Wednesday, October 5, 2011

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया : तलाश भारतीय मॉडल की

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया : तलाश भारतीय मॉडल की
अपने शुरूआती दौर में यूरोप और अमरीका में पैदा हुआ नवीन मीडिया यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जहां दुनियां के पैमाने पर एक मजबूत प्रतिक्रिया के रूप में लिया गया, वहीं भारत में मीडिया मुद्दों का उभार अपने शुरूआती दौर में एक अद्द संचार के अलावा कुछ नहीं था। कुछ गंभीर विश्लेषकों, समाज-विज्ञानियों, चिंतकों यानी बुद्धिजीवियों ने थोड़ा ज्या्दा गंभीर होकर भारत में भी मीडिया मुद्दों के उभार को स्थामपित सामाजिक मूल्यों के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के अलावा कुछ नहीं माना.
सत्‍तर के दशक में पत्रकारिता के मूल मुद्दों के साथ-साथ मीडिया के हक में सवाल को तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संगठनों ने जब उठाना शुरू किया था तब तक मीडिया शब्दे न तो उतना प्रचलित हुआ था, और न ही शुद्ध अमरीकी-यूरोपीय मीडिया दृष्टिकोण ऐसे संगठनों के बीच विकसित हो पाया था। अस्सी के दशक के नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भारतीय संस्करण का तत्कालीन इतिहास रचता है और इस दशक के अंत तक विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दृष्टिकोणों के स्थानीय विस्तार का क्षितिज भारत में फैलता नजर आता है। नब्बे के दशक के शुरू होने से पूर्व ही भारतीय संस्कृति-मूल्य-परंपरागत प्रतीकों के जरिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्थाननीय यानी भारतीय प्रारूप तलाशने की कोशिश का विस्तार होता है और भारतीय इतिहास में मीडिया बिंबों को तलाशने की कोशिश भी होती है। नब्बे के दशक के बीचोबीच खड़ा भारतीय मीडिया एक साथ कई ज्वलंत प्रश्नों से जूझ रहा है। ऐसा लगता है कि इस समय भारत में मीडिया चिंतन लगभग हर स्तर पर, एक पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौर से गुजर रहा है।
प्रश्न यह है कि विभिन्न मीडिया नजरियों की सही-सही व्याख्या भारतीय समाज की स्था्नीकृत विशेषताओं, सांस्कृतिक, पारिस्थितिक, पर्यावरण और भौगोलिक राजनीतिक आदि के संदर्भ में, संभव है क्या। यदि हां तो संभावनाएं और प्रासंगिकताएं आखिर क्या और कैसी हैं
मीडिया ढेर सारे ऐसे प्रश्नों से जूझ रहा है, अपने लगभग 20 साल की उम्र में। ढाई दशक एक व्यक्ति की उम्र का यौवनकाल होता है, लेकिन एक उम्र के लिहाज से यह शैशवकाल भी हो सकता है और प्रौढ़ावस्था भी। वह इस बात पर निर्भर है कि मीडिया के मुद्दे क्या हैं, मुद्दों की प्रकृति क्या है, मुद्दे का हरपक्षीय कैनवास कितना सीमित या विस्तृत है। इस मानदंडों के आधार पर भारतीय समाज में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए 20-25 वर्ष शैशवकाल से ज्यादा कुछ नहीं. किंतु यदि यह शैशवकाल है तो एक शिशु गंभीर और बुनियादी सवालों से जूझ कैसे रहा है। क्याम भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समय से पहले परिपक्व् होना चाहता है. यह 20-25 साल नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उम्र है, न की संपूर्ण मीडिया की. सवाल तो यह भी है कि अगर ऐसा है तो नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उम्र संपूर्ण मीडिया के समकक्ष आंकी ही क्यों जाए। यह तो बात दुनिया के पैमाने पर भी लागू होती है. भारत में मीडिया दृष्टिकोण (जिसे भले ही मीडिया का दर्जा न मिला हो) तो यहां की संस्कृति में मौजूद रहा है. तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पैदाइश जब नहीं हुई थी, तो क्या भारत में या दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसा जज्बा, संस्कृति, व्यवहार आदि था ही नहीं, मैं इतिहास की गलियों में भटककर वहां से मीडिया या मीडिया की उत्पत्ति को तलाशने की बात नहीं करता. मेरा मतलब सिर्फ यह है कि आज भारतीय मीडिया को इस बुनियादी सवाल से जूझने की जरूरत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से उधार ली गई संस्कृति के वाहक मीडिया चिंतन, विश्लेषण और कार्यपद्धति को जिसकी असफलताएं दुनियां के तथाकथित विकासशील देशों में पिछले डेढ़ दशको में साबित की जा चुकी हैं, यहां से अपनी जमीन से कैसे अलग करना है। 20 वर्ष की उम्र में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस बुनियादी सवाल से जूझना है कि भारत में मीडिया का भारतीय मॉडल क्या होना चाहिए।
अब यह कहने का वक्त गुजर चुका है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रारूप ने भारतीय मीडिया की अधकचरी संस्कृति को ओढ़ने-बिछाने वाले एक छोटे से तबके को भले ही कुछ दे दिया हो, एक आम भारतीय समाज के लिए उसका कोई मूल्य या महत्व नहीं। यह क्लासका मीडिया मासका मीडिया बन ही नहीं सकता। तो भारत की मीडिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दावों, विश्लेषणों, व्यारख्याओं की प्रासंगिक तस्वीर कैसी होनी चाहिए, यह सबसे गंभीर और बुनियादी सवाल 20 वर्ष की उम्र में एक औसत भारतीय मीडिया की तरह वक्त से पहले परिपक्‍व हो चली भारतीय मीडिया की आंखों में चस्पां है।

