Monday, March 18, 2013


मीडिया दलालीकरण और भावी सरकार
मीडिया का काम आमतौर पर समाज में स्थापित कुरूतियों, विसमताओं और समाज में के हर तबके तक सूचना पहुंचना, उन्हें शिक्षित व मनोरंजन करना भी है। यह एक सरल परिभाषा के दायरे में आती है फिर भी देखा जा सकता है कि मीडिया को दी गई यह सरल परिभाषा में भी परिवर्तन हो चुका है। मीडिया जनमत तैयार करने, निर्णय सुनाने, प्रोपेगेंडा फैलाने, अश्लीलता को बढ़वा देने, राजनेताओं का बखान करने, साथ-ही-साथ कुरूतियों का इस तरह महिमामंडन करके दिखाया जाना इनके लिए आम बात हो चुकी है। जिस पर समय-समय पर उंगलियां उठती रही हैं। परंतु कभी हमने इसके पीछे चल रहे या चलाए जा रहे संस्थाओं के दलालीकरण की पृष्ठभूमि पर विचार विमर्श नहीं किया, कि समय के परिवर्तन के साथ इन संस्थाओं में भी बदलाव आ सकता है। नहीं आना चाहिए फिर भी यह परिवर्तन अपने तीव्रवेग से चल रहा है।
वैसे मीडिया पर समय-समय पर बहुत से कानून लागू किए गए, जिनका पालन करना इस संस्थानों ने कभी मुनासिब नहीं समझा। इसके लिए भारतीय पे्रस परिषद के अध्यक्ष और सदस्य ने भी ज्यादा जोर नहीं दिया कि वह इन कानून का पालन क्यों नहीं कर रहे हंै! शायद जरूरत ही महसूस नहीं होती। दूसरी तरफ अपने आप को लोकतंत्र का चैथा खंभा कहलाने वाला मीडिया छुट्टा सांड की भांति दौड़ा जा रहा है बिना किसी लगाम के। वहीं सरकार ने भी इस सांड पर काबू करने का अपना फैसला त्याग दिया है। इसमें भी सरकार का अपना हित छिपा हुआ है। क्योंकि सरकार की गर्दन (नेता, राजनेता और भ्रष्टाचारियों) खुद फंसी हुई है जिसकी लगाम इन मीडिया संस्थानों के हाथों में दिखाई दे रही है। जिस दिशा में यह मोड़ना चाहते हैं उस दिशा में मोड़ दिया जाता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में उल्टी गंगा बह रही है। जिस पर जिसका नियंत्रण होना चाहिए वह छुट्टा और जिस पर नहीं वह मीडिया के इसारे पर मुजरा कर रहा है। अगर आज के परिप्रेक्ष्य में सरकार को रखैल की संज्ञा से सुशोभित किया जाए तो मेरे मित्रों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि मैं जनता हूं कि मेरे बहुत सारे मित्रगण किसी-न-किसी पार्टी से सरोकार रखते हैं और बहुत से मित्रों के सिर पर किसी-न-किसी राजनेताओं का हाथ बना हुआ है। अगर मेरे मित्रगण यह आरोप लगाए कि मैं सरकार के खिलाफ इस तरह के आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कैसे कर सकता हूं तो यहां यह भी बता दूं कि मैं, मीडिया से सरोकार रखता हूं। बावजूद इसके मैं, मीडिया के क्रिया-कलापों पर समय-समय पर प्रश्न चिह्न लगाता रहता हूं तो सरकार इससे कैसे अछूती रह सकती है।
अभी दो-तीन दिन पहले प्राइम टाइम पर प्रसारित हो रही एक खबर का मैंने विश्लेषण किया जिसको लगभग सभी समाचार प्रेमी और राजनैतिक घरानों व पार्टियों से सरोकार रखने वाले लोगों ने देखा होगा। खबर हमारे लल्ला की दिखाई जा रही थी जो पंजाब विश्वविद्यालय के मंच से अपने मुखारबिंदु से अच्छे-अच्छे प्रवचन दे रहे थे कि विपक्षी पार्टियां उनकी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को लागू नहीं होने देती या उन्हें विकास के लिए काम नहीं करने देती। बड़ी आश्चर्यचकित बात है जिनकी अम्मा के हाथों में देश की कमान हो वही यह राग अलापेंगे तो कैसे काम चलेगा। अगर यह विकास की बात करें तो 8 साल में देश के विकास का पहिया वहीं के वहीं स्थिर है। जिसका ढीकरा यह व उनकी पार्टी विपक्षी दलों पर फोड़ रहे हैं। परंतु वह यह भूल रहे हैं कि चाचा मनमोहन की सरकार के कार्यकाल में (शुरू से लेकर अब तक) कितने घोटाले हुए, और कितनी बार जनता का उनकी पार्टी ने खून चूसा। इस बात पर सभी का मुंह सील जाता है। यह सरकार नहीं मच्छर है जो गरीब जनता का खून चूस रही है। क्योंकि इस कमरतोड़ मंहगाई के कारण यह दो वक्त की रोटी का गुजारा भी नहीं कर सकते। तब तक मच्छर मारने की दवा का कैसे प्रयोग कर सकते हैं। हां हो यह सकता है कि इस मंहगाई की मार से बचने के लिए वह मच्छर मार दवा का ही सेवन कर ले ताकि यह मच्छर दुबारा कभी खून न पी सकें।
इस परिप्रेक्ष्य में कहें तो हमारे देश के लल्ला अपने प्रवचनों के समय यह भी भूल गए कि उनके जीजाजी श्री पर भी अब आरोप लग चुके हैं। फि भी इस मुद्दे पर बोलने की वजह वह अपने मियां मिट्ठू बनते रहे। सही बात है रात में गुनाह करने वाला दिन के उजाले में अपने आप को हमेशा साहूकार ही बताता है।
