Friday, August 23, 2013

रिश्तों के आईने में भारतीय मीडिया

रिश्तों के आईने में भारतीय मीडिया


 
रिश्‍तों के आईने में भारतीय मीडिया इतना धंस चुका है कि उनका अब निकलना नमुमकिन-सा प्रतीत होने लगा है। यह जानकारी मेरे द्वारा संग्रहित नहीं की गई है अपितु यह जानकारी किसी अन्‍य न्‍यूमीडिया के द्वारा प्रकाशित की जा चुकी है। फिर भी मैं पुन: इस जानकारी को आप सब लोगों के सामने रख रहा हूं। यदि कोई त्रुटि रह गई हो तो संशोधन किया जा जा सकता है।
सुज़ाना अरुंधती रॉय, प्रणव रॉय (NDTV) की भांजी हैं। प्रणव रॉय काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस के इंटरनेशनल सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं। इसी बोर्ड के एक अन्य सदस्य हैं मुकेश अंबानी। प्रणव रॉय की पत्नी हैं राधिका रॉय। राधिका रॉय, बृन्दा करात की बहन हैं। बृन्दा करात, प्रकाश करात (CPI) की पत्नी हैं। प्रकाश करात चेन्नै के डिबेटिंग क्लब के सदस्य थे। एन राम, पी चिदम्बरम और मैथिली शिवरामन भी इस ग्रुप के सदस्य थे। इस ग्रुप ने एक पत्रिका शुरु की थी रैडिकल रीव्यू
CPI(M) के एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं सीमा चिश्ती। सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की रेजिडेण्ट एडीटर हैं। बरखा दत्त NDTV में काम करती हैं। बरखा दत्त की माँ हैं प्रभा दत्त। प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर थीं।
राजदीप सरदेसाई पहले NDTV में थे, अब CNN-IBN के हैं। राजदीप सरदेसाई की पत्नी हैं सागरिका घोष। सागरिका घोष के पिता हैं दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक भास्कर घोष। सागरिका घोष की आंटी रूमा पॉल हैं। रूमा पॉल उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं। सागरिका घोष की दूसरी आंटी अरुंधती घोष हैं। अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं। CNN-IBN का ग्लोबल बिजनेस नेटवर्क” (GBN) से व्यावसायिक समझौता है।
GBN टर्नर इंटरनेशनल और नेटवर्क-18 की एक कम्पनी है। NDTV भारत का एकमात्र चैनल है जो अधिकृत रूप से पाकिस्तान में दिखाया जाता है। दिलीप डिसूज़ा PIPFD (Pakistan-India Peoples’ Forum for Peace and Democracy) के सदस्य हैं। दिलीप डिसूज़ा के पिता हैं जोसेफ़ बेन डिसूज़ा। जोसेफ़ बेन डिसूज़ा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं। तीस्ता सीतलवाड भी PIPFD की सदस्य हैं। तीस्ता सीतलवाड के पति हैं जावेद आनन्द। जावेद आनन्द एक कम्पनी सबरंग कम्युनिकेशन और एक संस्था मुस्लिम फ़ॉर सेकुलर डेमोक्रेसी चलाते हैं। इस संस्था के प्रवक्ता हैं जावेद अख्तर। जावेद अख्तर की पत्नी हैं शबाना आज़मी।
करण थापर ITV के मालिक हैं। ITV बीबीसी के लिये कार्यक्रमों का भी निर्माण करती है। करण थापर के पिता थे जनरल प्राणनाथ थापर (1962 का चीन युद्ध इन्हीं के नेतृत्व में हारा गया था)। करण थापर बेनज़ीर भुट्टो और ज़रदारी के बहुत अच्छे मित्र हैं। करण थापर के मामा की शादी नयनतारा सहगल से हुई है। नयनतारा सहगल, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं। विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन हैं।
मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य प्रवक्ता और कार्यकर्ता हैं। नबाआं को मदद मिलती है पैट्रिक मेकुल्ली से जो कि इंटरनेशनल रिवर्स नेटवर्क (IRN)” संगठन में हैं। अंगना चटर्जी IRN की बोर्ड सदस्य हैं। अंगना चटर्जी PROXSA (Progressive South Asian Exchange Network) की भी सदस्य हैं। PROXSA संस्था, FOIL (Friends of Indian Leftist) से पैसा पाती है। अंगना चटर्जी के पति हैं रिचर्ड शेपायरो। FOIL के सह-संस्थापक हैं अमेरिकी वामपंथी बिजू मैथ्यू।
राहुल बोस (अभिनेता) खालिद अंसारी के रिश्ते में हैं। खालिद अंसारी मिड-डे पब्लिकेशन के अध्यक्ष हैं। खालिद अंसारी एमसी मीडिया लिमिटेड के भी अध्यक्ष हैं। खालिद अंसारी, अब्दुल हमीद अंसारी के पिता हैं। अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेसी हैं। एवेंजेलिस्ट ईसाई और हिन्दुओं के खास आलोचक जॉन दयाल मिड-डे के दिल्ली संस्करण के प्रभारी हैं।
नरसिम्हन राम (यानी एन राम) दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार द हिन्दू के मुख्य सम्पादक हैं। एन राम की पहली पत्नी का नाम है सूसन। सूसन एक आयरिश हैं जो भारत में ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिकेशन की इंचार्ज हैं। विद्या राम, एन राम की पुत्री हैं, वे भी एक पत्रकार हैं। एन राम की हालिया पत्नी मरियम हैं। त्रिचूर में आयोजित कैथोलिक बिशपों की एक मीटिंग में एन राम, जेनिफ़र अरुल और केएम रॉय ने भाग लिया है। जेनिफ़र अरुल, NDTV की दक्षिण भारत की प्रभारी हैं। जबकि केएम रॉय द हिन्दू के संवाददाता हैं। केएम रॉय मंगलम पब्लिकेशन के सम्पादक मंडल सदस्य भी हैं। मंगलम ग्रुप पब्लिकेशन एमसी वर्गीज़ ने शुरु किया है। केएम रॉय को ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ़टाइम अवार्ड से सम्मानित किया गया है। ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं जॉन दयाल। जॉन दयाल ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल” (AICC) के सचिव भी हैं। AICC के अध्यक्ष हैं डॉ जोसेफ़ डिसूज़ा। जोसेफ़ डिसूज़ा ने दलित फ़्रीडम नेटवर्क की स्थापना की है। दलित फ़्रीडम नेटवर्क की सहयोगी संस्था है ऑपरेशन मोबिलाइज़ेशन इंडिया” (OM India) OM India के दक्षिण भारत प्रभारी हैं कुमार स्वामी। कुमार स्वामी कर्नाटक राज्य के मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी हैं।
