Monday, May 27, 2013

दोगलेपन की राजनीति में लिप्त कांग्रेस सरकार

दोगलेपन की राजनीति में लिप्त कांग्रेस सरकार
कहते हैं मोहब्बत और जंग में सब जायज है। परंतु हम यह कैसे भूल जाते हैं कि मोहब्बत और जंग के साथ-साथ राजनीति में भी सब कुछ जायज है। यह एक ऐसी विधा है जिसमें कुछ भी नाजायज नहीं। यदि आप राजनीति से कहीं से भी कोई सरोकार रखते हैं तो साम, दाम, दंड, भेद इसके साथ-साथ जो भी कुछ रह जाता हो, बच जाता हो, या इसके इतर आपके द्वारा जो कुछ नया इजाद कर लिया गया हो, उसका आप आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं, वो भी बिना किसी रोक-टोक के। क्योंकि यहां कोई रोकने-टोकने वाला ही नहीं है। अगर इस परिप्रेक्ष्य में आगे कहा जाए तो यह शराब की जैसी है न छोड़ी जाए। यह वे लोग होते हैं जो शराब की खाली बोतल में भी पानी डालकर पी जाए। क्योंकि सब तो मिला के पीते हैं पानी शराब में, ये पी गए शराब में देश को मिलाकर। तभी तो इनको नेता कहा जाता है। नेता जो कुछ नहीं लेता, परंतु मौका पड़ते ही डकैतों की भांति सब कुछ लूट लेता है। 
वैसे नेताओं के परिदृश्य में बात करें तो हमारे समाज में दो तरह के नेताओं की जमात मौजूद है। पहला तो वह जिनके बाप-दादाओं की वजह से राजनीति विरासत में मिलती है और दूसरे वह जो अपने बलवूते पर राजनीति में कदम रखते हैं। इस असमानता के बावजूद इन नेताओं में एक तरह की समानता देखी जा सकती है वो भी राजनीति की। यानि गिरी हुई नीछ प्रकार की राजनीति की।
हालांकि नेता चाहे जो भी, हां जैसे बने हों उनका सिर्फ-और-सिर्फ एक ही मकसद होता है इस देश को जितना ज्यादा से ज्यादा लूटने कर अपना और अपने परिजनों के घरों को भरने का। चाहे जनता भाड़ में क्यों न चली जाए। पाकिस्तान, चीन हमारी छाती पर दिन-रात मूंग क्यों न दलें। इन नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
अगर राजनीति में वर्तमान सरकार की बात कही जाए तो इस सरकार ने हाल ही में अपने दूसरे कार्यकाल के चार साल पूरे किए हैं हां पूरे चार साल। जिस पर हमारे मूक प्रधानमंत्री ने कहा है कि इन चार सालों में विकास हुआ है। जीडीपी ग्रोथ बढ़ी है। परंतु उन्होंने यह बताने की जहमत नहीं उठाई, कि उनकी सरकार ने इन चार सालों में और क्या-क्या किया। उनको तो जनता को यह बता देना चाहिए था कि उनकी सरकार के नेताओं ने इन चार सालों में कितने घोटले किए हैं और किस प्रकार जनता का खून चूसा है। साथ-ही-साथ यह भी बता दिया होता कि इन अरबों-खरबों के घोटले कि रकम को किस हिसाब से और किस अनुपात में नेताओं में बांटबारा हुआ है। इसके साथ ही यह भी बता देना चाहिए था कि उनकी सरकार में किस-किस नेता ने विदेशी बैंकों में इन चार सालों में कितनी रकम जमा की है। परंतु यह नहीं बताया। विकास की बात करके चले गए, अपने बिल में।

वैसे तो सभी जानते है कि हमारे मूक प्रधानमंत्री सिर्फ एक पियादा मात्र है जिसको आगे रखकर कांग्रेस दोगलेपन की राजनीति का गंदा खेल खेल रही है। इस दोगलेपन के खेल के साथ अब कांग्रेस सरकार दिखावे की भी राजनति करने लगी है। क्योंकि वह चाह रही है कि आने वाले चुनाव तक उसकी छवि जनता के सामने साफ-सुधरी हो जाए, तभी तो उसने अपने कुछ नेताओं के सिर पर से अपना हाथ खींच लिया है। एक तो हमारे रेल मंत्री जिनके भतीजे की वजह से उनको इस्तीफा दिलाया गया। और दूसरे बीसीसीआइ के अध्यक्ष जिनके दामाद स्पॉट फिक्सिंग में फंसे होने के कारण सरकार उनको इस्तीफे देने पर जोर डाल रही है। ताकि वह यह कह सके कि हम दोषी लोगों को ही नहीं, उनके परिजनों के भी दोषी होने पर अपनी पार्टी से निष्कासित कर देते हैं। परंतु मेरी समझ में यह नहीं आया कि ‘करे कोई और भरे कोई’। यदि ऐसा ही है तो सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के रहनुमा को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि वह यह क्यों भूल जाती हैं कि उनके प्रिय दामाद पर भी घोलाटे तथा उनके लाडले पुत्र पर बलात्कार का आरोप लग चुके हैं। जिसको सरकार व कानून ने एक सिरे से नकार दिया। शायद इसी को राजनीति कहते है कि तुम करो तो रासलीला, हम करें तो करेक्टर ढीला। तुम करो तो चमत्कार और हम करें तो बलात्कार।

Monday, May 20, 2013

क्यों परेशान हो रहे हो?



क्यों परेशान हो रहे हो?