इस तरह की खबरों को मीडिया ही महिमामंडन करके दिखाता है क्योंकि यह उनके लिए बड़ी खबर का काम करती है। टीआरपी बढ़ाने का काम करती है। वह यह भूल जाते है कि वह ही हैं जो किसी को रातोंरात शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा भी सकता है और उसका नामोनिशान की मिटा सकता है। फिर भी मीडिया संस्थाओं के लोग इनकी डाली गई हड्डियों पर जीभ ललचाकर आश्रित हो जाते हैं और जैसा यह चाहते हैं वह करने लगते हैं। वह यह भी भूल जाते है कि उनका समाज के प्रति भी कोई सरोकार है जिसके लिए उसे चैथे स्तंभ से नबाजा गया है ताकि गरीब जनता के लिए जब तीनों स्तंभ नकारा साबित होने लगे तो वह उन्हें शोषण से मुक्ति व अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने में और उनका हक दिलाने में कारगर सिद्ध हो सके। कालचक्र का पहिया अपनी घुरी पर लगातार घूमता रहता है फिर भी वक्त रहते इन संस्थाओं के लोगों के चेतने और दलालीकरण का त्याग करके जनता के हितों में पुनः पहले जैसी सोच कायम करने की है। नहीं तो तीनों स्तंभ की भांति इस स्तंभ से भी आम जनता का बना हुआ भरोसा भी खत्म हो जाएगा।

मीडिया यथार्थ और नैतिकता


मीडिया यथार्थ और नैतिकता
एक सदी पहले कहा गया था कि ‘‘जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।’’ परंतु आज मीडिया के परिपे्रक्ष्य में यह बात कदापि लागू नहीं होती। क्योंकि मीडिया आम जनता का हथियार होने के साथ-साथ शोषण का औजार बनता जा रहा है। वह कभी संचालक, निर्णायक के साथ-साथ खलनायक की भूमिका का भी निर्वाहन करने लगा है जिस कारण से सीधे मानव जीवन प्रभावित हो रहा है। यह आज के मीडिया का वास्तविक पहलू है जिसके धरातल पर उपजी खाई समाज के सच और मीडिया की नैतिकता के बीच साफ तौर पर देखी जा सकती है।
मीडिया नैतिकता और यथार्थ के नाम पर जो प्रकाशित व प्रसारित कर रहा है उसमें पूर्णतः सच्चाई हो, नैतिकता हो, इस बात पर हमेशा से प्रश्नवाचक चिहृ लगते रहे हैं। क्योंकि वह ‘‘समाज से कुछ-न-कुछ अंश छिपा ही लेता है, बाकि चीजों को वह बढ़ा-चढ़ा कर समाज के समाने परोस देता है। मीडिया जनता से यथार्थ के कुछ अंश इसलिए छिपा लेता है क्योंकि, वो समाज को सच से रू-ब-रू कराने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।’’ वैसे मीडिया ने अपनी सारी नैतिकता की सीमाओं को लाघंकर दुनिया को अपने शिकंजे में कस लिया है। इस शिकंजे की पहुंच से अब गरीब तबका भी अछूता नहीं रहा है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया ऑक्टोपस की भांति अपनी बांहें पसारे खड़ा हुआ है न जाने कब किस बांह से गर्दन दबोच ले। और सामने वाले को पता ही न चल पाए। ‘‘इस खेल के पीछे बाजारवाद और पूंजी की शक्ति काम करती है। जिस कारण समाज की अधिकांश जनता को अपनी अंधी दौड़ में शामिल हो चुकी है। इस अंधी दौड़ के चलते मीडिया ने हमें सनसनीखेज सुर्खियों का आदी बना दिया है। इतिहास, कला, संस्कृति, राजनीति, घटना आदि सभी क्षेत्र में सनसनीखेज तत्व हावी होने लगे हैं। यही सनसनीखेज सुर्खियां जनता के दिमाग पर लगातार बमबारी कर रही हैं। इस हमले में ज्यादा-से-ज्यादा खबरें होती हैं।’’ किंतु इन खबरों की व्याख्या करने और आत्मसात करने की जरूरत में लगातार गिरावट आ रही है। ‘‘आज मीडिया जनता को संप्रेषित ही नहीं कर रहा, अपितु भ्रमित भी कर रहा है। यह कार्य वह अप्रासंगिक को प्रासंगिक बनाकर, पुनरावृत्ति और शोर के साथ बखूबी कर रहा है।’’
यह सही है कि एक हद तक मीडिया उद्योग का रूप अख्तियार कर चुका है तथा मुनाफा अर्जित करना उसका मूल उद्देश्य बन गया है। इस कारण से यह ज्ञात हो पाना मुश्किल प्रतीत होता है कि पत्रकारिता मिशन है या व्यवसाय। यह सवाल विचारणीय है? आजादी के बाद मिशन से व्यवसाय बनी पत्रकारिता अब ग्लोबल आंधी में बाजार की कठपुतली बन गई है। इस बाजार के नए औजारों ने इसकी नैतिकता को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। जे.बी. मैकी के कथनानुसार कि - ‘‘पत्रकारिता में किसी भी तरह भ्रष्टता या नैतिक भावना के साथ खिलवाड़ का परिणाम अंत में बुरा ही होता है।’’ ‘‘क्योंकि अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक का पैरामीटर उनके किसी काम का नहीं है। नैतिकता के प्रश्न उनके लिए बेमानी होने लगते हैं। मीडिया की प्रवृत्ति में दिनोंदिन तेजी से आ रहे बदलाव यथार्थ के बाजारवाद के मॉडलका ही परिणाम है।’’