OM India के उत्तर भारत प्रभारी हैं मोजेस परमार। OM India का लक्ष्य दुनिया के उन हिस्सों में चर्च को मजबूत करना है, जहाँ वे अब तक नहीं पहुँचे हैं। OMCC दलित फ़्रीडम नेटवर्क (DFN) के साथ काम करती है। DFN के सलाहकार मण्डल में विलियम आर्मस्ट्रांग शामिल हैं। विलियम आर्मस्ट्रांग, कोलोरेडो (अमेरिका) के पूर्व सीनेटर हैं और वर्तमान में कोलोरेडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेण्ट हैं। यह यूनिवर्सिटी विश्व भर में ईसा के प्रचार हेतु मुख्य रणनीतिकारों में शुमार की जाती है। DFN के सलाहकार मंडल में उदित राज भी शामिल हैं। उदित राज के जोसेफ़ पिट्स के अच्छे मित्र भी हैं। जोसेफ़ पिट्स ने ही नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने के लिये कोंडोलीज़ा राइस से कहा था। जोसेफ़ पिट्स कश्मीर फ़ोरम के संस्थापक भी हैं। उदित राज भारत सरकार के नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल (राष्ट्रीय एकता परिषद) के सदस्य भी हैं। उदित राज कश्मीर पर बनी एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी हैं।
सुहासिनी हैदर, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री हैं। सुहासिनी हैदर, सलमान हैदर की पुत्रवधू हैं। सलमान हैदर, भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके हैं, चीन में राजदूत भी रह चुके हैं। रामोजी ग्रुप के मुखिया हैं रामोजी राव। रामोजी राव ईनाडु” (सर्वाधिक खपत वाला तेलुगू अखबार) के संस्थापक हैं। रामोजी राव ईटीवी के भी मालिक हैं। रामोजी राव चन्द्रबाबू नायडू के परम मित्रों में से हैं।
डेक्कन क्रॉनिकल के चेयरमैन हैं टी वेंकटरमन रेड्डी। रेड्डी साहब कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं। एमजे अकबर डेक्कन क्रॉनिकल और एशियन एज के सम्पादक हैं। एमजे अकबर कांग्रेस विधायक भी रह चुके हैं। एमजे अकबर की पत्नी हैं मल्लिका जोसेफ़। मल्लिका जोसेफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्यरत हैं।
वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी आंध्र-प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। सेमुअल रेड्डी के पिता राजा रेड्डी ने पुलिवेन्दुला में एक डिग्री कालेज व एक पोलीटेक्नीक कालेज की स्थापना की। सेमुअल रेड्डी ने कहा है कि आंध्रा लोयोला कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उक्त दोनों कॉलेज लोयोला समूह को दान में दे दिये। सेमुअल रेड्डी की बेटी हैं शर्मिला। शर्मिला की शादी हुई है अनिल कुमार से। अनिल कुमार भी एक धर्म-परिवर्तित ईसाई हैं जिन्होंने अनिल वर्ल्ड एवेंजेलिज़्म नामक संस्था शुरु की और वे एक सक्रिय एवेंजेलिस्ट (कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक) हैं। सेमुअल रेड्डी के पुत्र जगन रेड्डी युवा कांग्रेस नेता हैं। जगन रेड्डी जगति पब्लिकेशन प्रा. लि. के चेयरमैन हैं। भूमना करुणाकरा रेड्डी, सेमुअल रेड्डी की करीबी हैं। करुणाकरा रेड्डी, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की चेयरमैन हैं। चन्द्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि लैंको समूह को जगति पब्लिकेशन्स में निवेश करने हेतु दबाव डाला गया था। लैंको कम्पनी समूह, एल श्रीधर का है। एल श्रीधर, एल राजगोपाल के भाई हैं। एल राजगोपाल, पी उपेन्द्र के दामाद हैं। पी उपेन्द्र केन्द्र में कांग्रेस के मंत्री रह चुके हैं। सन टीवी चैनल समूह के मालिक हैं कलानिधि मारन। कलानिधि मारन एक तमिल दैनिक दिनाकरन के भी मालिक हैं। कलानिधि के भाई हैं दयानिधि मारन। दयानिधि मारन केन्द्र में संचार मंत्री थे। कलानिधि मारन के पिता थे मुरासोली मारन। मुरासोली मारन के चाचा हैं एम करुणानिधि (तमिलनाडु के मुख्यमंत्री)।
करुणानिधि ने कैलाग्नार टीवी का उदघाटन किया। कैलाग्नार टीवी के मालिक हैं एम के अझागिरी। एम के अझागिरी, करुणानिधि के पुत्र हैं। करुणानिधि के एक और पुत्र हैं एम के स्टालिन। स्टालिन का नामकरण रूस के नेता के नाम पर किया गया। कनिमोझि, करुणानिधि की पुत्री हैं, और केन्द्र में राज्यमंत्री हैं। कनिमोझी, “द हिन्दू अखबार में सह-सम्पादक भी हैं। कनिमोझी के दूसरे पति जी अरविन्दन सिंगापुर के एक जाने-माने व्यक्ति हैं।