हमकों मालूम न था क्या कुछ है घर में बेचने को......... ज़र से लेकर ज़मीन तक हर चीज़ बिकाऊ है। ग़ालिब की यह चंद लाइनें आज आम जनता से लेकर लोकतंत्र के चारों स्तंभों कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। जिसने आज हमारे समूचे लोकतंत्र व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। चारों तरफ बाज़ारवाद हावी हो चुका है। सब-के-सब बिकने के लिए खड़े हैं बाज़ार में। बस खरीददार चाहिए, बोली लगाने वाला चाहिए। क्योंकि आज के परिप्रेक्ष्य में नेता से लेकर अभिनेता तक, वेश्या से लेकर खिलाड़ी तक सभी बिकाऊ हैं। फिर क्यों परेशान हो रहे हैं हम। चाहे वो पुलिस हो या मीडिया। आप सोच रहे होगें कि मैं किस मुददे पर चर्चा कर रहा हूं। तो बता दूं कि मैं मैंच फिक्सिंग में फंसे श्री के संत और अन्य खिलाड़ियों की बात कर रहा हूं। जिसको लेकर पुलिस और खास तौर पर मीडिया बहुत व्याकुल नजर आ रहा है। और वह न जाने कौन सा तानाबाना बुन रहा है, समझ से जुदा है।
वैसे यह कोई पहला मामला तो है नहीं, फिक्सिंग का। अगर श्रीसंत और अन्य खिलाड़ियों ने मैंच फिक्स कर भी लिया और उस एवज में चंद रुपए ले भी लिए तो क्या गुनाह कर दिया। हालांकि आईपीएल-6 में हो चुके करोड़ों के घोटालों और हर रोज हमारे नेताओं द्वारा किए जा रहे घोटालों से तो कम है। फिर भी कहीं न कहीं नेताओं द्वारा किए गए घोटालों से प्रेरणा लेकर इसने यह कदम उठाया होगा। क्योंकि आए दिन नेताओं द्वारा किए जा रहे घोटालों और मीडिया द्वारा उनकी प्रस्तुति का ढंग भी इस मैंच फिक्सिंग के जिम्मेवार हैं। क्योंकि नेता अरबों का घोटाला करते हैं और मीडिया दिखाता है कि फलां-फलां नेता ने इतने अरबों का घोटाला किया है। नेता को पुलिस ने उसके आवास से पकड़ लिया है। सरकार ने सीबीआइ जांच के आदेश दे दिए हैं तथा जांच के लिए एक कमेटी का भी गठन कर दिया है जो पूरे प्रकरण पर अपनी रिपोर्ट पेश करेंगी। वहीं कुछ दिनों के बाद अपने जेल कार्यक्रम के उपरांत यह नेता पुनः अपनी गद्दी की शोभा बढ़ाते नजर आ जाते हैं। होता क्या है कुछ नहीं। फिर इतनी हाय-तौबा आखिर क्यों?
सरकार को मैंच फिक्सिंग की रकम से कुछ दान-दक्षिणा या चढ़ौत्री चाहिए हो तो इस पर भी एक कर लागू कर दें और उसका नाम रख दें ‘मैंच फिक्सिंग टैक्स’। यानि खिलाड़ी व सटोरिए जितने रुपए में मैंच को फिक्स करेंगे उन रुपयों का 40 या 50 प्रतिशत टैक्स के रूप में सरकार को देना होगा। इससे सरकार भी खुश हो जाएगी और खिलाड़ी भी। इसके साथ-साथ सट्टेबाज भी तथा पुलिस व सीबीआइ को भी परेशान नहीं होगा पड़ेगा। अगर वास्वत में मैंच फिक्सिंग से सरकार तिलमिला रही है तो पहले उसे अपने गिरेवान में झांककर देखने होगा कि उसके दामन में कितने दाग लगे हैं और लगते जा रहे हैं।
मेरे हिसाब से तो जितना रुपया मैंच फिक्सिंग में इन खिलाड़ियों को मिला है उतना रुपया जब्त करके छोड़ देना चाहिए इन खिलाड़ियों को। परंतु नहीं इन खिलाड़ियों की कोई भी वकालत क्यों नहीं कर रहा समझ से परे लग रहा है। हां वैसे हमारे काटजू साहब को तो इन खिलाड़ियों का पक्ष लेना चाहिए था वो भी नदारत नजर आ रहे हैं। शायद कोई कानून तलाश कर रहे होंगे इन खिलाड़ियों के पक्ष में बोलने तथा इनकों बचाने के लिए। ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। हालांकि मैं इसके पक्ष में कदापि नहीं हूं फिर भी लगने लगा है कि समाज अपने विनाश की ओर अग्रसर हो चुका है। तभी तो इसकी लौ का अपने पुरजोर तरीके से फड़फड़ा बदस्तूर जारी है। अब देखना बाकी है कि कब इसका पूर्णतः अंत या विनाश होगा। क्योंकि सभी कुछ खरीद लिया इन खरीददारों ने।

Thursday, March 28, 2013

एक के साथ एक ऑफर

http://gajendra-shani.blogspot.in/2013/03/blog-post_28.html

एक के साथ एक ऑफर
मेरे द्वारा लिखे जाने वाला यह लेख पूर्णत: काल्‍पनिक है इसका किसी जीवित व मृत  व्‍यक्ति से कोई सरोकार नहीं है। यदि इस लेख द्वारा किसी की भावना को आहत पहुंचता है तो इसके लिए मैं तहे दिल से क्षमा चाहता हूं।
क्या आप बलात्‍कार नहीं कर पा रहे हैं..?? क्या आपका दिल दिमाग बलात्‍कार के लिए परिपक्‍य नहीं है..?? क्‍या आप नाबालिग हैं... ?? क्या आपका साहस, हिम्‍मत इसके लिए जबाव नहीं दे रही है.....?? या फिर बलात्‍कार के बाद पकड़े जाने का भय सता रहा है... ??
तो इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं... इंटरनेट संस्‍थान लाया है आपके लिए एक नया और शानदार xxx का चमत्‍कारी यंत्र। अरे चमत्‍कारी यंत्र नहीं बलात्‍कारी यंत्र। इसको देखने मात्र से कोई भी सभ्‍य पुरूष कुछ ही मिनटों में इतना उत्‍तेजित हो जाएगा कि उसके अंदर बलात्‍कार करने की प्रवृत्ति सिर उठाने लगेगी। और आप खुद व खुद बलात्‍कार के लिए प्रेरित हो जाएंगे। इसके शानदार और जल्‍द लाभकारी होने की वजह से पूरा समाज आपसे नफरत करने लगेगा और यह भी हो सकता है कि बलात्‍कार के बाद आप पकड़े भी जाए, इसकी भी आप चिंता न करें इसके लिए फरकार लाया है भ्रष्‍टाचार बढ़ाओं यंत्र।
मैं बहुत परेशान था हर रोज किसी न किसी ने द्वारा बलात्‍कार करने की खबर सुनता रहता था। और कभी-कभी पकड़े जाने की भी खबर सुनता था। मेरी हिम्‍मत जबाव नहीं दे रही थी..मैं बहुत निराश हो गया था.. जब भी कोशिश करता दिल दिमाग काम करना बंद कर देता था... फिर मुझे मेरे एक दोस्त पपलू ने इंटरनेट संस्‍थान के xxx बलात्‍कारी यंत्र के बारे में बताया.. आप यकीन नहीं मानेंगे ये शानदार है... इसके इस्‍तेमाल से, इसका चमत्‍कार कुछ ही क्षण में देखने का मिला और अब मेरे अंदर भी बलात्‍कार करने की उत्‍तेजना आ चुकी है। इसके साथ-साथ यदि मैं बलात्‍कार करने के बाद पकड़ा भी जाता हूं तो फरकार का भ्रष्‍टाचार यंत्र मेरी रक्षा करेगा। ये तो वाकई कमाल हो गया। हैं न एक के साथ एक ऑफर।
इस xxx  बलात्‍कार यंत्र की कीमत है 10000 जी नहीं 5000 नहीं, इसकी कीमत है सिर्फ 30 रूपए से लेकर 125 रुपए.. यदि आपको पकड़े जाने का भय है तो इसके लिए आप ले सकते हैं भ्रष्‍टाचार यंत्र। जिसकी कीमत आप नहीं सामने वाला निर्धारित करता है। तो फिर देर न करें, अभी कॉल करें, अगर आप अभी कॉल करते हैं तो आपको 10 % डिस्काउंट भी दिया जाएगा... यह भुगतान आप अपने एटीएम कार्ड से भी कर सकते हैं। तो बिलकुल देर ना कीजिए.. हमें तुरंत कॉल कीजिए....
सभी आर्डर G.P.S द्वारा भेजे जाएंगे...