वास्तव में यह युग सूचना और संचार क्रांति का युग है जिसमें मीडिया अपने मूल आदर्शों से पतित हो रहा है। सामाजिक सरोकारों से लगातार विमुख होते जाने से मीडिया का नैतिक पतन निश्चित रूप से हुआ है। ‘‘आज के पत्रकारी युग का आदर्श, खबरों को देना नहीं बल्कि ऐन-केन प्रकारेण खबरों को बेचना भर रह गया है। खबरों में न केवल मिलावट हो रही है बल्कि पेड न्यूज के तहत विज्ञापनों को खबरों के रूप में छापकर पाठकों को गुमराह तक किया जा रहा है।’’
इस आलोच्य में बात करें तो आज का मीडिया खतरे की चेतावनी नहीं देता, बल्कि खतरे को कई बार और बढ़ा देता है। ‘‘कुछ वर्षों पहले गुजरात के गोधरा कांड’, के दौरान उन्माद बढ़ाने वाली रिपोर्टिंग के जरिये यही तथ्य उजागर हुए। अभी हाल ही में मुंबई के होटलों में हुए आतंकवाद घटनाओं की रिपोर्टिंग ने राष्ट्रीय सुरक्षा तक की चिंता नहीं की।’’ एक समय था जब मीडिया में सत्य, प्रेम, अहिंसा, करूणा, दया और मानवता का संदेश देने वाले महापुरूष और देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले क्रांतिकारी उन खबरों के नायक हुआ करते थे, लेकिन आज तस्करों, डकैतों, बलात्कारियों को इनमें नायकत्व मिल रहा है। जैसे-‘‘2005 के आखिरी महीनों में दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एम.एम.एस. बना था। देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी। इस खबर के बाद लड़की के पिता ने आत्महत्या कर ली।’’
कहना गलत न होगा कि, मीडिया में ध्वस्त होते नैतिकता के मानदंड इतने प्रभावित हो चुके हैं कि उसमें सूचना का यथार्थ अपने-अपने हितों को साधने के कारण बदल जाता है। ज्याॅ बोद्रिया के शब्दों में, ‘‘मीडिया शब्द, दृश्य और अर्थ को ध्वस्त करके उन्हें पुनर्निर्मित करता है ताकि इच्छित प्रभाव उत्पन्न किया जा सके। मीडिया हमारे और यथार्थ के बीच मध्यस्थता करता है और यह मध्यस्थता हमारे लिए यथार्थ को अधिक-से-अधिक अवमूल्यन करती है। क्योंकि, लक्ष्मण रेखा के उस पार सफलता का उजाला नहीं बल्कि असफलता का जिल्लत भरा अंधेरा है।’’ क्या हमारे देश के पत्रकार और मीडिया न्यूज ऑफ द वर्ल्‍डके अंजाम से कुछ सबक लेंगे? उनका जो हो सो हो, पर सवालों से घिरा भारतीय मीडिया इस दुर्घटना से सबक क्या लेता है? ‘‘पिछले दो दशकों के दौरान हमारे मीडिया ने भी लक्ष्मण रेखा को लगातार लांघा है। मीडिया को व्यवसाय मानने में कोई हर्ज़ नहीं है, परंतु हर पेशे की अपनी नैतिकता होती है और नैतिकता के अपने ही मानदंड। क्योंकि इनका निर्वाह ऑक्सीजन की तरह है, जिसके बिना जिया नहीं जा सकता। ये मानदंड इधर के सालों में लगतार टूटे हैं। यह चिंता की बात है।’’ 
हालांकि इसमें कोई दो राह नहीं है, कि ‘‘आज राजनीतिक दलों व औद्योगिक कंपनियों के मीडिया प्रकोष्ठ और पी.आर. एजेंसियां मिलकर समाचार की अंर्तवस्तु को दिनोंदिन प्रभावित कर रही है, उसे अपने अनुसार तोड़-मरोड़ रही है, धुमा रही है, अनुकूल अर्थ दे रही है, और यहां तक कि जरूरत पड़ने पर अपने प्रतिकूल की खबरों को दबाने तक की पुरजोर कोशिशें कर रही है। इसमें करोड़ों रूपये की डील हो रही है। लेकिन मीडिया प्रबंधन के बढ़ते दबदबे और दबाव ने मीडिया की स्वतंत्रता, निष्पक्षता, संतुलन और तथ्यपरकता तथा सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों को न सिर्फ कमजोर करके गहरा धक्का पहुंचाया है बल्कि उसकी साख और विश्वसनीयता को भी अपूर्णनीय क्षति पहुंचाने का काम किया है।’’
निष्कर्ष की बात करें तो ‘‘नैतिकता जीवन समाज के किसी भी क्षेत्र में गांधीयुग की तरह नहीं रही है तो फिर मीडिया में ही क्यों रहे? लोकतंत्र के अन्य स्तंभों पर अंकुशपरक नजर रखने की जिम्मेदारी मीडिया पर है जब तीनों स्तंभ अनैतिकता और भ्रष्टाचार के दीमक से एकदम खोखलें हो गए हैं तब चैथे स्तंभ खबरपालिका में 60 साल तक नैतिक रूप से श्रेष्ठ रहने के बाद वैश्विकरण व बाजार के कुछ दीमक लग गए तो इतनी हाय-तौबा, शोर-शराबा क्यों? जब जीवन व समाज में कही आदर्श नहीं तो एक मात्र क्षेत्र मीडिया के लिए इतने कडे़ आदर्श क्यों?’’ समझ से परे की बात प्रतीत होती है।
फिर भी कहना कठिन है कि मीडिया के इस परिवर्तन का क्रम कहां जाकर थमेगा। जरूरत है अपनी संस्कृति के संस्कार और संविधान की मर्यादा के प्रति जागरूकता बनाए रखने की। तभी हम ग्लोबल तूफान के बावजूद ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकेंगे जो मीडिया को उसके मौलिक स्वरूप और चरित्र के साथ-साथ न्याय कर सकने में सक्षम हों।

Saturday, July 7, 2012

क्या नाम दे इन बच्चों को................?