स्टार विजय एक तमिल चैनल है। विजय टीवी को स्टार टीवी ने खरीद लिया है। स्टार टीवी के मालिक हैं रूपर्ट मर्डोक।
Act Now for Harmony and Democracy (अनहद) की संस्थापक और ट्रस्टी हैं शबनम हाशमी। शबनम हाशमी, गौहर रज़ा की पत्नी हैं। अनहद के एक और संस्थापक हैं के एम पणिक्कर। के एम पणिक्कर एक मार्क्सवादी इतिहासकार हैं, जो कई साल तक ICHR में काबिज रहे। पणिक्कर को पद्मभूषण भी मिला। हर्ष मन्दर भी अनहद के संस्थापक हैं। हर्ष मन्दर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। हर्ष मन्दर, अजीत जोगी के खास मित्र हैं। अजीत जोगी, सोनिया गाँधी के खास हैं क्योंकि वे ईसाई हैं और इन्हीं की अगुआई में छत्तीसगढ़ में जोर-शोर से धर्म-परिवर्तन करवाया गया और बाद में दिलीपसिंह जूदेव ने परिवर्तित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी करवाई। कमला भसीन भी अनहद की संस्थापक सदस्य हैं। फ़िल्मकार सईद अख्तर मिर्ज़ा अनहद के ट्रस्टी हैं। मलयालम दैनिक मातृभूमि के मालिक हैं एमपी वीरेन्द्रकुमार। वीरेन्द्रकुमार जद(से) के सांसद हैं (केरल से)। केरल में देवेगौड़ा की पार्टी लेफ़्ट फ़्रण्ट की साझीदार है।
शशि थरूर पूर्व राजनैयिक हैं। चन्द्रन थरूर, शशि थरूर के पिता हैं, जो कोलकाता की आनन्दबाज़ार पत्रिका में संवाददाता थे। चन्द्रन थरूर ने 1959 में द स्टेट्समैन की अध्यक्षता की। शशि थरूर के दो जुड़वाँ लड़के ईशान और कनिष्क हैं, ईशान हांगकांग में टाइम्स पत्रिका के लिये काम करते हैं। कनिष्क लन्दन में ओपन डेमोक्रेसी नामक संस्था के लिये काम करते हैं। शशि थरूर की बहन शोभा थरूर की बेटी रागिनी (अमेरिकी पत्रिका) इंडिया करंट्स की सम्पादक हैं। परमेश्वर थरूर, शशि थरूर के चाचा हैं और वे रीडर्स डाइजेस्ट के भारत संस्करण के संस्थापक सदस्य हैं।
शोभना भरतिया हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की अध्यक्ष हैं। शोभना भरतिया केके बिरला की पुत्री और जीड़ी बिरला की पोती हैं। शोभना राज्यसभा की सदस्या भी हैं जिन्हें सोनिया ने नामांकित किया था। शोभना को 2005 में पद्मश्री भी मिल चुकी है। शोभना भरतिया सिंधिया परिवार की भी नज़दीकी मित्र हैं। करण थापर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में कालम लिखते हैं। पत्रकार एन राम की भतीजी की शादी दयानिधि मारन से हुई है।
न्यूज़ 24 की चेयरमेन है अनुराधा प्रसाद। अनुराधा प्रसाद कांग्रेस नेता और राहुल बाबा के तलवे चट्टू चमचे राजीव शुक्ल की पत्नी है। राजीव शुक्ल राजनीती में आने से पहले इ -टीवी हिंदी में झोला छाप पत्रकार थे। राजीव शुक्ल ने राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को मीडिया में किसी भी तरह लाने के लिए पत्रकारिता के सारे मूल्यों और सिधान्तो को ताक पर रख दिया। कई बार तो वे राहुल गाँधी के जूठे प्लेट उठाते और उनके जूते साफ करते भी देखे गए। उसके इनाम में राहुल गाँधी ने उन्हें राज्य सभा का सदस्य और BCCI का वाइस प्रेसिडेंट बना दिया। कुछ दिन पहले राहुल गाँधी के काफिले से एक आदमी घायल हो गया था। राहुल गाँधी ने 100 नंबर पर कॉल करके अम्बुलेंस बुला लिया। न्यूज़ 24 ने इसे राहुल गाँधी की महानता  के तौर पर दो दिन तक दिखाया।
प्रभु चावला पहले आज तक में थे। प्रभु चावला के बेटे के नाम है अंकुर चावला। अंकुर चावला दिल्ली में सत्ता न जाना माना दलाल है। नीरा राडिया टेप में प्रभु चावला का भी नाम आया। आज तक ने प्रभु चावला को निकाल दिया। अभी प्रभु चावला इ टीवी में है
एडमिरल सुरेश मेहता ने बरखा को कारगिल युद्ध के दौरान तीन जवानों की हत्या का दोषी माना था जिसमे बरखा की लाइव कवरेज के दौरान बताये गए लोकेशन को ट्रेस कर पाकिस्तान ने तीन भारतीय जवानों को मार गिराया था, जबकि उन्हें ऐसा करने से मोर्चे पर मौजूद सैनिकों ने बार बार रोका था, हैरानी ये कि उस वक़्त रक्षा मंत्रालय के जबरदस्त विरोध के बावजूद बरखा के खिलाफ कोई वैधानिक कार्यवाही नहीं की जा सकी थी। NDTV 24X7 की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त और हिन्दुस्तान टाईम्स ग्रुप के एडिटर वीर सांघवी का नाम टेलीकॉम घोटाले के मामले में सीबीआई के दस्तावेज़ों में बतौर दलाल दर्ज है।
संसद नोटकांड मामले में CNN-IBN के एडिटर-इन-चीफ और मालिक राजदीप सरदेसाई का नाम बतौर सीडी मैनेजर सामने आया है।
इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटर रहे प्रभु चावला अमर सिंह की चर्चित सीडी में डिलींग करते हुए सुनाई दे रहे हैं और उनके बेटे अंकुर चावला का नाम सीबीआई के दस्तावेजों में बतौर वित्तीय घालमेल के दलाल के तौर पर दर्ज है।
ये तो सिर्फ कुछ रिश्ते उदहारण भर हैं…. हिन्दू विरोधी मीडिया …….के ……. कुछ घटनाओ की वास्तविकता और मीडिया हैड्लाइन्स के बारे में हम अगले लेखो में बताएगे  सूचनाए कुछ पुरानी है हो सकता है कुछ त्रुटि हो अतः संशोधित स्वयं कर सकते हैं।