Tuesday, October 4, 2011

गांधी और नेहरू की तरह क्‍यों याद नहीं करते लालबहादुर शास्‍त्री और भगत सिंह को

2 अक्टूबर यानी गांधी जंयती, पूरे भारत में बड़े धूम-धाम से मनायी गई. समस्त  भारतवासियों ने गांधी को याद किया और उनकी याद में हर साल की तरह इस साल भी जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. परंतु, लगभग देशवा‍सी उस शक्स को भूल गये, जिसका योगदान भी भारत की आजादी में रहा. हां मैं बात कर रहा हूं- लाल बहादुर शास्त्री जी की. जिसको कुछ एक लोगों ने ही याद किया. बाकि सभी गांधी जंयती के जश्न में चूर रहे. सही बात है बड़े लोगों को ही ज्यादा तबज्जों दी जाती है छोटे लोगों को कौन पूछता है. जिस तरह 24 सितंबर का दिन कुछ लोगों को ही याद‍ रहता है, बाकि सभी ....................   हां मैं भगत सिंह की ही बात कर रहा हूं, सभी अपने अंतरमन में झांककर बोलिए कितने लोगों ने 24 सितंबर के दिन भगत सिंह को याद किया. या फिर 2 अक्टूबर के दिन लाल बहादुर शास्त्री जी को.

इस तरह का भेदभाव कितना उचित है कितना अनुचित. कौन बता सकता है. क्या  भगत सिंह या लाल बहादुर शास्त्री ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान नहीं दिया. क्याय केवल-और-केवल अहिंसा के बल पर भारत को आजादी नसीब हो सकी. सोचने की बात है. यदि कोई यह नहीं सोच सकता तो सोचों कि हम उन लोगों को क्यों याद कर लेते है जिसका सरोकर हमको हमारा हक दिलाने में था भी और नहीं भी या फिर जातिगत था, धार्मिक था, या बाहुबली.

ऐसे बहुत सारे महान लोग है जिनको याद किया जा सकता है. परंतु नहीं. हम याद क्यों करें, यही सोच में सभी मदहोश रहते है. यदि पूरे भारत में देखा जाए तो लगभग अधिकांश जगहों पर गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी की प्रतिमायें दिख जायेंगी, यहां तक कि भारतीय मुद्रा पर भी इन्हीं लोगों का दबदबा बरकरार है, परंतु खोजने पर भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लालबहादुर शास्त्री की प्रतिमायें या मुद्रा नहीं मिलेंगी. इसका क्यां कारण है कोई हमको बता सकता है. शायद किसी के पास इसका कोई जबाव न हो. बड़े शर्म की बात है क्योंकि यहां भी कहीं-न-कहीं इन लोगों की जाति ही जिम्मेदवार है यदि ये लोग भी उच्च जाति के होते, तो इन लोगों को भी गांधी, नेहरू की तरह याद कर लिया जाता.
कुछ बड़े विद्वानों का मत है कि गांधी तेरे देश में भांति-भांति के लोग, क्या  यह देश सिर्फ गांधी का ही है, नहीं यह देश सिर्फ गांधी का नहीं है यह देश उन सभी का भी है जिन्होंने अपना खून बहाकर इस देश को आजादी दिलाने में बराबर का योगदान दिया. मैं गांधी की अलोचना नहीं कर रहा हूं, पर मैं उन सभी लोगों को याद दिलाने की कोशिश कर रहा हूं जिनकी कुर्बानी से आज हम आजाद हैं, ये मेरे वतन के लोग जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो वो कुर्बानी.