क्या नाम दे इन बच्चों को................?
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यह सवाल अपने आप में हमेशा से और चारों तरफ से प्रश्नवाचकों से घिरा हुआ है। जिस पर तमाम तरह के सवालिया निशान सदियों से लगाये जाते रहे हैं और लगाये भी जा रहे हैं। इन निशानों से उपजे दागों का कहीं कोई माई बाप नहीं, जो इनको साफ करे। यह तो बस समाज की देन है, जो हमेशा दूसरों पर थोपने का काम करती है। जिसकी चुभन से कहीं कोई भी अछूता नहीं रह पाता। अपनी पूरी जिंदगी में कभी-न-कभी कुछ-न-कुछ तो झेलना ही पड़ता है। हालांकि इस समाज में चलता है सब कुछ इन समाज के रहनुमाओं द्वारा, और सामाजिक पृष्ठभूमि को अपनी ढाल बनाकर, अपना उल्लू सिद्ध किया जाता है। वैसे बहुत-से हितैसियों ने मंत्रों और भिन्न-भिन्न तरह के आडंवरों से न जाने कितने उल्लू सिद्ध किये हैं, फिर इस उल्लू सिद्धि में किसी बेगुनाह की बलि ही क्यों न चढ़ौत्री के रूप में चढ़ानी पड़े, बेझिझक चढ़ा दी जाती है। जिसे लोग अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं। इसके अलावा इनके पास दूसरा रास्ता नहीं छोड़ा जाता, जिसे वह अपना सकें।
शायद मुझे अपनी बात घुमा-फिरा कर नहीं कहनी चाहिए थी। बरहाल में अपने मूल मुद्दे यानि बच्चे? जिसे समाज क्या नाम दे, उस पर बात कर रहा हूं। यह वे बच्चे हैं जो आम बच्चों की परिधि में सम्मलित नहीं किए जाते। यहां तक की समाज, हां पूरा समाज भी इन्हें स्वीकार नहीं करता। इन बच्चों पर तरह-तरह के प्रश्नवाचक शब्द थोप दिये जाते हैं और छोड़ दिया जाता है मरने के लिए। हां यह बात सही है कि कुछ बच्चों की किस्मत अच्छी होती है जो पैदा होते ही इस तिरस्कृत समाज के कोप भंजन का शिकार होने से पहले ही इस समाज से रूकसत हो जाते हैं। और वो भी बच्चे जो पैदा होने से पहले ही गर्भ में मार दिये जाते हैं जिन्हें फेंक दिया जाता है किसी गंदगी में, कुत्ते और बिल्लियों का निवाला बनने के लिए। किस्मत है समाज के तिरस्कार से तो बच गये। वहीं रह जाते हैं वो बच्चे जिन्हें भगवान भी स्वीकार नहीं करता। जीना पड़ता है इसी समाज में, पल-पल मरने के लिए। और इनके साथ-साथ ताउम्र चलते हैं बहुत सारे सामाजिक सवालों के मकड़जाल। जिनसे वो कभी मुक्त नहीं हो पाता।
इस कड़ी को और आगे बढ़ाते हुए महाभारत काल में चलते हैं। जिसमें बिन ब्याही कुंआरी कुंती अपने पुत्र कर्ण को पैदा होने के बाद नदी में बहा देती है। ऐसा ही बहुत सारी कुंआरी कन्यायें, लोकापवाद के कारण अपने पुत्र को नदी में, कुएं में, जंगल में फेंक आती हैं। हांलाकि बिन विवाह के कुंआरी कन्याओं से पैदा हुए पुत्र को शास्त्र कामीन कह कर संबोधित करता है। वहीं समाज इसे नजायज करार देता है। जो अपने आप में एक गाली है। चलिये महाभारत काल की कुंती और कर्ण को यही पर छोड़ देते हैं और बात करते हैं आज के सूचना संजाल के दौर की। जहां इन बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है। इसका मूल आज भी अंधेरे में, किसी सात पेहरों में अब भी कैद है। परंतु इसकी परिणति से रिस्ता हुआ अम्ल, समाज में अपना हिस्सा सुनिश्चित कर चुका है।
इस आलोच्य में बात करें कि, इन बच्चों के समाज में पैदा होने के वो कौन से मूलभूत कारण हैं तो परिस्थिति हमें हकीकत के कुछ अनछुए पहलुओं से खुद-ब-खुद रूबरू करा देगी। वैसे इन बच्चों के पैदा होने में समाज का एक विशाल वर्ग आम तौर पर महिलाओं को ही कठघरे में खड़ा करके, तमाम तरह के लानछनों से नवाजता है। और उस पुरूष को छोड़ देता है जिसका इसमें बराबर का हिस्सा होता है या उससे भी कहीं ज्यादा।
अगर क्रमवार विश्लेषण करें तो पहले प्यार ही हमारे सामने परिलक्षित होता है। जिसमें लड़का-लड़की समाज से परे होकर प्यार को परवान चढ़ते हैं और फिर प्यार के नाम का सहारा लेकर अपनी शारीरिक कामवासना की पूर्ति करते हैं। इसी कामवासना से जन्म होता है इन बच्चों का। दूसरा कारण देखें तो हमारी अंतरआत्मा दहल जाती है। क्योंकि इसमें पूर्णरूप से पुरूष का ही हाथ होता है जो अपनी कामपिपास को शांत करने या सदियों से चली आ रही आपसी रंजिश के चलते इन महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं और छोड़ देते हैं उपजने के लिए बे नाम संतानों को। जो कभी नदी में, कभी नाले में, कभी झांड़ियों में  तो कभी कचडे़ के डिब्बे में मिल जाते हैं असहाय, बेसहारा। कुछ की सांस चल रही होती है तो कुछ की थम चुकी होती है और कुछ की चलने ही नहीं दी जाती। मार दिया जाता है आधे में ही। यह सब सोच के भी रूह काम उठती है। क्या जिंदगी है इनकी।