Friday, July 19, 2013

देख तमाशा नग्नता का

देख तमाशा नग्नता का
शायद मेरे पूरे जीवन में सिर्फ और सिर्फ यात्रा करना ही लिख है तभी तो एम.ए. और एम.फिल के दौरान ललितपुर से झांसी पूरे साढे़ तीन साल यात्रा की, वो भी प्रतिदिन। हां रविवार ओर अवकाश के दिन थोड़ी राहत जरूर मिल जाती थी। इसके बाद पीएचडी में प्रवेश हुआ तो हर माह एक दो यात्राएं कभी घर तो कभी शोध कार्य के संबंध में यहां-वहां आना-जाना पड़ता ही रहा। फिर पीएचडी पूर्ण हुई तो नौकरी के लिए दर-दर भटकने का सफर शुरू हो गया। नौकरी तो अभी तक नहीं हासिल हुई, परंतु पोस्ट डॉक्टरल में चयन जरूर हो गया। तो सोचा चलो दो साल तो कुछ करने को मिला। इसके साथ-साथ नौकरी के लिए जंग जारी है। वैसे मैंने इस माह बहुत-सी यात्रा कर ली जैसे वर्धा से घर, घर से राजस्थान, जबलपुर, बिलासपुर, भोपाल, वर्धा और फिर दिल्ली का सफर। एक माह में 12 यात्राएं। बहुत होती है, हैं न?
हालांकि किस्मत में जो लिख गया है सफर करते रहना, तो किस्मत का लिखा कौन टाल सकता है? वैसे दिनांक 14 को मैं एक साक्षात्कार हेतु दिल्ली गया था। चूंकि साक्षात्कार का समापन कुछ शीघ्र हो गया तो मेरे पास लगभग 9 से 10 घंटे का समय बच गया, क्योंकि मेरी दिल्ली से वापसी की ट्रेन रात्रि 11 बजे थी। साक्षात्कार पूर्ण होने के उपरांत बस से वापस निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचा, चूंकि बस वाले ने मुझे रोड़ पर ही उतार दिया था, तो रेलवे स्टेशन के समीप की बने इंद्रप्रस्थ पार्क पर मेरी दृष्टि गई, सोचा समय-ही-समय है हमारे पास। क्यों न कुछ समय पार्क में ही बिता लिए जाए। पर मैंने यह कदापि नहीं सोचा था कि मेरा पूरा समय कुछ घंटों में ही तब्दील हो जाएगा। पार्क में प्रवेश करते ही मेरी आंखें वहां पर पहले से बैठे एक प्रेमी जोड़े पर गई जिनको देखकर उनकी उम्र का अंदाजा आसानी से लगया जा सकता था यानी नाबालिग प्रेमी जोड़ा। जो अपनी और सामाजिक तमाम शर्मोहया को ताक पर रखकर प्रेम में लिप्त थे। उनको उनकी खुली अवस्था में देखकर दिमाग ठनक गया। उस जोड़ें को उनके उसी हाल पर छोड़ पार्क के भीतरी भाग में प्रवेश करने लगा। तो देखा कि एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, लगभग 40 से 50 प्रेमी जोड़ें। नाबालिग से लेकर अघेड़ उम्र के जोड़ें। कोई इस झांड़ी में तो कोई उस झाड़ी में, सिर्फ ओट ही कभी थी उनके लिए। वहां से गुजरते हुए एक सफाई कर्मी से इस संदर्भ में वार्तालाप की तो उसने कहा कि, मैं यहां पिछले 15 सालों से काम कर रहा हूं और पिछले 15 सालों से ही इन सब लोगों के कारनामों को देख रहा हूं। इसके बाद मैंने वहां पर तैनात कुछ सुरक्षा कर्मी से बात की तो पता चला कि यह पार्क सुबह 6 बजे खलता है ओर रात्रि के 8 बजे के बाद बंद होता है। यहां पर सब कुछ होता है प्यार के नाम पर। सब कुछ का तात्पर्य समझने के बाद भी नसमझ बनते हुए जाना तो ज्ञात हुआ कि प्यार में लिप्त यह जोड़ें मौका मिलते ही अपनी शारीरिक जरूरतों की पूर्ति भी कर लेते हैं। मैंने पूछा कि बिना किसी रोक-टोक के, जबाव मिला कि जब पुलिस वाले और हमारे अधिकारी इन पर रोक नहीं लगाते, तो हमें क्या पड़ी है जो हो रहा है होने देते हैं। फिर मन नहीं माना तो पिछले गेट पर तैनात तीन पुलिस कर्मियों के पास जा पहुंचा। बात करने पर पता चला कि सरकार ही कोई रोक नहीं लगाना चाहती, और यह तो यहां प्यार की पूर्ति हेतु आते हैं इसमें गलत क्या है? यह दिल्ली है भई। यहां सब कुछ जायज है कुछ नजायज नहीं है। तब मैंने उनसे कहा कि यहां प्रेमी जोड़े के अलावा भी बहुत सारे लागे आते-जाते होंगे? उन पर क्या असर होता होगा। तब तपाक से जबाव मिला उनके लिए ही तो हम बैठे हैं। फिर मैंने कहा कि इसका नाम इंद्रप्रस्थ पार्क के स्थान पर लव प्वाइंट या प्रेमालिंगन पार्क क्यों नहीं कर दिया जाता। जबाव भी विचित्र मिला, सरकार चाहेगी तो वो भी कर दिया जाएगा।
उन पुलिस वालों से बात करने के उपरांत मैं पुनः पार्क में आ गया। जहां पर अभी-अभी एक प्रेमी जोड़ा आया जिसमें लड़के की उम्र मो 25 के आस-पास होगी परंतु लड़की की उम्र तो 14 से भी कम लग रही थी। दोनों को गौर से देखा, लड़का हाथ में हेलमेट लिए हुए था ओर लड़की अपने कंधों पर एक बैग। जिसको देखने के बाद कोई भी समझ सकता था कि यह स्कूल की छात्रा होगी। वो भी 9 या 10 की। आते ही वो एक झाड़ी के बीचों-बीच चले गए। फिर वो भी शुरू हो गए, अपनी प्रेम लीलाओं को अंजाम देने। सारी लोक-लाज को तांक पर रखकर। एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जिस संस्कृति को कभी भारतीय संस्कृति ने स्वीकार नहीं किया। और शायद स्वीकार भी न कर सके। इस तरह का नग्न खेल। वहीं वहां पर मौजूद लोग गिद्ध की भांति देख रहे थे, तांक-झांक कर रहे थे, कहीं कुछ अच्छा देखने को मिल जाए। क्या जवान और क्या बूढ़ा। सभी लगे थे तांक-झांक में। कोई छिप कर देख रहा था, कोई पास जाकर अपनी आंखों को सेंक रहा था और वो लोग बिना झेंप और खौंफ के, शर्म के हया के, लाज-लज्जा के, पारिवारिक मान-सम्मान के, दिखा रहे थे अपने प्यार का तमाशा। देख तमाशा देख हमारे नग्नता के प्यार का।
इतना सब देखने के बाद मन क्षीण होने लगा, सोचने लगा क्या होगा इनका, क्या भविष्य होगा? वहीं मां-बाप पर क्या गुजरेगी यदि इसकी जानकारी उनको लग जाए। वैसे तो यह बात सही है कि मां-बाप कहां तक अपने बच्चों के पीछे-पीछे घूम सकते हैं। न ही पूरे समय निगरानी रख सकते हैं वो अपना काम करें या बच्चों पर निगरानी रखें। वह तो बस यही बता सकते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। यह तो बस बच्चों को सोचना चाहिए कि वो अपने मां-बाप को धोखा दे रहे हैं, और अपने जीवन के साथ एक बुरा मजाक। जो सिर्फ वासना की पूर्ति और वक्त के साथ-साथ जो ठंड़ा पड़ने लगता है। जिसके साथ अभी हैं वो फिर पूर्ति होने के बाद साथ में नहीं रहता या रहना नहीं चाहता। क्योंकि जिस चीज की उसे तमन्ना थी उसको उसने पा लिया। अब वह ता उम्र उसे बर्दास्त नहीं करना चाहता। निकल पड़ता है किसी और की तलाश में। वहीं लड़कियां भी अब ऐसा ही करने लगी है एक छोड़ एक। जहां पैसा और शोहरत दिखाई दी वहीं दौड़ जाती है। यह सोचे बिना कि क्या देगी वो अपनी होने वाले पति को, या पत्नी को। सिर्फ झूठ की बुनियाद पर टिकी एक जिंदगी। हरिशचंद्र या सती-सावत्री के नाम पर।तमाशा बना दिया है प्यार का। मेरी यह बात बुरी लग सकती है यदि प्यार के नाम पर जिस्मानी भूख मिटाने का इतना ही शौक है तो फिर अपने परिवार वालों से क्यों नहीं कहते की हमारी शादी उससे करवा दें। तब नानी मरती है प्यार किसी से, जिस्मानी ताल्लुकात किसी से और शादी किसी और से।
इतना सब कुछ देखने के बाद सिर्फ और सिर्फ यही निष्कर्ष पर पहुंचा कि इस तरह का खुला नग्नतापूर्ण प्यार कहीं-न-कहीं महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचार के मूल में है। खुला नग्नतापूर्ण या यूं कहें अश्लीलता परिपूर्ण दृश्य जिसको देखकर आम युवकों में उत्तेजना जरूर जगृत होती है और वो कहीं-न-कहीं जाकर बलात्कार का कारण बनती है। वहीं दहेज और घरेलू हिंसा की बात करें तो सारे परिप्रेक्ष्य में यह खुला अश्लील प्यार ही है। क्योंकि लड़की की शादी जिससे वह प्यार करती है और मां-बाप अपनी मर्जी से कर देते हैं तो वह अपने पति व ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ना का आरोप लगा देती है (आज के प्ररिप्रेक्ष्य में और कुछ अपवादों को छोड़कर) और कहती है कि देखों मैंने मना किया था आप नहीं मानें। फिर मां-बाप भी चुप और वो फिर अपने प्रेमी की बांहों में। यहीं प्रेमी की बांहें घरेलू हिंसा का भी कारण बनती हैं क्योंकि शादी के बाद कभी-न-कभी पति या पत्नी को उसके जीवन के अतीत के बारे में पता चल ही जाता है। जिसकी राह सिर्फ और सिर्फ तलाक के धरातल पर जाकर खत्म होती है। तलाक यानि पूरी जिंदगी खंड-खंड में विभाजित। मां और बा पके विभाजन के साथ-साथ मासूम बच्चों का भी विभाजन।
अब क्या बचा जिंदगी में पछतावे के अलावा। और पछतावा भी अपने कर्मों से। मां-बाप से झूठ का नतीजा। अब पछताएं होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। अगर ऐसा-वैसा कुछ नहीं हुआ तो आखिरी में इनके बच्चे यदि इन्हीं के पर चिह्नों पर चल पड़ते हैं तो यह अपनी वास्तविक हकीकत से जरूर रूबरू हो जाएंगें कि किस नग्नता का तमाशा हम लोगों ने खेला था। अब वो ही हमारे बच्चे कर रहे हैं। जिन पर चाह कर भी वो रोक नहीं लगा सकते। क्योंकि जैसा बोओगें वैसा ही काटने को मिलेगा। नग्नता परोसेगें तो संस्कृति, सभ्यता, नैतिकता, आदर कहां से मिलेगा। सोचो वक्त अभी हाथों ने नहीं निकला है सोचो? और कुछ करो?