Wednesday, March 27, 2013


हे बलात्कारी पुरुष

हमारे समाज और पुरुष वर्ग के बीच से ही उत्पन्न यह अजीमोंशान कामांध व्यक्तित्व के धनी, ये चंद लोग जिनकी संख्याओं में लगातार इजाफा होता जा रहा है। जिनकी हिम्मत की मैं दाद देना चाहता हूं, क्योंकि इन चंद लोगों की कारगुजारियों से समाज व हमारा मीडिया, हम सब को प्रतिदिन रूबरू करवाता रहता है कि फलां व्यक्ति ने आज बलात्कार किया। कितना अच्छा काम है बलात्कार करना? वो भी बिना किसी रोक-टोक के, बिना किसी भय के। वैसे इन बलात्कारियों की कोई अलग से पहचान नहीं होती, कि फलां व्यक्ति बलात्कारी है या हो सकता है। यह तो हम और आप के बीच में रहने वाला इंसान ही है जो मात्र अपनी हवस व शारीरिक पूर्ति को पूरा करने के एवज में चाहे वह नाबालिग बच्ची हो या वृद्धा, उसे अपना शिकार बना लेता है। उसे वह नोचता है, खसोटता है और पूर्ण पुरुष होने का प्रमाण देता है। वहीं पीड़िता के हाल की मत पूछो और पूछने से फायदा ही क्या। क्योंकि उसके दर्द को हम सब महसूस नहीं कर सकते। अगर पूछना है तो उस बलात्कारी से पूछो, कि उसके अंदर कैसे बलात्कार करने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया। यह अचानक उत्पन्न हुई या फिर इस कृत्य को करने की वह पहले से ही रणनीति अपने कुंठित मस्तिष्क में बना चुका था। जिसके बाद वह केवल मौके की फिराक में था कि कब मौका हाथ लगे और मैं बलात्कार को अंजाम दूं। बलात्कार को अंजाम देने के उपरांत इन बलात्कारियों पर शोध करने की आवश्यकता है, कि बलात्कार करने के बाद वह कैसा महसूस करते हैं? और पीड़िता के बारे में उसके क्या विचार शेष हैं। क्या वह दुबारा बलात्कार करने के इच्छुक है, इसके साथ-साथ इस बात का भी अध्ययन करने की मुख्य रूप से जरूरत है कि ऐसे कौन-से हालात उत्पन्न हुए जिस कारण से उसे बलात्कार करने को मजबूर होना पड़ा।
हालांकि बलात्कार के बाद पीड़िता की मनोस्थिति का अवलोकन किया जाए तो समाज की एक हकीकत से हम सब परिचित हो जाएंगे कि किस तरह बलात्कार पीड़िता को ता-जिंदगी उस गुनाह की सजा भुगतनी पड़ती है जो उसके नहीं किया। इस सजा के दायरे में उसे जिंदगी भर उस समाज से व अपने परिजनों से नजरें झुकाकर रहना पड़ता है जिस समाज व परिवार में वह बेटी, पत्नी, मां आदि रूपों में अपनाई गई थी। आखिर गलती किसी की और सजा किसी और को। बड़ी नइंसाफी है। क्योंकि इन पीड़िताओं को इंसाफ तो मिलने से रहा, यह तो आप सब भलीभांति जानते ही होंगे?
ठीक है अब बलात्कार हो गया सो हो गया, क्यों हो हल्ला माचते हो, कि बलात्कारियों को फांसी की सजा होनी चाहिए? हल्ला मचाने की अपेक्षा इन बलात्कारी पुरुषों को किसी मंच पर विशिष्ठ अतिथि के रूप में बुलाकर उन्हें सम्मानित करना चाहिए साथ-ही-साथ उनके द्वारा अंजाम कार्यों को जनता तक प्रेषित भी करना चाहिए कि किस तरह इन बलात्कारी पुरुषों द्वारा अपनी हवस को शांत करने के लिए मासूम से लेकर वृद्धा तक को अपनी हवस का निशान बनाया है और उसकी इज्जत को सरेआम तार-तार किया है। वैसे यह कोई आसान काम नहीं है इसके लिए दिल, कलेजा, गुर्दा, हिम्मत और भी बहुत कुछ की जरूरत होती है, साथ-ही-साथ इस काम को कोई महान सोच वाला तथा शाक्तिशाली पुरुष ही अंजाम दे सकता है। जिसे समाज, कानून व्यवस्था और भारतीय दंड संहिता का दूर-दूर तक कोई भय न हो।
वैसे इन बलात्कारियों के लिए भारतीय दंड संहिता में सजा का प्रावधान है जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा-375 में बलात्कार के कृत्य को विस्तार से परिभाषित किया गया है। तो वहीं धारा-376 में बलात्कारी के लिए सजा का प्रावधान भी है। इसके अनुसार दोषसिद्ध हो जाने पर (जो लगभग-लगभग कभी सिद्ध नहीं होता, अपवादों को छोड़कर) बलात्कारी को 7 साल से लेकर अधिकतम उम्र कैद की सजा दी जा सकती है। वैसे आजकल बलात्कारियों को मृत्युदंड (फांसी) देने के प्रावधान पर कानून बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। जो शायद ही कभी बन सके? इस कानून के न बनने के पीछे मुख्य कारण हमारा पुरुष प्रधान समाज ही है जो कभी नहीं चाहेगा कि पुरुषों के खिलाफ कोई भी इस तरह का कानून बने, जो बाद में जाकर उनके गले की हड्डी साबित हो, जिसे न तो वह निगल सके न उगल सके।
हालांकि बलात्कार को दुनिया का जघन्यतम अपराध केवल-और-केवल कानून व्यवस्था के अंतर्गत ही माना गया है। अगर यह वास्तव में जघन्यतम अपराध की श्रेणी के दायरे में होता तो इसके ग्राफों में बाजारवाद की तरह लगातार वृद्धि नहीं देखी जाती। और इस तरह के कृत्यों पर पूर्णतः अंकुश लग गया होता। हां यह बात सही है कि बलात्कार जितना जघन्य अपराध होता है उतनी ही लंबी उसकी न्यायिक प्रक्रिया। वैसे भारत के थानों में रोजाना बलात्कार के सैकड़ों मामले दर्ज होते हैं। लेकिन दर्ज होने वाले मामले, वास्तव में होने वाले बलात्कार के मामलों के मुकाबले काफी कम होते हैं। इसका मुख्य कारण कि बलात्कार की शिकार महिला कोर्ट-कचहरी नहीं जाना चाहती, और बलात्कार को अपनी नियति मानकर चुप बैठ जाती है। पीड़िताओं की इस ‘चुप्पी’ के मूल में हमारा पुरूष प्रधान समाज और सामाजिक मान्यताएं भी काम करती हैं। हमारे समाज में बलात्कार की पीड़ित महिला को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता, उसका हमेशा ही तिरस्कार किया जाता है। इसलिए अधिकतर पीड़ित महिलाएं और उनके मां-बाप बलात्कार के बाद खून का घूंट पीकर चुप हो जाते हैं। और अगर वह इंसाफ के मंदिर में जाते भी हैं तो वहां उन्हें एक लंबा इंतजार करना पड़ता है। इस लंबे इंतजार के साथ-साथ उसे पुलिस से लेकर बाहुबली तक का भी सामना विभिन्न-विभिन्न परिस्थितियों में उस व उसके परिवार को करना पड़ता है। इन सब के उपरांत भी इंसाफ मिल जाए तो भगवान ही मालिक है।
तभी तो इसी लाचार पुलिस व्यवस्था व लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते हम आए दिन समाज में इन बलात्कारी लोगों के किस्सों को मीडिया के द्वारा रोजाना मुखतिब होते रहते हैं। यदि समाज सजग और कानून व्यवस्था सख्त हो जाए तो शायद बलात्कार के मामलों में कुछ हद तक कमी हो जाए। और आधी आबादी कुछ तो अपने आप को इस राक्षसी समाज से सुरक्षित महसूस कर सके। नहीं तो हे बलात्कारी पुरुष आप.........................।