इतना सब लिखने के बाद भी सवाल उसी प्रश्नवाचकों के निशाने पर खड़ा हुआ है। कि क्या नाम दे इन बच्चों को। क्या गलती है इनकी जो इनको समाज स्वीकार नहीं करता। होती तो आखिर इंसान की औलाद है। जिस पर जानवरों से बदतर सलूक किया जाता है और वो सजा दी जाती है जो उसने कभी नहीं की। हां जुर्म तो किया है इस दावनी समाज में बिन विवाह के पैदा होने का।
माना कि हमारा समाज विवाह से पहले उत्पन्न संतानों को स्वीकृति प्रदान नहीं देता, परंतु इसमें इन बच्चों का क्या दोष। जिसको हमारा समाज तिरस्कार करता रहता है। और रख दिया जाता है नाम कमीना, नजायज। वैसे इन नामों से उन लड़के-लड़कियों को संबोधित करना चाहिए जो प्यार के नाम पर सब कुछ करते हैं और अपने दामन को पाक साफ दिखाने के लिए फेंक देते हैं इन बच्चों को किसी गंदगी में मारने के लिए।
लाई हयात आये, कजा ले चली चले
अपनी खुशी न आये, न अपनी खुशी चले!
मैं इसका निष्कर्ष निकाले में अपने आप को असमर्थ महसूस कर रहा हूं और कुछ पंक्तियों के साथ इसे यहीं पर खत्म करता हूं-
प्यार के नाम पे, लुटा दिया सब कुछ
दामन पाक दिखाना है तो कर्ण को बहाना पड़ेगा!


Monday, June 18, 2012

वेश्यावृत्ति और कानून


वेश्यावृत्ति और कानून



वेश्यावृत्ति सभी सभ्य देशों में आदिकाल से विद्यमान रही है। और ‘‘सदैव सामाजिक यथार्थ के रूप में स्वीकार की गई तथा इसका नियमन विधि एवं परंपरा द्वारा होता रहा है। आधुनिक यांत्रिक समाज में हमारी विवश्तामानसिक विक्षेप एवं निरंतर बढ़ती हुई आंतरिक कुंठा के क्षणिक उपचार का द्योतक है।’’1 वस्तुतः वेश्यावृत्ति विघटनशील समाज के सहज अंग के रूप में विद्यमान रही है। सामाजिक स्थिति में आरोह-अवरोह आते रहेकिंतु इसके अस्तित्व को बिलकुल भी प्रभावित नही कर सके। अगर कहा जाए तो वेश्यावृत्ति जैसी विवादास्पदउलझी हुई और मिथकीयअन्य कोई सामाजिक परिघटना नहीं है। वैसे ‘‘वेश्या’ शब्द को अंग्रेजी में प्रोस्टीट्यूट’ कहा जाता हैजो लेटिन शब्द प्रोस्टीबुला’ अथवा प्रोसिडा’ से बना है।2 भारत में इन्हें गणिका’ के नाम से पुकारा जाता था एवं प्राचीन भारतीय साहित्य में इसका विस्तृत वर्णन मौजूद है।
वेश्यावृत्ति क्या हैइस संबंध में विचारों में अस्पष्टता झलकती हैइसलिए पहले वेश्यावृत्ति की परिभाषा जान लेना अति आवश्यक है कि वेश्यावृत्ति वास्तव में है क्यावैसे ‘‘यौन संबंधी यथेच्छाचार या एकाधिक पुरूष से संबंध रखना वेश्यावृत्ति नहीं है। यदि कोई स्त्री चाहे वह सधवा होविधवा हो या कुमारी-किसी पुरूष से कथित रूप से असामाजिक संबंध रखती हैतो वह उतने से वेश्या नहीं कहला सकती।’’3 वेश्या कहलाने के लिए यह आवश्यक है कि इस प्रकार का संबंध हो और यह संबंध पैसा या लाभ के एवज में स्थापित किया गया हो। यदि यह अंतिम शर्त पूरी नहीं होतीतो स्त्री चाहे रोज एक नए पुरूष को रखेंवह भले ही विकृत मस्तिष्क कही जाएपरंतु वेश्या नहीं कहला सकती। इसके विपरीत यदि किसी स्त्री का संबंध दस-बीस साल तकयहां तक कि जन्म भर एक ही पुरूष से रहता हैपर वह संबंध पैसे से जुड़ा हो तो वह एकवृत्तिवाली होते हुए भी वेश्या ही कहलाएगी।
इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटानिका के अनुसार वेश्यावृत्ति वह है जो पैसे या अन्य मूल्यवान सामग्री के तात्कालिक भुगतान के बदलेपरिचित या अपरिचित किसी ऐसे व्यक्ति के साथ यौनाचार करे।4 वेश्यावृत्ति निवारण कानून 1956 मेंवेश्यावृत्ति की परिभाषा है- किसी महिला द्वारा किराया लेकरचाहे वह पैसे के रूप में लिया गया हो या मूल्यवान वस्तु के रूप में और चाहे फौरन वसूला गया हो या किसी अवधि के बादस्वछंद यौन-संबंध के लिए किसी पुरूष को अपना शरीर सौंपना वेश्यावृत्ति’ है और ऐसा करने वाली महिला को वेश्या’ कहा जाएगा।