Thursday, July 4, 2013

एक के बाद एक: फर्ज़ी मुठभेड़

एक के बाद एक: फर्ज़ी मुठभेड़
पुलिस की तानाशाही व्यवस्था और सरकार को गुमराह करने वाली पुलिसिया नीति आखि़र कहीं-न-कहीं बहुत से ऐसे कार्यों को अंज़ाम देती है, जिससे न्यायिक व्यवस्था शर्मशार जरूर होती होगी। इसी पुलिसिया नीति ने बहुत-सी फर्ज़ी मुठभेड़ों को भी अंज़ाम दिया है। ‘‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार विगत 17 वर्षों में कुल 1224 फर्ज़ी मुठभेड़ हुई हैं।’’ इनमें सबसे ऊपर उत्तर प्रदेश, फिर बिहार, आंध्र प्रदेश और उसके बाद महराष्ट्र तथा सबसे नीचे गुजरात है।
वैसे तो देश में बहुत सारी फर्ज़ी मुठभेड़ हुई हैं, जिनमें बाटला हाउस भी उल्लेखनीय है। बाटला हाउस मुठभेड़ कांड को लगभग 5 वर्ष होने को है। ‘‘बाटला हाउस मुठभेड़ में पुलिस ने 19 सितंबर, 2008 को जामिया नगर के बाटला हाउस में रह रहे आजमगढ़ के आतिफ़ अमीन (24 वर्ष) और मुहम्मद साज़िद (17 वर्ष) को गोलियों से भून दिया था। इस घटना को सरकारी दस्तावेज भी प्रमाणित करते हैं।’’ सरकार और पुलिस मारे गए दोनों बच्चों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट न देने के विभिन्न हथकंडे अपनाती रही। उनका मानता था कि इससे आतंकवादियों को सहयोग मिलेगा और पुलिस का मनोबल भी गिरेगा। दूसरी मानवाधिकार संरक्षण के लिए बनायी गई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का चरित्र भी खुलकर सामने आया। पहले तो मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में एनकाउंटर को क्लीन चिट दे दी थी। परंतु, अफ़रोज आलम साहिल द्वारा मानवाधिकार आयोग से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से ज्ञात हुआ कि पुलिस ने दोनों मासूमों की हत्या की थी। दोनों के शरीर पर चोटों के निशान प्रमाणित करते हैं कि दोनों को गोली मारने से पहले बुरी तरह से मार-पीटा गया था। मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रदान की गई रिपोर्ट पुलिस के उस दावे को खोखला साबित करती है कि पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई थी।
मानवाधिकार आयोग पहले इस कांड को सही बता रही थी, परंतु अपनी रिपोर्ट के बाद उसने माना कि बाटला हाउस का एनकाउंटर फर्ज़ी था। यह खुलासा खुद आयोग की उस लिस्ट से हुआ था, जिसमें पिछले सोलह साल के दौरान हुए फर्ज़ी मुठभेड़ों की चर्चा की गई थी। सूचना कानून के तहत मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली के अफ़रोज आलम को 50 पन्नों की लिस्ट उपलब्ध कराई थी। इस सूची में 1224 फर्ज़ी मुठभेड़ का विवरण दिया गया था। ‘‘फर्ज़ी मुठभेड़ की इसी सूची के एल-18 पर बाटला हाउस कांड भी शामिल है। जारी रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा फर्ज़ी एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में हुए इस अवधि के दौरान यहां पर 716 फर्ज़ी पुलिस मुठभेड़ हुए हैं।’‘
बाटला हाउस और इस जैसी सभी मुठभेड़ों को लेकर मीडिया ने भी अपनी तीखी प्रतिक्रिया दिखाई है। समाचारपत्रों व न्यूज़ चैनलों ने बाटला हाउस की पूरी रिपोर्टिंग की और आम जनता के समक्ष पुलिस द्वारा किए गए फर्ज़ी मुठभेड़ों को बखूबी रखा। मानवाधिकार के हनन पर कौन सरकार के विपक्ष में खड़ा हो? हालांकि, कुछ मीडिया सरकार के साथ खड़ा होकर मनमाफ़िक परिभाषा गढ़ने लगा। रिपोर्टर की पहली टिप्पणी, फर्ज़ी एनकाउंटर को कहने या इस तथ्य को टटोलने की जहमत, कौन करे? यह सवाल मीडिया के समक्ष भी खड़ा हुआ।
बाटला हाउस जैसी बहुत सारी मुठभेड़ों को मीडिया ने प्रसारित किया है। ‘‘15 जून, 2004 को अहम्दाबाद के रिपोर्टर ने ब्रेकिंग न्यूज़ की यह ख़बर प्रसारित की कि गुजरात पुलिस ने एनकाउंटर में एक लड़की के साथ-साथ तीन लोगों को मार गिराया है। जो आंतकवादी गिरोह से सरोकार रखते थे और यह नरेंद्र मोदी को मारने की फिराक में भी थे। इनके पास से बहुत मात्रा में अश्लह बरामद किया गया। इस तरह के झूठे बयान देकर पुलिस अपना पल्ला झाड़ती रही और यह सिद्ध करती रही कि हमने कोई फर्ज़ी एनकांउटर नहीं बल्कि आंतकवादियों को मारा है। जिसका जिंद आज 9 साल बाद फिर प्रकट हो चुका है। अब देखना यह है कि जिंद वापस बोतल में जाता है या बोतल जिंद के हाथों में आती है। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। एक अन्य उदाहरणस्वरूप गुजरात में फर्ज़ी मुठभेड़ में दिनांक 22 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन को पुलिस ने गोली से मार दिया था। सरकार का कहना था कि वह मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मारने आया था। उसे लश्करे-तोयबा नामक आंतकवादी संगठन का कार्यकत्र्ता बताया गया था। इस ख़बर को समाचारपत्रों में जगह मिली। इसी क्रम में मीडिया के सभी चैनलों ने देहरादून के रणवीर नामक एक युवक की मुठभेड़ में मौत की ख़बर का प्रसारण किया। संबंधित ख़बर के प्रसारण के बाद काफी हो-हल्ला हुआ। और, इसकी जांच सी.बी.आई. को सौंपी गई। सी.बी.आई. और एस.आई.टी. दोनों ने अपनी जांच-पड़ताल के बाद इसे फर्ज़ी मुठभेड़ कहा। सी.बी.आई. ने 18 पुलिस वालों को फर्ज़ी मुठभेड़ में दोषी माना।

इन सब फर्ज़ी मुठभेड़ों में मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है। परंतु मीडिया ने बहुत-सी ऐसी ख़बरों को भी प्रकाशित किया है, जिससे बहुत-से लोगों का जीना मुश्किल तक हो गया है। यह कहना सही है कि मरने वाला अकेला नहीं मरता, उसके साथ बहुत सारी जिंदगी ताउम्र तिल-तिलकर मरती हैं। यदि यह मौत असमय हो, तो तकलीफ़ और बढ़ जाती है। फर्ज़ी मुठभेड़ के मामले भी कुछ ऐसे ही हैं। हर एक मुठभेड़ के बाद पुलिस जोर-शोर से इसे सही साबित करने की कोशिश करती है, तो कुछेक मानवाधिकार संगठन मुठभेड़ की सत्यता की जांच को लेकर हंगामा मचाते हैं। लेकिन, फिर पुलिस ऐसी ही कोई दूसरी कहानी प्रायः दोहरा देती है। मीडिया और मानवाधिकार आयोग को चाहिए कि सभी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी करवाएं। साथ ही रिपोर्ट को आयोग व मीडिया में प्रकाशित भी किया जाए, ताकि हकीकत सभी के सामने आ सके। इस आलोक में सरकार की अहम् भूमिका अपेक्षित है, ताकि मानवाधिकार का हनन न हो तथा साथ-साथ पीड़ितों को न्याय और दोषियों को सज़ा भी मिले सके।