Monday, March 18, 2013

फिल्म और संस्कृति


फिल्म और संस्कृति
भारतीय फिल्में अपने आरंभ काल से ही हमारे समाज का आईना रही हैं। जो समाज में हो रही गतिविधियों को समय-समय पर रेखाकिंत करती आई हैं। वैसे तो सभी जानते है कि भारतीय जगत में फिल्में बनाने का संपूर्ण श्रेय दादा साहब फाल्के को जाता है, जिन्होंने सन् 1913 में ‘राजा हरिश्चन्द्र’ फिल्म बनाकर फिल्मों का सूत्रपात किया और भारतीय सिनेमा को जन्म दिया। हालांकि दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित ‘राजा हरिश्चन्द्र’ मूक फिल्म थी फिर भी दर्शकों ने इसको बहुत पसंद किया। उसके बाद अर्देशियर ईरानी द्वारा सन् 1931 में पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ का निर्माण किया जिससे फिल्मी जगत में नई क्रांति उदय हुआ।
वैसे तो उस काल में अधिकांश फिल्में राजा-महाराजाओं के शौर्य व वीर गाथाओं पर बनाई जाती थी। इसके पश्चात धीरे-धीरे समाज में फैली बुराईयों पर भी आधारित फिल्मों का निमार्ण होने लगा। जिसका सकारात्मक प्रभाव हमारे समाज पर बखूबी देखने को मिला। हिंदी सिनेमा में नववास्तविकवाद तब दिखा जब विमल राय की दो बीघा जमीन, देवदास और मधुमती व राजकपूर की बूट पालिश, श्री 420 आई।  साठ के दशक में आई मुगल आजम ने नया रिकार्ड बनाया और सच्ची प्रेम कहानी को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया। उसके बाद जिस देश में गंगा बहती है, वासु भटटाचार्य की तीसरी कसम, देव आनन्द की गाईड सभी फिल्में समाज से जुडी हुई थी। उसके बाद ही भारतीय सिनेमा में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी। जिसमें युवा निर्देशिका मीरा नायर ने अपनी पहली फिल्म सलाम बाम्बे के लिये केन्स में गोल्डन कैमरा आवार्ड जीता। नब्बे के दशक में सूरज बडजात्या की फिल्म मैंने प्यार किया, हम आपके के कौन, हम साथ-साथ हैं और यशराज की दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे ने रोमांस, शादी के रीति-रिवाज और करवाचैथ की परिभाषा ही बदल दी। तब से हर नई विवाहिताओं को करवाचैथ का व्रत रखना भारतीय रिति-रिवाज में शामिल हो गया और हर नई विवाहित अपना पहला करवाचैथ बड़े ही धूमधाम से मनाती है। इसमें उपयोग होने वाली सामग्री की तैयारियां व्यापारी वर्ग महीनों पहले से करना प्रारंभ कर देते हैं।
अगर कहें तो आज से लगभग 25 से 30 साल पहले और आज के समाज और संस्कृति में अंतर साफ नजर आता है। पहले जब माता-पिता अपने बच्चों की शादी की बात करते थे तब बच्चों से कोई सलाह नहीं लेते थे, जिसका कारण मर्यादा थी। क्योंकि पहले माता-पिता का मानना था कि बच्चों के जीवन का सही गलत निर्णय लेना उनका काम है न कि बच्चों का। क्योंकि बच्चों को निर्णय लेने की समझ नहीं है। लेकिन आजकल माता-पिता हर छोटी-से-छोटी बात बच्चों से पूछकर ही करते हैं। जिसका कारण कही हद तक हमारी फिल्मों को ही जाता है। क्योंकि फिल्मों में वही जानकारी दिखाई जाती है, जो हमारे आसपास घटती हो रही होती हैं। फिल्मी परिदृश्य में जो भी काल्पनिक या सत्य घटनाओं पर आधिरित होती हैं वह हममें से ही किसी एक से कहीं-न-कहीं सरोकार जरूर रखती हैं। चाहे बच्चों की शिक्षा, बालिका शिक्षा, आगे बढ़ने का जुनून, कपडे पहनने का ढंग, रहने का तौर-तरीका, त्यौहार मनाने का ढंग सभी किसी-न-किसी से संबंधित होते हैं।
अब शादियों को ही ले लीजिये। पहले आम आदमी की शादियों में क्षेत्रीय रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिलती थी, क्षेत्र के अनुसार ही बरातियों का स्वागत, भोजन, कन्यादान और पहनावा हुआ करता था। लेकिन वर्तमान में फिल्मों को देखकर लोगों ने क्षेत्रीय रीति-रिवाजों को छोडकर फिल्मों में दिखाई जाने वाली संस्कृति को अपने परिवेश में ग्रहण करना शुरू कर दिया है। पगडी पहनने से लेकर बारातों में डीजे की धुन पर थिरकते देखा जाना अब आम बात हो चही है। अगर देखा जाये तो इस बदलाव से लाखों लोगों को रोजगार मिला है, जिसमें पढे़-लिखे युवाओं से लेकर दो जून की रोटी को तरसने वाले गरीब और महिलाएं भी शामिल हैं। भारत में एक साल में सिर्फ शादी का टर्न ओवर लगभग 50 अरब रूपएं है जिसमें 25 से 30 प्रतिशत की दर से प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है।
वर्तमान में अधिकतर फिल्में नए जमाने के युवाओं पर बनाई जा रही हैं, जिसमें युवा कंप्यूटर पर काम करता और मोबाइल पर बात करता दिखाया जाता है। फिल्म थ्री इडियटस में युवाओं की सोच के बारे में बताया गया है कि कैसे माता-पिता बच्चों पर इंजीनियर, डॉक्टर, वकील आदि बनने का दबाब बनाते हैं, जबकि उन्हें उसमें रूचि ही नहीं है। फिल्म तारे जमीन पर, कोई मिल गया, जिंदगी न मिलेगी दोबारा और हाल ही रिलीज हुई काई पो चे। अधिकतर फिल्मों में युवाओं की सोच दिखाई गई है, क्योंकि वर्तमान में युवाओं की सोच आज के दृष्टिकोण से अगल हटके तथा हमेशा कुछ नया करने के जज्बों से तल्लुकात रखती है।
यह बात सही है कि हम सोचते हैं कि बच्चे फिल्में देखकर बिगड रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है, कि फिल्में देखकर ही लोगों ने अपनी पुरानी मानसिकता और सोच बदली और बदलती चीजों को अपने चिंतन मन में जगह दी। क्योंकि पहले लोगों की सीमित सोच के कारण वह संकुचित व पुराने ढ़र्रे पर आधारित मानसिकता के गुलाम हुआ करते थे। लेकिन यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि भारतीय फिल्मों ने युवाओं को जीने का नया तरीका सिखाया है। सही और गलत में निर्णय लेना सिखाया है, और यह भी बताया है कि हर इंसान में कुछ-न-कुछ अगल होता है। जिसको केवल समझने की जरूरत होती है। और इस समझ के चलते वह अपने जीवन को प्रगति के पथ पर असानी से अग्रसरित कर सकता है।
हालांकि फिल्मों के सकारात्मक पहलु के साथ-साथ इसके कुछ नकारात्मक पहलु भी हमारे समाज के सामने परिलक्षित हुए हैं। वह हैं;- अश्लीलता, हिंसक प्रवृति और नैतिकता का पतन। जिनमें अश्लीलता प्रमुख रूप हमारे समाज में फैलती जा रही है जिसका सहयोग फिल्में भी कर रही है। आज कोई भी फिल्में को ले तो उसमें कुछ-न-कुछ अंश या पूरी कहानी व उस फिल्म के गाने अश्लीलता से परिपूर्ण होते हैं। जिसका हमारे समाज पर बुरा प्रभाव देखने को मिलता है। इसके साथ ही फिल्मों में जो ऐक्टिंग होती है वैसी ही ऐक्टिंग युवा घर पर करते हैं जिससे हिंसात्मक प्रकृति बढ़ती है। युवा फिल्म कहानी, गीत-संगीत हम देखते हैं, मार-धाड़ के दृश्य ज्यादा देखते हैं और देखते हैं अश्लीलता का चित्र। यह हिंसात्मक प्रवृत्ति आदर्श समाज बनाने में घातक है। जैसे फिल्मों में एक अदाकार दूसरे अदाकर को चाकू मारता है वैसी ही मार-धाड़ की सूटिंग युवा अपने घर में करते हैं। शिक्षा संस्थानों एवं सड़कों पर करते हैं। फिल्मों से बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं इसके साथ’-साथ आजकल अंग-प्रदर्शनकारियों की कीमत भी बढ़ गई है। फिल्म निर्देशक अंग-प्रदर्शन को कलात्मक कह रहे हैं। अंत में कहे तो फिल्म माध्यमों से समाज दूषित होता जा रहा है। इसे ठीक करना बहुत मुश्किल है। जो समाज के लिए बहुत घातक है।