Friday, September 30, 2011

एक वोट का लोकतंत्र और उसकी राजनीति

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां चुनाव के जरिये सरकार का निर्माण किया जाता है और वही सरकार आम जनता पर राज्य करती है. अपनी हुकूमत चलती है अपने द्वारा निधारित कानूनों को समय-समय पर लागू करती रहती है. जो उनके पक्ष में हो केवल उन्हीं कानूनों को. बाकी सभी कायदे-कानून बनते ही है टूटने के लिए.
आज का लोकतंत्र एक वोट पर टिका हुआ है, सभी राजनैतिक पार्टियां एक वोट की राजनीति करती है. और कर रही है. यह वही वोट है जो एक पार्टी को सत्ता में लाता है और एक पार्टी को विपक्ष में खड़ा होने के लिए मजबूर कर देता है. इस एक वोट के गुनताड़े के लिए पार्टियां जनता से न जाने कितने झूठे वादे करते हैं, और जनता आस्‍वत होकर इनके झूठे बहकावे में अकसर आ ही जाती है. जैसे-जैसे समय बीतता है इन नेताओं के द्वारा किए गए वादों की पोल भी खुलती रहती है. और जनता सिर्फ एक ही गाना गुनगुनाती है. क्या हुआ तेरा वादा. और इनके पास कोई चारा नहीं बचता.
इन नेताओं के झूठे वादे पर टिकी सरकार अकसर चल ही जाती है कभी धर्म के नाम पर, तो कभी जाति के नाम पर., आखिर सरकार तो बन ही जाती है. बिना किसी रोक-टोक के. उस एक वोट से, जिसके पीछे यह दिन-रात एक करते हैं. अगर देखा जाए तो चुनाव में किसको कितने वोट मिले यह मायने नहीं रखता, मायने तो बस यह रखता है कि कौन-सी पार्टी को जीत मिली और किस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा. इस एक वोट की जुगाड़ करने के लिए अधिकांश पार्टियां हत्याक, लूटपाट, आतंकवाद, चोरी-डकैती आदि तमात घटनाओं को अंजाम देने से भी पीछे नहीं रहती. वो भी मात्र एक वोट के लिए.
इस एक वोट की राजनीति पर टिकी सरकार किसका कितना भला कर रही है और कितना भला हुआ है, यह जग जाहिर हो चुका है. अगर इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो आजादी के बाद से अब तक न जाने कितनी सरकारें आई और न जाने कितनी आके चली गई. उनके द्वारा निर्धारित की गई प्रणालियों, नीतियों से अब तक कितना विकास हुआ भारत का. समझ से परे की बात लगती है. क्या, आर्थिकीकरण और पूंजीवादी व्यवस्था  का हावी होना विकास की परिभाषा है. गरीबों की जमीनों का अधिकारण करना, और अपनी तिजौरियों को भरना, ही विकास है, एक सरकार बनती है तो कुछ नये कार्यों की नीतियां निर्धारित होती है जैसे ही दूसरी सरकार आती है तो पहले की नीतियां पता नहीं कहां विलुप्त हो जाती हैं. यह विकास का कौन-सा पैमाना तय करती है. यह तो सत्ता पर काबिज सरकार ही आसानी से बता सकती है. कि अब तक कितना विकास हुआ. कितना हो रहा है और कितना होगा. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि विकास नहीं हुआ है, विकास तो हुआ है पर किसका, अमीरों का, उच्च वर्गों का. क्या गरीब जनता का विकास हुआ है, वो तो आज भी अपने परिवार को दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है. इस डायन मंहगाई के दौर में. और नेता बात करते है विकास की, कि विकास तो हो रहा है, नजरिये-नजरिये का फर्क है. अपना नजरियां बदलो. देखा हमारी दृष्टि से. हम क्या देखें इनकी दृष्टि से, एक वोट की राजनीति को जो सदियों से चली आ रही है. और शायद चलती ही रहेगी. जिसके लिए हम ही जिम्मेदार है. जो बार-बार इनके बहकावे में आ जाते हैं. जब उस सरकार से पीडि़त होते है तो दूसरी और जब उससे पीडि़त होते है तो तीसरी, यही रोना सदियों से हो रहा है. जो एडस की तरह लाईलाज हमारे समाज को दीमक की भांति खोखला बना रहा है. जिसका इलाज किसी न किसी को तलाश करना पड़ेगा, नहीं तो एक वोट की राजनीति का शिकार एक दिन हम सब को कहीं फिर न गुलाम बना दें.