Friday, June 7, 2013

दास्तांन-ए-महिला उत्पीड़न

दास्तांन-ए-महिला उत्पीड़न

बेटीशब्द जिसका नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के चेहरे की हवाईयां उड़ जाती हैं, मानों कोई बुरी ख़बर से पाला पड़ गया हो? यह तो मात्र नाम का ही प्रभाव है। अगर वास्तविकता के धरातल पर बात करें तो किसी के घर में बेटी के जन्म लेते ही (वो भी पहली) उस घर में मातम-सा छा जाता है। जैसे उसके घर में कोई जनमा नहीं, अपितु कोई मर गया हो। वहीं बच्ची को जन्म देने वाली बेबस मां और अबोध बच्ची दोनों के साथ बुरा बर्ताव देखने को मिलने लगता है। जैसे बच्ची के जन्म लेने से उस घर के ऊपर कोई मुसीबत का पहाड़ गिर पड़ा हो, और सारी-की-सारी गलती उस जन्म देने वाली मां पर थोप दी जाती है। जिसकी कहीं कोई गलती नहीं होती। इसके बाद भी उससे कहा जाता है कि बेटी को जना है तूने, अब खुद संभाल इसको। और छोड़ देते हैं दोनों को अपने हाल पर। न कोई चिंता, न ही फिकर, मरे चाहे जीए। यह किसी एक घर की दास्तांन नहीं, बल्कि पूरे समाज में फैली एक कुबुराई है जिसे लोगों आज भी अपने समाज में जिंदा किए हुए हैं। क्योंकि यह विकृत समाज की सोच का ही नतीजा है जिसकी झलक आज भी देखने को मिल रही है।
जैसा कि विदित है कि भारत के कुछ राज्यों में यह स्थिति और भी भयावह रूप में हमारे समक्ष दिखाई देती है। जहां बेटी के पैदा होते ही मार देने की परंपरा अब भी मौजूद है। कभी दूध के टब में डुबोकर, कभी अफीम खिलाकर, तो कभी तकीए से उसका गला दबाकर या फिर जन्म देने वाली दाई को चंद रुपए देकर मारवा दिया जाता है। वैसे यह कु-प्रथा भारत के उन राज्यों में आज भी अधिक प्रचलित है। जहां सदियों से बेटियों को बेटों के कमतर समझा जाता है। वहीं सभ्य परिवारों व शिक्षित समुदाय की बात करें तो वहां स्थिति कुछ ठीक-ठाक है बस ठीक-ठाक। क्योंकि सभ्य और शिक्षित लोग बच्ची को पैदा होते ही नहीं मारते अपितु, उस बच्ची को पैदा ही नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही लिंग का पता लगाकर मारवा देते हैं।
इस संदर्भ में आगे बात करें तो पहले और दूसरे समाज में मात्र एक ही असमानता दिखाई देती है कि पहला समाज पैदा होने के बाद तो दूसरा पैदा होने से पहले, और समानता यह कि, बच्ची को मारना ही है। चाहे जैसे भी हो, यदि बच्ची पैदा हुई है या होने वाली है उससे पहले ही उसका नामों-निशान मिटा देते हैं, अपने परिवार से। हां कुछ लोग पहली बच्ची के पैदा होते ही कुछ कारणों से बच्ची को नहीं मारते, क्योंकि वह यह सोचकर सब्र कर लेते हैं कि चलो दूसरा बेटा होगा। अगर फिर बेटा नहीं हुआ बेटी ही हुई तो उसके साथ भी वो ही किया जाता है जो अधिकांश लोग करते हैं या करते आ रहें हैं। वैसे यह किसी राज्य या किसी तबके, समुदाय, जाति की बेटियों के साथ घटित होने वाली घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की बेटियों की मार्मिक दास्तांन है। जिसके आंकड़े हम सरकार की रिपोर्टों और मीडिया में प्रसारित ख़बरों के माध्यम से अंदाजा लगा सकते हैं कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के अनुपात की वास्तविक स्थिति क्या है।
वैसे बेटियों के साथ घटित घटनाओं की दास्तांन इसके अलावा कुछ और भी कहानी बयां करती है कि कुछ बेटियों के मां-बाप उनको पैदा होते ही नहीं मारते, तो उनके साथ परिवार के लोग खान-पान, रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई आदि सब में भेदभाव करते हैं। जिसके तर्क में हमेशा से यह कहा जाता है कि, आखिर जाना तो पराए घर ही है, पढ़-लिख कर क्या कलेक्टर बनेंगी? करना तो इसको झाडू-पौंछा ही है। इस तरह पग-पग पर उसकी हमेशा उपेक्षा की जाती है। इतना झेलने के उपरांत भी इन बेटियों के उत्पीड़न के सिलसिलों का अंत यहीं नहीं ठहरता, उसको या तो किसी के हाथों बेच दिया जाता है, या किसी बूढ़े के साथ उसका विवाह कर दिया जाता है। कहीं-कहीं समाज में तो छोटी उम्र में ही धर्म के नाम पर मंदिरों में दान तक कर दिया जाता है। जहां पर धर्म के पुजारी इनको भोगकर वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेल देते हैं। जहां लोग अपनी हबस की पूर्ति हेतु इनके जिस्मों का सौदा करके, इनके जिस्मों को हर दिन रौंदते हैं। इन सब के बावजूद भी बेटियों को कभी दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, तो कभी आग में जलाकर मार दिया है। कभी-कभी तो बर्दास्त से बाहर हो चुकी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए खुद जलकर मरना पड़ता है। यह कोई सती प्रथा नहीं जहां पति की मौत के बाद समाज के दबाव में आकर पति की चिता के साथ जलना पड़ता था। जिसे सती प्रथा करते थे, परंतु अब यह प्रथा समाज से खत्म हो चुकी है इसकी जगह बहू-बेटी को जलाकर मारने की प्रथा अब मुखर हो चुकी है। और-तो-और उस दहेज की मांग पूरी न करने के एवज में पग-पग पर प्रताड़ित किया जाता है, लातों-घूसों से पति व सास-ससुर द्वारा मार-पीटा जाता है। इतने से ही हमारे समाज का बेहशीपन शांत नहीं होता, इन बेटियों के प्रति, तो समाज के ठेकेदार, विकृत मानसिक प्रवृत्ति के कुंठित लोग और-तो-और आपसी संगे-संबंधी कहीं पर तो घर के ही सदस्यों द्वारा इनके साथ बलात्कार की घटना को अंजाम दिया जाता है। जिस करण वो पूर्णतः टूट जाती है तथा समाज में मुंह दिखने के लायक नहीं बचती। वहीं समाज, बलात्कार के दोषियों को सजा दिलाने की तुलना में सारा दोष उस वेबस पीड़ित लड़की पर मड़ देते हैं। जो अपने साथ हुई बलात्कार की घटना से तिल-तिल कर मर रही है। इस प्रकार का उत्पीड़न महिलाओं के साथ होना प्रतिदिन की घटना में शुमार हो चुका है।