जनसंचार माध्यम और युवा वर्ग


जनसंचार माध्यम और युवा वर्ग
जनसंचार का अर्थ जनता के बीच विभिन्न माध्यमों से किया जाने वाला संचार है। जनसंचार का वर्तमान समय इसके परिपक्व समाज की मनोदशा, विचार, संस्कृति आम जीवन दशाओं को नियंत्रित व निदेशित कर रहा है। इसका प्रवाह अति व्यापक एवं असीमित है। जनसंचार माध्यमों द्वारा समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त हो रहा है। स्वतंत्र जनसंचार माध्यम लोकतंत्र की आधारशिला है। अर्थात जिस देश में जनसंचार के माध्यम स्वतंत्र नहीं है वहां एक स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण होना संभव नहीं है। जनसंचार माध्यमों का जाल इतना व्यापक है कि इसके बिना एक सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
हालांकि जनसंचार माध्यमों में हाल ही कुछ वर्षों में एक क्रांति का उदय हुआ है जिसे हम संचार क्रांति कहते हैं। जनमाध्यमों में क्रांति के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी क्रांति आई है। जिसने मॉर्सल मैक्लुहान के वक्तव्य को पूर्णतः सत्य कर दिया कि संपूर्ण दुनिया एक गांव में तब्दील हो जाएगी। मनुष्‍य के बोलने का अंदाज बदल जाएगा और क्रिया-कलाप भी। ऐसा ही हुआ है, आज युवा रेडियों सुन रहा है, टेलीविजन देख रहा है, मोबाइल से बात कर रहा है और अंगुलियों से कंम्प्यूटर चला रहा है। कहने का मतलब यह है कि युवा एक साथ कई तकनीकों से संचार कर रहा है। संचार का विस्तृत रूप जनसंचार है। जनसंचार माध्यमों का युवा वर्ग पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में बाते करें तो हर एक विशय की तरह इसके भी दो रूप दिखाई पड़ते हैं- सकारात्मक और नकारात्मक।
अब मुख्य प्रश्‍न यह उठता है कि आज की युवा पीढ़ी जनसंचार माध्यमों के किस पहलू पर अधिक अग्रसरित हो रही है। सकारात्मक पहलू पर या नकारात्मक पहलू पर। यह बात सही है कि जनसंचार माध्यमों के द्वारा आज का युवा वर्ग अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति कर रहा है। युवाओं पर मीडिया का प्रभाव मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक कहें तो देश की तकरीबन 58 फीसदी आबादी युवाओं की है। ये वो वर्ग है जो सबसे ज्यादा सपने देखता है और उन सपनों को पूरा करने के लिए जी-जान लगाता है। मीडिया इन युवाओं को सपने दिखाने से लेकर इन्हें निखारने तक में अहम भूमिका निभाने का काम करता है। अखबार-पत्र-पत्रिकाएं जहां युवाओं को जानकारी मुहैया कराने का गुरू दायित्व निभा रहे हैं, वहीं टेलीविजन-रेडियो-सिनेमा उन्हें मनोरंजन के साथ आधुनिक जीवन जीने का सलीका सिखा रहे हैं। लेकिन युवाओं पर सबसे ज्यादा और अहम असर हो रहा है न्यू- मीडिया का। जी हां, इंटरनेट से लेकर तीसरी पीढ़ी (थ्री-जी) मोबाइल तक का असर यूं है कि देश-दुनिया की सरहदों का मतलब इन युवाओं के लिए खत्म हो गया है। इनके सपनों की उड़ान को तकनीक ने मानों पंख लगा दिए हैं। ब्लॉगिंग के जरिए जहां ये युवा अपनी समझ-ज्ञान-पिपासा-जिज्ञासा-कौतूहल-भड़ास निकालने का काम कर रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया साइट्स के जरिए दुनिया भर में अपनी समान मानसिकता वालों लोगों को जोड़ कर सामाजिक सरोकार-दायित्व को पूरी तन्मयता से पूरी कर रहे हैं। हाल में अरब देशों में आई क्रांति इसका सबसे तरोताजा उदाहरण है। इन आंदोलनों के जरिए युवाओं ने सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका का लोहा मनवाया तो युवाओं के जरिए मीडिया का भी दम पूरी दुनिया ने देखा। युवाओं पर इसका अधिक प्रभाव इसलिए पड़ा क्योंकि वे उपभोक्तावादी प्रवृति के होते हैं। वे बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी नई तकनीक का उपभोग करना शुरू कर देते हैं।
 यह कहना गलत नहीं होगा कि दूसरी ओर युवा वर्ग जनसंचार की चमक के माया जाल में फंसता जा रहा है। इस आलोच्य में कहा जाए तो युवाओं में तेजी से पनप रहे मनोविकारों, दिशाहीनता और कत्र्तव्यविमुखता को संचार माध्यमों के दुष्‍रिणामों से जोड़कर देखा जा सकता है। पश्चिम का अंधा अनुसरण करने की प्रवत्ति उन्हें आधुनिकता का पर्याय लगने लगी है। इनसे युवाओं की पूरी जीवन-शैली प्रभावित दिखलाई पड़ रही है जिससे रहन-सहन, खान-पान, वेषभूषा और बोलचाल सभी समग्र रूप से शामिल है। मद्यपान और धूम्रपान उन्हें एक फैशन का ढंग लगने लगा है। नैतिक मूल्यों के हनन में ये कारण मुख्य रूप से उत्तरदायी है। आपसी रिश्‍ते-नातों में बढ़ती दूरियां और परिवारों में बिखराव की स्थिति इसके दुखदायी परिणाम हैं।