Thursday, September 29, 2011

मीडिया से नदारत इरोम चानू शर्मिला

5 नवम्बर, 2000 से सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला आज भी 11 साल बाद अपने अधिकारों की लड़ाई लड़े जा रही है. और इंफाल के जबाहर लाल नेहरू अस्‍पताल में आज भी जिंदगी और मौत से जंग लड़ रही है. जिसकी सुध-बुध लेना किसी ने मुनासिब नहीं समझा. चाहे सरकार हो या फिर मीडिया. कहने को तो मीडिया समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करने में मद्दगार साबित होता है परंतु ऐसा मीडिया किस काम का जो केवल अपने मतलब के लिए ही काम करें, जिसका समाज से कोई सरोकर न हो. वैसे कानून समाज में अपराध कम करने के एवज में बनाये जाते हैं, जब सरकारी तंत्र द्वारा ही मानवीय अधिकारों का हनन किया जाने लगे तो आम जनता किस के सामने अपनी फरियाद लेकर जाए. यह एक शोध का विषय हो सकता है. जिस पर गहन चिंतन की आवश्यकता जरूरी है.
अगर पूरे मामले पर विस्तार से गौर किया जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सबके सामने आ जाएगी कि जब से सरकार द्वारा मणिपुर में सशस्त्र  बल विशेषाधिकार कानून पारित किया गया. और जिसका फायदा उठाकर सशस्त्र बलों ने 11 लोगों को दिन दहाड़े गोलियों से भून दिया. यह एक घटना नहीं थी बल्कि ऐसी बहुत-सी मानवाधिकार हनन की घटनाये आये दिन मणिपुर में होती रहती हैं; इसी के विरोध में इरोम शर्मिला चाहती है कि मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (ए.एफ.एस.पी.ऐ.) को हटा दिया जाए. जिसके तहत अशांत घोषित क्षेतों में सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियां प्राप्त होती हैं. और वह राज्‍य सरकार के कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं भले ही इसमें किसी की जान क्यों न चली जाए. इसका परिणाम यह है कि सैनिक दल इसका दरूपयोग करते हैं. और इस कानून की आड़ में हत्या, बलात्कार, र्टाचर, गायब कर देना और गलत गिरफतारी जैसे कार्य सशक्त बलों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं.
सरकार द्वारा गठित सशक्त बल विशेषाधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) के जवानों द्वारा लगातार मानव अधिकारों का हनन किया जा रहा है जिस पर मीडिया लगातार चुप्पी साधे हुए है, ऐसी कौन-सी मजबूरी है जिसके कारण 11 सालों से मीडिया में इरोम शर्मिला लगभग पूरी तरह से नदारत रही. उसकी मांग के समर्थन में कुछ एक लोगों के आवाज उठायी, मगर मीडिया मुंह पर ताला लगाए हुए नजर आता रहा. जिस तरह से मीडिया ने अन्ना हजारे के अनशन को तबज्जों दी, और सरकार को आखिरकार अन्ना हजारे के पक्ष में झुकना ही पड़ा. वही मीडिया ने इरोम शर्मिला के 11 साल से चले आ रहे अनशन को दी, नहीं, बिलकुल नहीं दी. अगर मीडिया थोड़ा-सा ध्यान इरोम शर्मिला के अनशन पर केंद्रित करता तो कब का इस महिला को अधिकार मिल गया होता और सरकार ने इस महिला की मांग मान ली होती. परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. न तो मीडिया ने तबज्जो दी और न ही सरकार ने इसकी मांगों को जायज माना.
इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मीडिया का चरित्र उसकी भूमिका पर सवालिया निशान लगता है, कि ऐसे वो कौन-से मूल कारण है जिसकी वजह से मीडिया इन मांगों को उठाने में कोताही बरत रही है. क्या मीडिया का फर्ज पीडि़तों को न्याय दिलाने का नहीं बनता. ऐसे बहुत-सारे सवाल हमारे जहन में अक्सर उठते रहते हैं, कभी सरकार से तो कभी मीडिया से. वही साल-दर-साल इरोम शर्मिला पूरे मणिपुर को अधिकार दिलाने के लिए अकेले अनशन पर बैठी है.  अपनी जिंदगी, अपना परिवार, सबका मोह त्यागकर. क्या कभी हम इस महिला का वो मूल्यावान समय वापस लौटा सकेंगे. जो इसने गंवा दिये, सरकार के खिलाफ लड़ते-लड़ते, अपनी मांगों को लेकर. और मीडिया चुप्पी साधे तमाशबीन की भांति तमाशा देख रहा है. शायद आशा करता हो की कहीं कोई सनसनी खबर मिले जिस पर एक-दो दिन बहस की जा सके. इरोम शर्मिला में क्या रखा है. जैसे 11 साल बीत गये वैसे ही और साल बीत जायेंगे. इनका क्या बिगड़ने वाला है. तभी तो एक सिरे से नदारत है मीडिया से इरोम चानू शर्मिला.