अन्य शब्दों के माध्यम से कहा जाए तो अर्थलाभ के लिए स्थापित संकर यौनसंबंध वेश्यावृत्ति कहलाता है। इसमें उस भावनात्मक तत्व का अभाव होता है जो अधिकांश यौन संबंधों का एक प्रमुख अंग है। विधान एवं परंपरा के अनुसार वेश्यावृत्ति उपस्त्री सहवासपरस्त्रीगमन एवं अन्य अनियमित वासनापूर्ण संबंधों से भिन्न होती है।5 संस्कृत कोशों में यह वृत्ति अपनाने वाले स्त्रियों के लिए विभिन्न संज्ञाएं दी गई हैं। जैसे-वेश्यारूपाजीवापण्यस्त्रीगणिकावारवधुलोकांगनानर्तकी आदि।
वेश्यावृत्ति के अस्तित्व के संबंध में देखा जाए तो कम-से-कम 18 हजार वर्ष पहले ही वेश्याप्रथा का अस्तित्व ज्ञात होता हैपरंतु आर्थिक युग के विकास के साथ-साथ वेश्याओं की अवस्था में भी परिवर्तन हुआ है।6 ज्यों-ज्यों नागरिक स्वतंत्रता बढ़ी हैत्यों-त्यों वेश्याओं की स्वतंत्रता भी बढ़ी है। इसके सापेक्ष समाजवादी युग का विकास हुआ और साम्राज्यवादी युग के विकास के साथ ही नारी को भोग-विलास के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। नारी को विलासिता की वस्तु मानकर और कामुकता की कठपुतली समझकर अपनी अंगुलियों से जब जैसे चाहा नचायारस निचोड़ा और झूठन व थुकन समझकर फेंक दिया।7
विश्व के हर देशहर काल में ऐसा ही होता रहा। सामाजिक क्रूरता व विषमता का ग्रास बनी नारी को सामंती लोगों ने शोषण का शिकार बनाया। कमनीय नारी को समाज में भूखे सामंतीविलासी भेड़ियों से बचाने के लिये उनके माता-पिताओं ने नारी को भगवान की दासीपुत्रीसेविका का नाम देकर भगवान के शरण में भेज दियाजहां उसे अप्सरा’, ‘परी’ नाम देकर भगवान भोग्या घोषित कर दियाताकि वहां उसका यौवनरूपलावण्यसौंदर्य सुरक्षित रहेउसे सम्मान मिलेकिंतु वहां पर विराजमान भगवान के ठेकेदारों ने नारी को अश्लीलता व नग्नता की वस्तु बना दिया। और इसे अनुष्ठान का नाम देकर नारी की कामुकता को भोग का विषय बनाया तथा भगवान की दास बनाकर भगवान की मूर्ति के सामने नचवाया और फिर उसी पवित्रता को देह व्यापार का संयोग व संवाद बनाकर समाज के सामने पेश कर दिया।8 ज्यों-ज्यों समाज विकास के मार्ग पर अग्रसरित हुआ त्यों-त्यों वेश्यावृत्ति में परिवर्तन होता गया। और ‘‘यह वृत्ति अन्य उद्योगों की तरह देह-व्यापार (कर्मिशियल सेक्स) भी एक उद्योग के रूप में सामने आता गया।’’9 जहां ऐसे लोगों की भरमार दिखाई देती है जो इसको खरीदने के इच्छुक होते हैं। यह बात सही है कि अन्य उद्योगों की भांति यह उद्योग कभी भी खरीददारों की कमी की शिकायत नहीं करता।
हालांकि खरीददारों की नियमित भोग और कामुकता को शांत करने के कारण यह उन समाजों में ज्यादा से ज्यादा रही जहां विकास और भूमंडलीय प्रक्रिया ने गरीबों को अपनी परिधि से बाहर कर दिया। सेक्स बेचना या सेक्स के लिए बिकना ऐसा कार्य है जिसमें गरीब तथा अनपढ़ भी आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। किशोरावस्था तथा दैहिक आकर्षण ही इसकी एकमात्र अनिवार्य योग्यता है। वेश्यावृत्ति एक ऐसा धंधा है जो लगातार सुनिश्चित करता है कि गरीब औरतेंसिर्फ कुछ सौभाग्यशालियों को छोड़करसदैव गरीब तथा अनपढ़ रहेंगी।10 फिर भी जीवन निर्वाह के रक्षात्मक साधनों और अस्तित्व बनाएं रखने के लिए एशिया के अनेक भागों में वेश्यावृत्ति तेजी से पनप रही है।
एक अनुमान के अनुसार ‘‘इस वक्त बंबई महानगरी में ही लगभग 50 हजार वेश्यालय हैंजिनमें एक लाख से ऊपर वेश्याएं धंधा कर रही हैं।’’11 वहीं मानवाधिकार आयोग के अनुसार, ‘‘भारत में लगभग 15 लाख वेश्याएं हैं। जबकि 1 लाख से अधिक वेश्याएं मुंबईएशिया में वेश्यावृत्ति को अंजाम देती हैं।’’12 जो आज सबसे बड़ा सेक्स उद्योग बन गया है। उत्तर प्रदेश के जिलों में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है ‘‘कि 1,341 यौनकर्मीवेश्यालय आधारित वेश्यावृत्ति के एक नमूने में 693 और परिवार आधारित वेश्यावृत्ति में 584 वेश्याएं लिप्त थी। वैसे लड़कियां मुख्य रूप में निम्न मध्यम आय वालें क्षेत्रों की होती हैं।’’13