इसी क्रम में बात करें तो अति आधुनिक संचार माध्यम जिसे हम न्यू मीडिया के नाम से जानते हैं वो भी जहां एक ओर युवाओं के लिए वरदान साबित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ये एक अभिशाप के रूप में युवाओं की दिशाहीनता को बढ़ा रहा है। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 30 जून, 2012 तक भारत में फेसबुक व सोशल साइटों के उपयोग करने वालों की संख्या लगभग 5.9 करोड़ है जो 2010 की तुलना में 84 प्रतिशत अधिक है। इन 5.9 करोड़ लोगों में लगभग 4.7 करोड़ युवा वर्ग से सरोकार रखते हैं। अगर आंकड़ों को देखें तो भारत दुनिया का चैथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है। इसमें दो राय नहीं कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं की निजता को प्रभावित किया है और युवा अपनी सोच से अपने समाज को प्रभावित कर रहे हैं।
वहीं इंडिया बिजनेस न्यूज एंड रिसर्च सर्विसेज द्वारा 1200 लोगों पर किए गए सर्वेक्षण जिनमें 18-35 साल की उम्र के लोगों को शामिल किया गया था। इसमें करीब 76 फीसदी युवाओं ने माना कि सोशल मीडिया उनको दुनिया में परिवर्तन लाने के लिए समर्थ बना रही है। उनका मानना है कि महिलाओं के हित तथा भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन में ये सूचना का एक महत्वपूर्ण स्रोत साबित हुई है। करीब 24 फीसदी युवाओं ने अपनी सूचना का स्रोत सोशल मीडिया को बताया। करीब 70 फीसद युवाओं ने ये भी माना कि किसी समूह विशेष से संबद्ध हो जाने भर से जमीनी हकीकत नहीं बदल जाएगी, बल्कि इसके लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
वास्तव में जनसंचार माध्यमों ने ग्लोबल विलेज की अवधारणा को जन्म दिया है। जनसंचार के अंतर्गत आने वाले माध्यम है पत्र-पत्रिकाए, टीवी, रेडियों, मोबाइल, इंटरनेट। युवा वर्ग पर इन सभी जनसंचार माध्यमों ने अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा है। इनका प्रभाव इतना शक्तिशाली है की आज के युवा इन जनसंचार माध्यमों के बिना अपने दिन की शुरुआत ही नहीं कर सकते। जैसे पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने से ज्यादा कामुकता तथा अश्लील साहित्य, पत्र-पत्रिकाएं खरीदता व पढ़ता है और अपने चरित्र का नैतिक पतन कर अपने भविष्य को अंधकार में डालता है। इसी प्रकार टीवी जैसे सबसे प्रभावशाली माध्यम का भी युवाओं पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का प्रभाव पड़ा है टीवी श्रव्य के साथ ही दृश्य माध्यम है जिसके कारण युवा वर्ग किसी भी विषय को भली-भांती समझ सकता है भले ही वह अधिक शिक्षित न हो परंतु युवा वर्ग इस माध्यम का भी दुरूपयोग कर नैतिक पतन करने वाले कार्यकर्मों को ही अधिक देखते हैं क्योंकि उनको तत्कालिक आनंद की प्राप्ति होती है और वे दूरगामी विनाश को नहीं समझ पाते जिससे उनका भविष्य बिगड़ता है।
हालांकि नई विद्या मोबाइल और इंटरनेट अत्याधुनिक तकनीकों के उदाहरण है। जिनका निसंकोच उपयोग अधिकांश युवाओं द्वारा किया जा रहा है। मोबाइल यह एक ऐसा माध्यम है जिससे दूर बैठे व्यक्ति के साथ बात की जा सकती है तथा अपने हसीन पलों को चलचित्रों के रूप में कैद किया जा सकता है। यह तो इसका सदुपयोग है परंतु आज युवा इस माध्यम का गलत प्रयोग कर एमएमएस जैसे दुर्व्यसनों में फस जाते हैं। इसी प्रकार इंटरनेट जनसंचार माध्यमों में सबसे प्रभावशाली है जिसने दूरियों को कम कर दिया है। इसका अधिकतर उपभोग युवा वर्ग द्वारा किया जाता है जहां इसके द्वारा युवाओं को सभी जानकारियां उपलब्ध होती हैं। ये ज्ञानवर्धन में तो सहायक है परंतु आज वर्तमान समय में युवा द्वारा इसका दुरूपयोग अधिक होता है। हालांकि संस्कारी व्यक्तियों द्वारा इस मीडिया का सही उपयोग किया जा रहा है वहीं लगभग 100 में से 85 प्रतिशत लोग पोर्न साइटों का प्रयोग करते हैं और हैंरतअंगेंज करने वाली बात है कि सर्वाधिक विजिटर भी इन पोर्न साइटों के ही हैं। इन अश्लील साइटों पर जाकर वे अपनी उत्कंठा को शांत करते हैं। परंतु वे यह नहीं जानते कि इससे उनका और समाज दोनों का नैतिक पतन होता है। साथ ही इंटरनेट के अधिक उपयोग ने साइबर क्राइम जैसे अपराधों को जन्म देकर युवाओं में अपराध करने की नई विद्या उत्पन्न कर दी है। जिससे आज का युवा वर्ग मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पतन की ओर अग्रसरित हो रहा है। जो हमारे समाज के लिए चिंता का विषय है।
अगर निष्‍कर्ष की बात करें तो सभी जनसंचार माध्यमों ने जहां ग्लोबल विलेज, शिक्षा, मनोरंजन और जनमत निर्माण, समाज को गतिशील बनाने तथा सूचना का बाजार बनाने में सहयोग किया वही अश्लीलता, हिंसा, मनोविकार, उपभोकतावादी परवर्ती तथा समाज को नैतिक और सांस्कृतिक पतन की ओर अग्रसर किया है। अब हम युवाओं को स्वयं ही इसका चयन करना होगा कि वो किस ओर जाना चाहते हैं। बुलंदी पर या पतन की ओर?