Wednesday, September 28, 2011

मीडिया का बदनाम चेहरा

आम तौर पर मीडिया का जो चेहरा हमारे सामने आता है वो स्वच्छ्–साफ होता नहीं दिखाया जाता है. जिसमें हमको कोई बुराई नजर नहीं आती. परंतु यह सच्चा्ई नहीं है, परत-दर-परत, नकाब-पे-नकाब लगा हुआ चेहरा हमारे सामने परोसा जाता है, और पर्दे के पीछे की सच्चाई से हम रूबरू नहीं हो पाते. किस तरह मीडिया खबरों को बनाकर हमारे सामने परोसने का काम करती है यह जग जाहिर है, बावजूद इसके हम उन खबरों पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते हैं. शायद यह हमारी मजबूरी है. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता. क्योंकि सभी स्तंभ पूर्ण रूप से खोखले हो चुके हैं, हम यह कह सकते हैं कि अभी भी चौथे स्तंभ में जान बाकी है, पूरी तरह से खोखला नहीं हुआ है. हां यह बात और है कि कुछ एक मछलियों ने पूरे मीडिया समुदाय को गंदा कर दिया है. जिस प्रकार गेंहू के साथ घुन भी पीस जाता है और पता नहीं चलता, ठीक उसकी प्रकार मीडिया के कुछ बदनाम चेहरे जो मीडिया को दलदल की तह तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं उनके साथ स्वाच्छ, साफ छवि और ईमानदार लोग भी बदनामी का दंश झेलने को मजबूर हैं..
देखा जाए तो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में मीडिया की लड़ाई, मीडिया की आवाज अंग्रेजों के खिलाफ थी, खुद को और आने वाली पीढ़ी को स्वतंत्रता दिलाना उनका एक मात्र मकसद था. जिसके लिए मीडिया कोई भी कीमत चुकाने को तैयार था और कीमत चुकाई भी. हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि आजादी की लड़ाई में जितनी भूमिका क्रांतिकारियों, नेताओं की रही, उतनी ही भूमिका मीडिया ने भी निभायी. आखिरकार 15 अगस्त  1947 को अंग्रेजों के जुल्मों से भारत को आजादी मिल गई, आजादी मिलने के बाद लगा की हम स्वातंत्र हो गये हैं, परंतु ऐसा नहीं था. अंग्रेजों के जुल्मों –सितमों के बाद जिन नेताओं को हम अपना रहनूमा मान बैठे थे, उन्होंने भी हम पर कहर बरपाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे हुए जो अमीर थे वो और अमीर होते चले गये, और जो गरीब से उनकी स्थिति बद-से-बदतर होती चली गई. लगा कि कोई हमारी लाज बचाने नहीं आएगा. तब मीडिया ने अपनी शक्ति से सभी को वाकिफ करवाया. और पीडि़तों की आवाज बनकर समाज और बाहुबलियों के सामने खड़ा हो गया. गरीब व शोषित जनता को लगा कि मीडिया श्रीकृष्ण की भांति हमारी लाज बचाने आ गये हैं, परंतु जल्द ही उनका यह भ्रम भी टूटता चला गया.
आधुनिकीकरण और पूंजीवादी व्यवस्था ने मीडिया को भी अपनी चपेट में ले लिया. मीडिया अब गरीब जनता और पीडि़त व्यीक्ति को न्याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि मात्र खबरों के रूप में इस्तेमाल करने लगा. क्योंकि पूंजीवादी व्‍यवस्‍था जिस प्रकार समाज पर हावी होती गई, मीडिया पर उसका असर साफ दिखाई देने लगा. अब आलम यह हो चुका है कि समाज की नजरों में मीडिया की छवि श्रीकृष्ण  से कंस में तबदील हो चुकी है. हम पूरे मीडिया समुदाय को कंस नहीं कह सकते, शकुनी, द्रोणाचार्य, भीष्मच पितामाह, धृष्ट्रराज, द्रोयोधन, युधिष्टर, अर्जुन, भीम का भी दर्जा दे सकते हैं. जो अपनी कूटनीतियों में माहिर हो चुके हैं. उनको समाज से कोई सरोकार नही. वो खबरों को परोसने के साथ-साथ चटखारे भी ले रहे हैं, उससे उसको टी.आर.पी. मिल रही है, एक होड़ मची हुई है. कौन सबसे पहले द्रौपदी को दांव पर लगायेगा, कौन सबसे पहले उसको नंगा करेगा. उसके लिए वह कुछ भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं, क्योंकि मीडिया को द्रौपदी के नंगे होने में फायदा नजर आता है उसकी इज्जत बचाने में नहीं. मीडिया द्रौपदी जैसी न जाने कितनी महिलओं को नंगा करके परोस चुका है और कहता है, कि जो बिकता है उसी को दिखाया जाता है. शायद यह एक पहलु की हकीकत है कि समाज में व्याप्त पुरूष मानसिकता अब भी उसी पुरजोर तरीके से अपनी पकड़ बनाये हुए है, जिसका फायदा लगातार मीडिया उठाता आया है, और उठा भी रहा है. दूसरा पहलू यह भी है कि मीडिया गरीब व पीडितों (महिलायें भी शामिल) को अपनी ठाल बनाकर वार करता है, और खबरों को नमक-मिर्च लगाकर बार-बार नंगा करता है. मैंने पहले ही कहा है कि मीडिया में अब भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो मीडिया की साख बचाये हुए हैं, और गरीबों व पीडितों को खबर बनाकर नहीं बल्कि, उनको न्यालय दिलाने के लिए लड़ते नजर आते हैं, परंतु इनकी संख्या 10 में 1 या 2 ही है, बाकी सब-के-सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको हम अपना आइकन मानते थे, समाज में उनकी अपनी एक अलग पहचान थी. परंतु पूंजीवादी व्यवस्था के मोहमाया जाल की जकड़न से खुद को नहीं बचा पाए. और, समाज को नेताओं की भांति अपने मतलब की वस्तु व बिकाउ बना दिया.
मैं मीडिया पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ, मैं तो बस मीडिया का बदनाम चेहरा दिखाने की कोशिश कर रहा हूं, जिससे समाज अभी तक बाकिफ नहीं हो पाया है, इस आलोक में यह भी कहा जा सकता है कि इस तरह मीडिया का चेहरा बदनाम होता गया तो वो दिन दूर नहीं जब समाज का भरोसा मीडिया पर से पूरी तरह उठ जाएगा, और मीडिया शेयर बाजार के सेंसेक्स की तरह औंधे मुंह गिर पड़ेगा. अभी भी वक्त है वक्त रहते चेत जाए तो ठीक है नहीं तो मीडिया के पास पछताने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा.

Tuesday, September 27, 2011

मीडिया का दोहरा चरित्र या दोगलापन

आज मीडिया किस तर्ज पर काम कर रहा है, समझ से परे है; जिस भेड़चाल की भाषा का इस्‍तेमाल हो रहा है, वो सभी जानते हैं कि एक उच्‍चवर्ग की भाषा बोली जा रही है. कौन कह सकता है कि यह सभ्‍य मीडिया है, जो समाज में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को मिटाने में कारगर साबित होगा, जिसका पूरा गिरेवान दागदार हो और जो खुद पूरी तरह से इस दलदल में धस चुका हो, वो क्‍या समाज का उद्धार करेगा. अगर देखा जाए तो आज तक किसी भी मीडिया संस्‍थान ने यह दिखाने की जहमत नहीं उठायी कि फलां फलां समाचार पत्र में या न्‍यूज चैनल में फलां फलां व्‍यक्ति भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त है, या अपराधी है. जिस तरह से पुलिसवाले अपने भाईयों को (सहकर्मी) जल्‍द ही नहीं पकड़ती, जब तक उसने उपर कोई दवाब न पड़े, उससे भी बुरी दशा मीडिया की है, वो तो दवाब पड़ने के बावजूद भी उनके द्वारा किये गये अपराधों को समाज के सामने नहीं लाता, और पूरा मामला गधे के सिर से सींग की तरह गायाब कर दिया जाता है. शायद मीडिया डायन के तर्ज पर काम कर रहा है क्‍योंकि डायन भी सात घर छोड़कर वार करती है; उसी प्रकार मीडिया भी अपने भाईयों को और अपने रहनूमाओं को छोड़कर बाकी सभी को खबर बनाकर पेश करता रहता है. यह एक तरह का दोगलापन है, दोहरा चरित्र है.