इसके व्यापार की बात करें तो ‘‘देश में रोजाना 2000 लाख रूपए का देह व्यापर होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 68 प्रतिशत लड़कियों को रोजगार के झांसे में फंसाकर वेश्यालयों तक पहुंचाया जाता है। 17 प्रतिशत शादी के वायदे में फंसकर आती हैं। वेश्यावृत्ति में लगी लड़कियों और महिलाओं की तादाद 30 लाख है।’’14 भारत में वेश्यावृत्ति के बाजार को देखते हुए अनेक देशों की युवतियां वेश्यावृत्ति के जरिए कमाई करने के लिए भारत की ओर रूख कर रही हैं। ऐसे भी मामले देखने में आए हैं जिसमें झारखण्डउत्तर प्रदेशराजस्थान और उत्तरांचल में 12 से 15 वर्ष की कम उम्र की लड़कियों को भी वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटा दक्षिण 24 परगना जिले के मधुसूदन गांव में तो वेश्यावृत्ति को जिंदगी का हिस्सा माना जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि वहां के लोग इसे कोई बदनामी नहीं मानते। उनके अनुसार यह सब उनकी जीवनशैली का हिस्सा है और उन्हें इस पर कोई शर्मिन्दगी नहीं है। इस पूरे गावं की अर्थव्यवस्था इसी धंधें पर टिकी है।
‘‘भारत में सेक्स वकर्स की संख्या करीब 28 लाख है। इनमें करीब 43 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जो उस उम्र में ही इस धंधे में धकेल दी गईं जब उनकी उम्र अठारह बरस भी नहीं थी। भारत में 15 से 35 साल तक की महिलाओं की गिनती की जाए तो उनमें से 2.4 फीसदी महिलाएं सेक्स वर्कर हैं।’’15 इनमें सबसे ज्यादा महिलाएं मध्य प्रदेश और बिहार से हैं। इसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश का नंबर आता है।
वैसे वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियों में से यदि हम आज उनमें से एक-एक के जीवन का अनुशीलन करेंतो पाएंगे कि उनमें से अधिकांश के जीवन में ये सब सोपान एक के बाद एक घटित होते हैं। चकले में बैठने वाली अधिकांश स्त्रियों के जीवन के अनुशीलन से यह ज्ञात होता है कि ‘‘पहले कोई स्त्री किसी-न-किसी बुरी सोहबत में पड़कर या किसी मिथ्या प्रेमिक के जाल में फंसकरया किसी अन्य प्रकार से वेश्यावृत्ति में कदम रखती हैतो पहले-पहल वह केवल एक यौथ स्त्री (ऐतिहासिक अर्थ में नहीं) हो जाती हैऔर उसकी कमाई पर उसके कथित मालिक या चकले की मालकिन का अधिकार होता है।’’16 इसके बाद जब वह कुछ समझने लगती है और या तो उसके आने-जाने वालों में उसके एकाध सहायक पैदा हो जाते हैं या मालकिन समझती है कि उसे पूर्ण रूप से दबाकर नहीं रखा जा सकता तो वह उसे कुछ हिस्सा देने लगती है। इसके बाद का सोपान वेश्या के लिए पूर्ण स्वतंत्र’ रूप का सोपान हैजब वह खुद कमरा लेकर या मकान लेकर अलग स्वतंत्र’ रूप से बाजार में अपना रूप-यौवन बेचने लगती हैं।
वेश्यावृत्ति को अपनाने के मूलभूत कारण सामने आएं हैं जिन कारण से ये स्त्रियां वेश्यावृत्ति का रास्त चुन लेती हैंयथा-
आर्थिक कारण
अनेक स्त्रियां अपनी एवं आश्रितों की भूख की ज्वाला शांत करने के लिए विवश हो इस वृत्ति को अपनाती हैं। जीविकोपार्जन के अन्य साधनों के अभाव तथा अन्य कार्यों के अत्यंत श्रम साध्य एवं अल्वैतनिक होने के कारण वेश्यावृत्ति की ओर आकर्षित होती है। धनीवर्ग द्वारा प्रस्तुत विलासिताआत्मनिरति तथा छिछोरेपन के अन्यान्य उदाहरण भी प्रोत्साहन के कारण बनते हैं। एक अध्ययन के अनुसान लगभग 65 प्रतिशत वेश्याएं आर्थिक कारणवश इस वृत्ति को अपनाती हैं।
सामाजिक कारण
समाज ने अपनी मान्यताओंरूढ़ियों और त्रुटिपूर्ण नीतियों द्वारा इस समस्या को और जटिल बना दिया है। विवाह संस्कार के कठोर नियमदहेज प्रथाविधवा विवाह पर प्रतिबंधसामान्य चारित्रिक भूल के लिए सामाजिक बहिष्कारअनमेल विवाहतलाक प्रथा का अभाव आदि अनके कारण इस घृणित वृत्ति को अपनाने में सहायक होते हैं। इस वृत्ति को त्यागने के पश्चात् अन्य कोई विकल्प नहीं होता। ऐसी स्त्रियों के लिए समाज के द्वारा सर्वदा के लिए बंद हो जाते हैं। वेश्याओं की कन्याएं समाज द्वारा सर्वथा त्याज्य होने के कारण अपनी मां की ही वृत्ति अपनाने के लिए बाध्य होती हैं। समाज में स्त्रियों की संख्या पुरूषों की अपेक्षा अधिक होने तथा शारीरिकसामाजिक एवं आर्थिक रूप से बाधाग्रस्त होने के कारण अनेक पुरूषों के लिए विवाह संबंध स्थापित करना सभव नहीं हो पाता। इनकी कामतृप्ति का एकमात्र स्थल वेश्यालय होता है। वेश्याएं तथा स्त्री व्यापार में संलग्न अनेक व्यक्ति भोली-भाली बालिकाओं की विषय आर्थिक स्थिति का लाभ उठाकर तथा सुखमय भविष्य का प्रलोभन देकर उन्हें इस व्यवसाय में प्रविष्ट कराते हैं। चरित्रहीन माता-पिता अथवा साथियों का संपर्कअश्लील साहित्यवासनात्मक मनोविनोद और चलचित्रों में कामोत्तेजक प्रसंगों का बाहुल्य आदि वेश्यावृत्ति के पोषक प्रमाणित होते हैं।