जनसंचार माध्यम और युवा वर्ग


जनसंचार माध्यम और युवा वर्ग
जनसंचार का अर्थ जनता के बीच विभिन्न माध्यमों से किया जाने वाला संचार है। जनसंचार का वर्तमान समय इसके परिपक्व समाज की मनोदशा, विचार, संस्कृति आम जीवन दशाओं को नियंत्रित व निदेशित कर रहा है। इसका प्रवाह अति व्यापक एवं असीमित है। जनसंचार माध्यमों द्वारा समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त हो रहा है। स्वतंत्र जनसंचार माध्यम लोकतंत्र की आधारशिला है। अर्थात जिस देश में जनसंचार के माध्यम स्वतंत्र नहीं है वहां एक स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण होना संभव नहीं है। जनसंचार माध्यमों का जाल इतना व्यापक है कि इसके बिना एक सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
हालांकि जनसंचार माध्यमों में हाल ही कुछ वर्षों में एक क्रांति का उदय हुआ है जिसे हम संचार क्रांति कहते हैं। जनमाध्यमों में क्रांति के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी क्रांति आई है। जिसने मॉर्सल मैक्लुहान के वक्तव्य को पूर्णतः सत्य कर दिया कि संपूर्ण दुनिया एक गांव में तब्दील हो जाएगी। मनुष्‍य के बोलने का अंदाज बदल जाएगा और क्रिया-कलाप भी। ऐसा ही हुआ है, आज युवा रेडियों सुन रहा है, टेलीविजन देख रहा है, मोबाइल से बात कर रहा है और अंगुलियों से कंम्प्यूटर चला रहा है। कहने का मतलब यह है कि युवा एक साथ कई तकनीकों से संचार कर रहा है। संचार का विस्तृत रूप जनसंचार है। जनसंचार माध्यमों का युवा वर्ग पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में बाते करें तो हर एक विशय की तरह इसके भी दो रूप दिखाई पड़ते हैं- सकारात्मक और नकारात्मक।
अब मुख्य प्रश्‍न यह उठता है कि आज की युवा पीढ़ी जनसंचार माध्यमों के किस पहलू पर अधिक अग्रसरित हो रही है। सकारात्मक पहलू पर या नकारात्मक पहलू पर। यह बात सही है कि जनसंचार माध्यमों के द्वारा आज का युवा वर्ग अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति कर रहा है। युवाओं पर मीडिया का प्रभाव मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक कहें तो देश की तकरीबन 58 फीसदी आबादी युवाओं की है। ये वो वर्ग है जो सबसे ज्यादा सपने देखता है और उन सपनों को पूरा करने के लिए जी-जान लगाता है। मीडिया इन युवाओं को सपने दिखाने से लेकर इन्हें निखारने तक में अहम भूमिका निभाने का काम करता है। अखबार-पत्र-पत्रिकाएं जहां युवाओं को जानकारी मुहैया कराने का गुरू दायित्व निभा रहे हैं, वहीं टेलीविजन-रेडियो-सिनेमा उन्हें मनोरंजन के साथ आधुनिक जीवन जीने का सलीका सिखा रहे हैं। लेकिन युवाओं पर सबसे ज्यादा और अहम असर हो रहा है न्यू- मीडिया का। जी हां, इंटरनेट से लेकर तीसरी पीढ़ी (थ्री-जी) मोबाइल तक का असर यूं है कि देश-दुनिया की सरहदों का मतलब इन युवाओं के लिए खत्म हो गया है। इनके सपनों की उड़ान को तकनीक ने मानों पंख लगा दिए हैं। ब्लॉगिंग के जरिए जहां ये युवा अपनी समझ-ज्ञान-पिपासा-जिज्ञासा-कौतूहल-भड़ास निकालने का काम कर रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया साइट्स के जरिए दुनिया भर में अपनी समान मानसिकता वालों लोगों को जोड़ कर सामाजिक सरोकार-दायित्व को पूरी तन्मयता से पूरी कर रहे हैं। हाल में अरब देशों में आई क्रांति इसका सबसे तरोताजा उदाहरण है। इन आंदोलनों के जरिए युवाओं ने सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका का लोहा मनवाया तो युवाओं के जरिए मीडिया का भी दम पूरी दुनिया ने देखा। युवाओं पर इसका अधिक प्रभाव इसलिए पड़ा क्योंकि वे उपभोक्तावादी प्रवृति के होते हैं। वे बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी नई तकनीक का उपभोग करना शुरू कर देते हैं।
 यह कहना गलत नहीं होगा कि दूसरी ओर युवा वर्ग जनसंचार की चमक के माया जाल में फंसता जा रहा है। इस आलोच्य में कहा जाए तो युवाओं में तेजी से पनप रहे मनोविकारों, दिशाहीनता और कत्र्तव्यविमुखता को संचार माध्यमों के दुष्‍रिणामों से जोड़कर देखा जा सकता है। पश्चिम का अंधा अनुसरण करने की प्रवत्ति उन्हें आधुनिकता का पर्याय लगने लगी है। इनसे युवाओं की पूरी जीवन-शैली प्रभावित दिखलाई पड़ रही है जिससे रहन-सहन, खान-पान, वेषभूषा और बोलचाल सभी समग्र रूप से शामिल है। मद्यपान और धूम्रपान उन्हें एक फैशन का ढंग लगने लगा है। नैतिक मूल्यों के हनन में ये कारण मुख्य रूप से उत्तरदायी है। आपसी रिश्‍ते-नातों में बढ़ती दूरियां और परिवारों में बिखराव की स्थिति इसके दुखदायी परिणाम हैं।