वैसे मीडिया में दिखाई जाने वाली तमाम खबरों को देखकर आमजन की धारणा खुद ब खुद बन जाती है कि जो दिखाया जा रहा है वो सोलहआने सत्‍य है. उसमें झूठ की कहीं कोई गुंजाइस नहीं है. पर आमजन की कसौटी पर मीडिया पूरी तरह खरी नहीं उतरती. वो एक एक खबर की धाज्जियां उड़ाते हुए उस खबर से तालुक रखने वाले व्‍यक्ति का व उसके परिवार का समाज में जीना हराम कर देते हैं. क्‍योंकि वो खबर मध्‍यमवर्ग या फिर निम्‍न वर्गीय लोगों से होती है. उच्‍चवर्गीय लोगों से ताल्‍लुक रखने वाली खबर तो बस, खिलाडि़यों की, फिल्‍मी अभिनेता व अभिनेत्रियों की, नेताओं की, पार्टी में सिरकत लोगों की अधिकांश होती है. क्‍योंकि कहीं न कहीं इन उघोगपतियों और राजनेताओं द्वारा गरीबों का खून चूस चूसकर इक्‍ठ्ठा किया जाता है और उस धन से खोल लिया जाता है एक मीडिया संस्‍थान. काली कमाई को सफेद बनाने का एक आसान जरिया, और बड़ी आसानी से बन भी जाती है,
आज तक मैंने किसी भी मीडिया में यह खबर चलते नहीं देखा कि इस मीडिया संस्‍थान में इनकम टैक्‍स का छापा पड़ा हो, उसके मालिक के घर छापा पड़ा हो, और उसका घर या फिर मीडिया चैनल को सील कर दिया हो. क्‍या मीडिया इनता पाक साफ है कि उसके द्वारा कोई भी अपराध या लेनदेन की घटनायें नहीं होती. इस परिप्रेक्ष्‍य में क्‍या कहा जा सकता है; आमजन तो गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी  बांधकर सबकुछ सहन कर रहे है; वो सोचते है शायद हमारी यही नियती है; सदियों से झेलते आये है अब भी झेलना पड़ रहा है; जिस चौथे स्‍तंभ से न्‍याय की आस लगाये बैठे है वो ही अपराध में लिप्‍त हो चुका है, जो खुद अपराध में लिप्‍त है वो बाहुबलियों से पीडि़त व्‍यक्ति को क्‍या इंसाफ दिला पाएगा; इस न्‍याय आस में पीडि़त साल दर साल जीवित रहते है, और मर जाती हैं आस की वो सारी किरण, जो न्‍याय की दहलीज तक पहुंच सकें.


Monday, August 29, 2011

कैसी सरकार है, और एक और जंग का ऐलान करें

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कैसी सरकार है, और एक और जंग का ऐलान करें

पोस्टेड ओन: 29 Aug, 2011 जनरल डब्बा में
कैसी सरकार है जो अन्‍ना के अनशन पर गाहे बजाए आखिर मान गई. उसको इतना भी खयाल नहीं है उसे महिला का जो पिछले कई वर्षों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही है. हां मैं बात ईराम शर्मिला की ही कर रहा हूं. न तो किसी को इस बात का ख्‍याल आया कि उसके बारे में भी सोचा जाए. एक भी की जमात के शामिल तो हो जाते हैं, नहीं सोचते उसके बारे में. सही बात है किसी को क्‍या फर्क पड़ता है, जब अपने पर बितेगी तब समझ में आएगी.
मैं तो अन्‍ना से भी एक बात कहना चाहूंगा कि किसी ने नहीं सोचा तो आप तो सोच सकते थे. पर आपने भी कभी नहीं सोचा कि पिछले कई सालों से अनशन पर बैठी ईरोम शर्मिल की बात भी सुनी जाए, उसको भी अधिकार मिले.
ये तो नइंसाफी है शायद शार्मिला अन्‍ना नहीं है एक आम महिला जो हक की लड़ाई लड़ रहीं है. वैसे तो सदियों से महिलाओं का शोषण, उनके अधिकारों को दोहन होता आया है; और आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में भी हो रहा है. कितने भी कानून पारित कर लिए जाए, सभी कानून इस समाज के आगे बौने साबित हो चुके है. और मानवाधिकार व महिला आयोग चुप है सरकार के आगे.
मैं अपील कर रहा हूं भारत की जनता से कि जिस तरह आप सब ने अन्‍ना हजारे का साथ दिया, वैसे ही ईरोम शर्मिला का साथ दें, और सरकार को झुकने के लिए और उनको उनका अधिकार दिलाने के लिए आओं एक और जंग का ऐलान करें