इतने सारे उत्पीड़न को झेलते हुए महिलाएं आज स्वयं के महिला होने पर अधिक चिंता में है, क्योंकि लोकतंत्र के चारों स्तंभ कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और यहां तक की मीडिया भी इन पर होने वाले अत्याचारों से इन्हें मुक्ति दिला पाने में नकारा साबित हो रहें है। इसका मूल कारण के पीछे सिर्फ-और-सिर्फ हमारा पुरुष प्रधान समाज ही है, तभी तो पीड़िता को कभी परिजन अपने परिवार के मान-सम्मान की खातिर, तो कभी दबंगों द्वारा डरा-धमकाकर शांत करा दिया जाता है। अगर कुछ एक महिलाएं हिम्मत करके अपने साथ हुए अत्याचारों की रिपोर्ट दर्ज करवाती भी हैं तो वहां भी उसे पुलिस द्वारा बदसलूकी का दंश झेलना पड़ता है। क्योंकि पुलिस कभी रुपयों के लालच में, तो कभी बाहुबलियों के दबाव के चलते, और-तो-और अधिकांशतः पुलिस वाले अपने क्षेत्र में होने वाले अपराधों में कमी दिखाने के चलते ऐसी प्रवृत्ति का इस्तेमाल करते रहते हैं। यदि पुलिस किसी दबाव के चलते रिपोर्ट दर्ज कर भी लेती है तो वह केस की ठीक से विवेचना करने में भी अपना ठुलमुल रवैया दिखाने से बाज नहीं आते। इसके साथ-साथ न्याय व्यवस्था में न्याय पाने के लिए उसे वर्षों अपने साथ हुए अत्याचारों के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, इसके बावजूद भी न्याय मिल जाए इसकी कोई गारंटी नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे समाज की रंगों में खून बनकर दौड़ने लगा है। वहीं पुलिस वाले चंद रुपयों के एवज में पूरे केस का रुख ही पलटकर रख देते हैं। बलात्कार के मामलों को छेड़छाड़, दहेज हत्या के मामलों को आत्महत्या, वेश्यावृत्ति में धकेली गई महिला का वेश्या और घरेलू हिंसा को पत्नी की बदचलनी में तब्दील करके दिखा दिया जाता है। वहीं पीड़िता महिला अपने साथ हुए अत्याचारों को बताते-बताते व न्याय की गुहार लगाते-लगाते मर जाती है और उसे न्याय नहीं मिलता।
अगर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों को मीडिया के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कुछ एक अपवाद स्वरूप मामलों को छोड़कर लगभग सभी मामलों को वह केवल-और-केवल सनसनीखेज़ ख़बरों के रूप में इनका इस्तेमाल करता है यानि प्रकाशित/प्रसारित करने का काम करता है। बहुत बार तो यहां तक देखने को मिलता है कि मीडिया महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों को, खासतौर से बलात्कार संबंधी मामलों को कालपनिक दृश्यों के रूप में बार-बार दिखाने का काम करता है, यानि उस महिला के साथ मीडिया भी बार-बार बलात्कार की घटना को अंजाम देता है। क्योंकि बलात्कारी उस महिला के साथ शारीरिक बलात्कार करता है तो मीडिया उस महिला का मानसिक बलात्कार करता है। वैसे यह बात गलत नहीं है कि मीडिया महिलाओं के साथ हुए शोषण व अत्याचारों को एक ख़बर के रूप में देखता है कि चलो एक अच्छी ख़बर तो हाथ लगी। जिस ख़बर से को बार-बार दिखाने से हमारे चैनल की टीआरपी तो थोड़ी बढे़गी। और अगर हम पीड़िता को न्याय दिलाने की बात करें तो यह इनसे परे की बात है। क्योंकि यह सिर्फ-और-सिर्फ शहरी और बड़े वर्ग या यहां भी कहना गलत नहीं होगा कि यह सिर्फ धनाढ्य वर्गों और उच्च जाति की महिलाओं के साथ हुए शोषण की ख़बरों को ही ज्यादा तबज्जों देते हैं, उसको न्याय दिलाने के लिए ख़बरों का लगातार फोलोअप भी करते रहते हैं। ताकि पुलिस व प्रशासन पर दबाव बनाकर जल्द-से-जल्द दोषियों को सजा दिला सकें। क्योंकि वह पीड़ित महिला उच्च व धनाढ्य वर्ग से तालुक रखती हैं। वहीं गरीब तबके और छोटी जाति की महिलाओं के साथ हुए अत्याचार व शोषण से इनको कोई सरोकार नहीं होता, क्योंकि वह इनके लिए न तो ख़बर का काम नहीं करती है और न ही वर्ग विशेष का। वैसे अब मीडिया भी इन महिलाओं का उत्पीड़न करने लगा है। जिसका उदाहरण हम आए दिन पूरे मीडिया में देखते रहते हैं कि किस तरह वह उद्योगपतियों द्वारा निर्मित किसी भी वस्तु को बाजार में बेचने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करता रहता है, वो भी उसको अर्द्धनग्न करके, कभी-कभी तो पूर्णतः नग्न करके। इस नग्नता भरे विज्ञापनों को वह समाज के सामने परोस देता है। जिसको देखकर हमारा पुरुष महिलाओं को सिर्फ कामुक व भोग्या की दृष्टि मात्र से देखने लगते हैं। जिससे कहीं-न-किसी महिलाओं को अपनी अस्मत लूटने का खतरा बना रहता है।
अतः में महिला उत्पीड़न की पूरी दास्तांन पर प्रकाश डाला जाए, और महिलाओं की स्थिति का आंकलन किया जाए, तो वास्तविक स्थिति हमारे सामने स्वतः ही आ जाएगी कि, महिलाओं को पहले तो पैदा ही नहीं होने दिया जाता, यदि पैदा हो भी गई तो पुरुष प्रधान समाज द्वारा उसके पग पर इतने कांटें बो दिए जाते हैं ताकि वह पुरुष प्रधान समाज के समतुल्य खड़ी न हो सके और उसकी ता-जिंदगी लहुलुहान तरीके से ही व्यतीत हो। तभी तो वह बार-बार सिर्फ यही कहने को मजबूर होती है कि ‘‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजों’’