इसी क्रम में बात करें तो अति आधुनिक संचार माध्यम जिसे हम न्यू मीडिया के नाम से जानते हैं वो भी जहां एक ओर युवाओं के लिए वरदान साबित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ये एक अभिशाप के रूप में युवाओं की दिशाहीनता को बढ़ा रहा है। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 30 जून, 2012 तक भारत में फेसबुक व सोशल साइटों के उपयोग करने वालों की संख्या लगभग 5.9 करोड़ है जो 2010 की तुलना में 84 प्रतिशत अधिक है। इन 5.9 करोड़ लोगों में लगभग 4.7 करोड़ युवा वर्ग से सरोकार रखते हैं। अगर आंकड़ों को देखें तो भारत दुनिया का चैथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है। इसमें दो राय नहीं कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं की निजता को प्रभावित किया है और युवा अपनी सोच से अपने समाज को प्रभावित कर रहे हैं।
वहीं इंडिया बिजनेस न्यूज एंड रिसर्च सर्विसेज द्वारा 1200 लोगों पर किए गए सर्वेक्षण जिनमें 18-35 साल की उम्र के लोगों को शामिल किया गया था। इसमें करीब 76 फीसदी युवाओं ने माना कि सोशल मीडिया उनको दुनिया में परिवर्तन लाने के लिए समर्थ बना रही है। उनका मानना है कि महिलाओं के हित तथा भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन में ये सूचना का एक महत्वपूर्ण स्रोत साबित हुई है। करीब 24 फीसदी युवाओं ने अपनी सूचना का स्रोत सोशल मीडिया को बताया। करीब 70 फीसद युवाओं ने ये भी माना कि किसी समूह विशेष से संबद्ध हो जाने भर से जमीनी हकीकत नहीं बदल जाएगी, बल्कि इसके लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
वास्तव में जनसंचार माध्यमों ने ग्लोबल विलेज की अवधारणा को जन्म दिया है। जनसंचार के अंतर्गत आने वाले माध्यम है पत्र-पत्रिकाए, टीवी, रेडियों, मोबाइल, इंटरनेट। युवा वर्ग पर इन सभी जनसंचार माध्यमों ने अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा है। इनका प्रभाव इतना शक्तिशाली है की आज के युवा इन जनसंचार माध्यमों के बिना अपने दिन की शुरुआत ही नहीं कर सकते। जैसे पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने से ज्यादा कामुकता तथा अश्लील साहित्य, पत्र-पत्रिकाएं खरीदता व पढ़ता है और अपने चरित्र का नैतिक पतन कर अपने भविष्य को अंधकार में डालता है। इसी प्रकार टीवी जैसे सबसे प्रभावशाली माध्यम का भी युवाओं पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का प्रभाव पड़ा है टीवी श्रव्य के साथ ही दृश्य माध्यम है जिसके कारण युवा वर्ग किसी भी विषय को भली-भांती समझ सकता है भले ही वह अधिक शिक्षित न हो परंतु युवा वर्ग इस माध्यम का भी दुरूपयोग कर नैतिक पतन करने वाले कार्यकर्मों को ही अधिक देखते हैं क्योंकि उनको तत्कालिक आनंद की प्राप्ति होती है और वे दूरगामी विनाश को नहीं समझ पाते जिससे उनका भविष्य बिगड़ता है।
हालांकि नई विद्या मोबाइल और इंटरनेट अत्याधुनिक तकनीकों के उदाहरण है। जिनका निसंकोच उपयोग अधिकांश युवाओं द्वारा किया जा रहा है। मोबाइल यह एक ऐसा माध्यम है जिससे दूर बैठे व्यक्ति के साथ बात की जा सकती है तथा अपने हसीन पलों को चलचित्रों के रूप में कैद किया जा सकता है। यह तो इसका सदुपयोग है परंतु आज युवा इस माध्यम का गलत प्रयोग कर एमएमएस जैसे दुर्व्यसनों में फस जाते हैं। इसी प्रकार इंटरनेट जनसंचार माध्यमों में सबसे प्रभावशाली है जिसने दूरियों को कम कर दिया है। इसका अधिकतर उपभोग युवा वर्ग द्वारा किया जाता है जहां इसके द्वारा युवाओं को सभी जानकारियां उपलब्ध होती हैं। ये ज्ञानवर्धन में तो सहायक है परंतु आज वर्तमान समय में युवा द्वारा इसका दुरूपयोग अधिक होता है। हालांकि संस्कारी व्यक्तियों द्वारा इस मीडिया का सही उपयोग किया जा रहा है वहीं लगभग 100 में से 85 प्रतिशत लोग पोर्न साइटों का प्रयोग करते हैं और हैंरतअंगेंज करने वाली बात है कि सर्वाधिक विजिटर भी इन पोर्न साइटों के ही हैं। इन अश्लील साइटों पर जाकर वे अपनी उत्कंठा को शांत करते हैं। परंतु वे यह नहीं जानते कि इससे उनका और समाज दोनों का नैतिक पतन होता है। साथ ही इंटरनेट के अधिक उपयोग ने साइबर क्राइम जैसे अपराधों को जन्म देकर युवाओं में अपराध करने की नई विद्या उत्पन्न कर दी है। जिससे आज का युवा वर्ग मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पतन की ओर अग्रसरित हो रहा है। जो हमारे समाज के लिए चिंता का विषय है।
अगर निष्‍कर्ष की बात करें तो सभी जनसंचार माध्यमों ने जहां ग्लोबल विलेज, शिक्षा, मनोरंजन और जनमत निर्माण, समाज को गतिशील बनाने तथा सूचना का बाजार बनाने में सहयोग किया वही अश्लीलता, हिंसा, मनोविकार, उपभोकतावादी परवर्ती तथा समाज को नैतिक और सांस्कृतिक पतन की ओर अग्रसर किया है। अब हम युवाओं को स्वयं ही इसका चयन करना होगा कि वो किस ओर जाना चाहते हैं। बुलंदी पर या पतन की ओर?