शायद लोग अब अन्‍ना अन्‍ना चिल्‍लाना बंद कर देगें

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा, क्‍यों‍कि सभी की जुबान पर, चाहे आम आदमी हो, मीडिया हो या फिर सरकार, सभी अन्‍ना अन्‍ना चिल्‍ला रहे थे; कोई पक्ष में था तो कोई विपक्ष में, पर नाम तो अन्‍ना का ही लिया जा रहा था. सभी अन्‍ना की जमात में अपने आपको शामिल करने की कोशिश में लगे पडे थे, अब शायद शांत हो चुके होगें. लोकपाल बिल पास होने की संभावना बनने लगी है. अन्‍ना की शर्तों को मान लिया गया है.
मेरी एक बात समझ में अभी तक नहीं आई कि लोकपाल बिल पास हो जाने से भ्रष्‍टाचार पूर्ण रूप से समाप्‍त हो जाएगा, जो अपनी जडें बरगद के पेड की तरह इस धरती में धसाये हुए बडी तेजी से बढता जा रहा है. क्‍या ये खत्‍म हो सकता है. यदि हम सब अपने गिरेवान में झांककर देखे तो कभी न कभी जीवन में हमने भी किसी न किसी रूप में भ्रष्‍टाचार किया है या उसे बढावा दिया है. सोचो कभी ट्रेन में सीट के लिए टीसी को रूपये देना, कभी अपने बच्‍चों के एडमीशन के लिए, कभी बिल कम करवाने केलिए, कभी केस जीतने या एफआईआर दर्ज न करने के लिए, साथ तो दिया है. फिर क्‍यों चिल्‍ला रहे है. आखिर लत तो हमने ही लगाई है इसे बढाने के लिये. यह भ्रष्‍टाचार हमारी रग रग में समा चुका है और इतनी आसानी से नहीं जाने वाला. चाहे लोकपाल बिल पास हो जाए या फिर अन्‍ना की तरह कई और अन्‍ना खडे हो जाए.
मेरी मानों तो सारे नेताओं को इस देश से निकाल दो, फिर देखों भ्रष्‍टाचार स्‍वयं ही खत्‍म हो जाएगा. क्‍योंकि सारे फसाद की जड ये नेता ही है

Monday, July 25, 2011

आजाद हैं, जी रहे गुलामों की जिंदगी

स्‍वतंत्र है हम, स्‍वतंत्र. सोच रहा हूं कैसी आजादी है. कि आजाद होने के बावजूद भी आजाद महसूस नहीं कर पाते. तरह-तरह की बंदिशों की जंजीरों की जकड़न का एहसाह होता है. और कहे जाते है स्‍वतंत्र.
आजादी से पूर्व अंग्रेजों ने हम पर फूट डालकर खूब राज किया.अपनी सुविधा के अनुसार कानून का निर्माण कर हम पर थोप दिया गया.इन कानून की आड़ में अंग्रेजों ने अत्‍याचारों की बाढ़ लगा दी.इन अत्‍याचारों का एहसास आज की युवा पीढी को नहीं है.आजाद भारत की चाह लिए और अपनों को आजाद भारत का तोहफा देने के लिए युवा से लेकर बुर्जुगों ने अपनी जान पर खेलकर,अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया,और भारत को आजादी नसीब हुई.जिसका जश्‍न हम हर साल १५ अगस्‍त के दिन मना लेते है और भारत को आजाद कराने में हुए उन वीर मां के शहीद पुत्रों को याद कर लेते है जिनकी बदौलत हमें आजाद भारत के दर्शन हो सके.
भारत आजाद तो ६४ साल पहले हो गया था परंतु स्‍वतंत्र आज भी नहीं हुआ. पहले अंग्रेज हम पर राज करते थे अब नेता हम पर राज करते हैं.पहले अंग्रेज अत्‍याचार करते थे अब नेता करने के साथ-साथ करवाते भी हैं.जिस तरह के नियम अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार बनाये थे उन्‍हीं नियमों व कानून को आजाद भारत ढो रहा है.विधायिका, कार्यपालिका या फिर न्‍यायपालिका,सभी में अंग्रेजी हुकूमत की बू आती है.अंग्रेजों के कार्यकाल में भी गरीब जनता व महिलाओं के साथ अत्‍याचार व उत्‍पीड़न किया जाता था आज भी हो रहा है. पहले अंग्रेज करते थे आज नेता कर रहे हैं बदला क्‍या है. कभी-कभी अपनी जुबान को भी गंदा करना पडता है और वेबक ही कुछ-न-कुछ निकल ही आता है इन नेताओं की शान में. अगर हम इन नेताओं को अंग्रेजों की औलाद कहें तो गाली नहीं होगी.क्‍योंकि इनके कर्मों से ऐसा ही लगता है कि ये अंग्रेजों के वंशज है.मेरे एक मित्र का कहना है कि बच्‍चे घर का आईना होते है जिनसे परिवार की तस्‍वीर साफ दिखाई देती है. जैसे संस्‍कार माता-पिता में होते है ठीक वैसे ही संस्‍कार उनके बच्‍चों में दिखाई दे ही जाते हैं.
आजादी के बाद बने संविधान की बात करें तो मानव होने के नाते सभी मनुष्‍य को मूल अधिकारों के रूप में समता, स्‍वातंत्रय, शोषण के विरूद्ध, धर्मकी स्‍वतंत्रता एवं संस्‍कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार दिये गये हैं. जिनका दोहन किसी भी व्‍यक्ति या राज्‍य द्वारा नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके मानव अधिकारों का दोहन इन नेताओं द्वारा, कानून की नाक के नीचे हमेसा से किया जा रहा है.इन नेताओं के गिरेवान तक कानून के लंबे हाथ भी नहीं पहुंच पाते, इसका मूल कारण कानून की रक्षा का दायित्‍व जिनके कंधों पर है उनका सहयोग मिलना.यहां एक फिल्‍म में कहीं गयी कुछ पंक्तियां याद आती है कि गुनाह करने का, करने का. परंतु पकड़े नहीं जाने का, पकड़ा गया तो गुनाहगार, नहीं तो साहूकार. ये नेता गुनाह पर गुनाह करते रहते हैं और पुलिस की मिली भगत होने के कारण पाक साफ बच जाते हैं.
जम्‍मू कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक अत्‍याचारों की कतार लगी हुई है.भ्रष्‍टाचार तो अपने चरम पर पहुंच चुका है. भ्रष्‍टाचार के इस दीमक ने सभी को अपनी चपेट में ले लिया है. पेंशन से राशन तक, रोजगार से काम तक, हर जगह भ्रष्‍टाचार मचा हुआ है. छोटे से छोटा काम हो या बड़े से बड़ा. रिश्‍वत तो देनी ही पड़ती है. कोई कम खाता है कोई ज्‍यादा. अपना काम करवाना है तो खिलाना तो पड़ेगा ही. नहीं तो, आपका काम होगा इसकी भी उम्‍मीद अपने जेहन से निकाल दीजिए. ये आजाद भारत की तस्‍वीरें हैं. इससे अच्‍छा तो हम गुलाम ही रहते. हम अपने आप को गुलाम तो कह पाते. आजाद है गुलामी की जिंदगी जीने के लिए.
ऐसा चलता रहा तो आजादी का जश्‍न कुछ सालों का मेहमान बनकर न रह जाए,क्‍योंकि इन नेताओं की जमात देश की जड़ों को धीरे-धीरे खोखला बना रही है और अब भी लगे हुए है. जिस दिन ये जड़ें देश का भार उठाने के काबिल नहीं होगी उसी दिन कोई देश फिर से हमें अपना गुलाम बना लेगा.इसी फिराक में पाकिस्‍तान से लेकर चीन लगा हुआ है कि कब ये नेता अपने मतलब के लिए देश को गिरवी रखते है और हम देश पर अपनी हुकूमत.इन नेताओं की नीयत ठीक नहीं नजर आ रही है अपने स्‍वार्थ के चलते ये भारत को बेच भी सकते है. और हम मनाते रहे आजादी का जश्‍न. जागना होगा, हमें. आवाज उठानी होगी, एक होना होगा, और नेताओं के हाथों से देश की कमान छीननी पडे़गी, नहीं तो भारत देश को गुलाम होने से कोई नहीं बचा सकता.

