काम प्रधानमंत्रियों वाला करने के कोई बकरा शेर नहीं बन जाता? रहेगा तो बकरा ही।
हालांकि कुछ समय के उपरांत फिर से इस जंगल के लिए प्रधानमंत्री की दावेदारी की जंग होने वाली है। जो तय करेगी कि कौन इस जंगल पर राज करेगा? अगर कोई शेर बना तो ठीक, यदि पुनः बकरा ही प्रधानमंत्री बना तो दो बातें होगीं। एक तो बाहरी प्राणियों के आंतक का खतरा सदैव ही मड़राता रहेगा, दूसरा शायद यह जंगल पुनः किसी बाहरी प्राणियों के कब्जें में चला जा सकता है। जिससे यह जंगल जहां से शुरू हुआ था वही फिर खत्म भी हो सकता है। अब देखना है कि इस जंगल का मुखिया कौन बनेगा?
इस जंगल की कहानी अभी पूर्णत: समाप्‍त नहीं हुई है बाकी अंश एक ब्रेक के बाद......

Wednesday, October 2, 2013

रुपया बनाम गांधी

रुपया बनाम गांधी

मैं कौन हूं, सभी जानते हैं। कभी इस हाथ तो कभी उस हाथ बदलता ही गया हूं मैं। मेरी ही वजह से लोग अपनी बहुओं को जिंदा जला देते हैं। मेरे ही कारण लोग अपहरण, लूट, डकैती, चोरी, खून-खराबा, भाई-भाई का दुश्मन बनने पर मजबूर हो जाते हैं। मुझे पाने और ज्याद से ज्यादा सजोंकर रखने के लिए हमारे नेता इस देश को और जनता को लूटने तक में जरा भी नही हिचकिचाते। मेरी कमी के कारण ही गरीब जनता कभी आत्महत्या तो कभी हत्या का भी सहारा ले लेती है। और तो और मेने न होने से वो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए किसी के बिस्तर की चादर बनने पर मजबूर भी हो जाते हैं। सब मेरे ही कारण हो रहा है।
हालांकि मेरे लोगों ने अपनी-अपनी सुविधानुसार कई नामों से सुशोभित भी कर रखा है। टका, रोकड़ा, राशि, पेटी, खोखा और तो और लोग मुझे प्यार से लक्ष्मी भी बुलाते हैं। हां मैं रुपया हूं, रुपया। मेरा एक नाम गांधी भी है। मेरे कई रंग, कई रूप भी हैं। लाल, हरा, कथ्थई, गुलाबी, आसमानी, लोग मुझे इस नाम से भी जानते हैं। वैसे मैंने कभी किसी एक हाथों की शोभा नहीं बढ़ाई। कभी इस हाथ तो कभी उस हाथ बदलता ही गया हूं मैं। मैं सब चीजों में परिवर्तित हूं। मेरे अस्तित्व के बिना एक पत्ता भी इस देश में नहीं हिल सकता। क्योंकि मैं गांधी हूं। रूका नहीं हूं इक पल भी, चलता ही चला जा रहा हूं। वर्षों हो गए हैं मुझे चलते, भागते हुए। मैं आगे-आगे, जनता मेरे पीछे-पीछे। भाग रही है, पगलों की तरह? मुझे पाने के लिए मरने-मारने पर उतारू। देखकर खुशी मिलती है मेने न होने पर भी मेरा अस्तित्व आज भी उसी तरह बरकरार है। हां कभी-कभी मुझे विदेशी ताकतों के सामने नीच जरूर होना पड़ता है। यह सब इन नेताओं का ही कियाधरा है जो मुझे आज तक विदेशी ताकतों से मुक्त नहीं करा पाए हैं। वैसे विदेशी ताकतों के सामने मेरी औकात सिर्फ और सिर्फ 37.55 प्रतिशत ही बची है। जिसको देखकर दुख होता है, रोना भी आता है। अब यह मेरे बस की बात नहीं रही, इसको सुधारने के लिए।

जैसा मैंने कहा कि, मेरे कई रंग रूप हैं, पहला रूप तो आप लोगों से ऊपर देख ही लिया है। दूसरा रूप से भी आप लोग भलीभांति परिचित होंगे? क्योंकि मैं गांधी हूं। मैं कभी-कभी दान करने वाली चीज बन जाता हूं। लूटने वाली चीज भी मैं और लूटाने वाली चीज भी मैं। मैं पहले कोठों पर, अब तो छोटी-बड़ी सभी तरह की पार्टियों में शराब, शबाव दोनों के लिए बिकना ही पड़ता है। और तो और कभी किसी के जिस्म को पाने के लिए, तो कभी बार बालाओं के ऊपर से निछावर होकर उसके पैरों के नीचे से भी गुजरना पड़ता है, मजबूरी है मेरी। और क्या कहूं टेबल के नीचे से, पर्दे के पीछे से, काम के एवज में, पाने के खातिर सब मेरा ही सहारा लेते हैं। क्योंकि मैं गांधी हूं। मुझे सभी लोग छुपा कर रखते हैं ताकि किसी की बुरी नजर न लग जाए। क्योंकि मैं गांधी हूं-मैं हूं तो तुम्हारा अस्तित्व बना हुआ है। मैं नहीं तो तुम सब फिर किसी के गुलाम बन सकते हो। इसलिए छोड़ना नहीं कभी मेरा दामन, पकड़े रहना, फैविकॉल से चिपकाकर। क्योंकि मैं गांधी हूं...............हां गांधी, यानि के रुपया।