मनोवैज्ञानिक कारण
वेश्यावृत्ति का एक प्रमुख आधार मनोवैज्ञानिक है। कतिपय स्त्री पुरूषों में कामकाज प्रवृत्ति इतनी प्रबल होती है कि इसकी तृप्तिमात्र वैवाहिक संबंध द्वारा संभव नहीं होती। उनकी कामवासना की स्वतंत्र प्रवृत्ति उन्मुक्त यौन संबंध द्वारा पुष्ट होती है। विवाहित पुरूषों के वेश्यागमन तथा विवाहित स्त्रियों के विवाहेत्तर संबंध में यही प्रवृत्ति क्रियाशील रहती है।
इस सब कारणों से महिलाएं वेश्यावृत्ति को अपनाने पर मजबूर हो जाती हैं या समाज द्वारा मजबूर कर दी जाती हैं। वैसे समाज में इस वृत्ति को रोकने के लिए 1956 में वेश्यावृत्ति कानून बना। परंतु यह कानून वेश्यावृत्ति को मिटाने का प्रयास नहीं करताबल्कि सिर्फ चकलाघर चलाने या उसके लिए घर किराए पर देने या वेश्या के लिए दलाली करने को जुर्म की संज्ञा दे देता है। फलस्वरूपयह कानून न तो स्वेच्छा से या अकेले वेश्यावृत्ति करने पर कोई पाबंदी लगा पाता था और न ही इस व्यापार की जड़ यानी खरीददार पर। इस कानून के एवज में देखा जाए तो मुंबई ‘‘पुलिस के निगरानी प्रकोष्ठ शाखा के रिर्कार्ड के अनुसार पिछले छह वर्षों में 469 वेश्यालयों के मालिक पकड़े गएपर उनमें से कुल दो दंडित हुए। इनमें से एक भी दलाल या गृहस्वामी नहीं था। दूसरी तरफ इसी अरसे में 4,139 वेश्याएं वेश्यावृत्ति निरोधक कानून (सीता) के खंड 8(बी) के अंतर्गत और 44,663 बंबई पुलिस कानून के खंड 110 के अंतर्गत पकड़ी गई।’’17 इनमें से हर एक को दंडित किया गया। भारत में वेश्यावृत्ति या देहव्यापार अभी भी अनैतिक देहव्यापार कानून के तहत आते हैं। हालांकि देश में समय-समय पर इस बात को लेकर उच्चस्तरीय बहसें चलती रहीं हैं कि क्यों न वेश्यावृत्ति को कानूनन वैध बना दिया जाए। यानी यह कानून व्यर्थ रहायह स्वीकार करने के बाद उसकी व्यर्थता के कारणों को जांचने के बजाय इस पूरे धंधे से दंड व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी ही समेट लेराज्य व्यवस्था स्त्रियों के हिंसक उत्पीड़नशोषण और खरीदे बेचे जाने की पाशविक परंपरा को अपनी मूक असहाय सहमति दे दे?
वैसे इस वृत्ति के परिपे्रक्ष्य में देखा जाए तो भारत में सेक्स व्यवसाय या इससे जुड़ी प्रत्यक्ष गतिविधियां प्रतिबंधित है और इसे भारतीय कानून के तहत अपराध माना गया है। ‘‘इम्मोरल ट्रैफिक सप्रेशन एक्ट (सीटा) 1956 के तहत भारत में देह व्यापार अपराध है। सीटा कानून में 1986 में संशोधन करके इसे इम्मोरल ट्रेफिक प्रिवेंशन एक्ट (पीटा) नाम दिया गया। इसके अंतर्गत देह व्यापार का प्रचार करना भी अपराध है। किसी भी तरह की सेक्स सर्विस का विज्ञापन या फोन नंबर किसी भी माध्यम से प्रेषित करना गैरकानूनी है।’’18 इसके साथ ही साथ किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र में वेश्यालय नहीं चलाया जा सकता। इसी तरह से मसाज क्लबों या हेल्स स्पा के नाम से की जा रही अनैतिक गतिविधियां या संगठित देह व्यापार अपराध है। लेकिन इसके लिए लगाई जाने वाली कानूनी धाराओं में कई लूप होल हैं और अधिकतर धाराएं जमानती है। परंतु सामाजिक रूप से इस विषय को देखा जाए तो सभ्य समाज में अवैध व्यापार और वेश्यावृत्ति किसी प्रकार से स्वीकार्य नहीं है। पर फिर भी देश में सेक्स वर्कर और वेश्यावृत्ति का बाजार बढ़ा है। इस समस्या का कोई हल हो सकता है क्या? ‘वेश्यावृत्ति के मामले का जब कभी खुलासा होता है तो सामाजिक दबाव के चलते पारिवारिक लोग अपने बच्चे को स्वीकार नहीं करते हैं।19 ऐसी समस्या को मात्र कानून से नहीं बल्कि सामाजिक ढाचे के अनुसार स्वीकार करना होगा।