Saturday, June 25, 2011

फेसबुक और सोशल साइटों पर बढता साइबर क्राइम का मकड जाल

ये बडी अशोभनीय बात है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी व अन्‍य लोगों की तस्‍वीरों को इस तरह से अभिनेत्री व अभिनेताओं की तस्‍वीरों के साथ मेल कराकर पोस्‍ट किया जा रहा है और उस पर लोगों द्वारा तरह-तरह के कमेंट दिये जा रहे हैं.ये कौन-सा अधिकार है,जिसमें फोटों के उपर चेहरा लगाकर उसकी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है.फेसबुक पर इस तरह की फोटों की भरमार मची हुई है और साइबर क्राइम कानून मौन साधे हुए सभी के मुंह ताकने में लगा हुआ है.जब देश के मंत्री, प्रधानमंत्री व अन्‍य नेता, राज्‍यनेताओं की तस्‍वीरों के साथ इस तरह का खिलवाड हो सकता है तो किसी भी नग्‍न तस्‍वीर को किसी लडके-लडकियों की तस्‍वीरों के साथ जोडकर उसको बदनाम करना बहुत ही आसान हो जाएगा, और कानून हाथों पर हाथ रखकर सबकुछ तमाशबीनों की तरह तमाशा देखता रहेगा.
सोशल साइट पर इस तरह का कृत्‍य हमारी सभ्‍यता के खिलाफ है. माना कि सभी को अपनी-अपनी बात कहने की पूरी आजादी है, सभी पूर्णरूप से स्‍वतंत्र हैं परन्‍तु ये स्‍वतंत्रता तभी तक होती है जब तक किसी दूसरे की स्‍वतंत्रता बाधित न हो.इसके बावजूद हमसब के द्वारा किसी के चेहरे पर किसी का चेहरा लगाया जाना क्‍या उचित है.लोग तो अपने घर की इज्‍जत बचाने की भरसक कोशिश करते रहते है पर ये क्‍या हम ही अपने देश की इज्‍जत को तार-तार करने में लगे हुए हैं.ये अपराध की श्रेणी में आता है,इस अपराध को रोकने के लिए साइबर कानून बना हुआ है. इसके बाद भी ऐसा हो रहा है, लगातार हो रहा है. शायद फेसबुक व सोशल साइटों पर साइबर कानून की नजर नहीं है या फिर सभी जगह चढने वाली चढोत्‍तरियां इनके द्वार पर चढ जाती होगी.तभी तो इन साइटों के खिलाफ कुछ भी कार्यवाही नहीं हो रही हैं, जो साइबर क्राइम को बढावा देने में लगी हुई हैं.