Monday, May 27, 2013

दोगलेपन की राजनीति में लिप्त कांग्रेस सरकार

दोगलेपन की राजनीति में लिप्त कांग्रेस सरकार
कहते हैं मोहब्बत और जंग में सब जायज है। परंतु हम यह कैसे भूल जाते हैं कि मोहब्बत और जंग के साथ-साथ राजनीति में भी सब कुछ जायज है। यह एक ऐसी विधा है जिसमें कुछ भी नाजायज नहीं। यदि आप राजनीति से कहीं से भी कोई सरोकार रखते हैं तो साम, दाम, दंड, भेद इसके साथ-साथ जो भी कुछ रह जाता हो, बच जाता हो, या इसके इतर आपके द्वारा जो कुछ नया इजाद कर लिया गया हो, उसका आप आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं, वो भी बिना किसी रोक-टोक के। क्योंकि यहां कोई रोकने-टोकने वाला ही नहीं है। अगर इस परिप्रेक्ष्य में आगे कहा जाए तो यह शराब की जैसी है न छोड़ी जाए। यह वे लोग होते हैं जो शराब की खाली बोतल में भी पानी डालकर पी जाए। क्योंकि सब तो मिला के पीते हैं पानी शराब में, ये पी गए शराब में देश को मिलाकर। तभी तो इनको नेता कहा जाता है। नेता जो कुछ नहीं लेता, परंतु मौका पड़ते ही डकैतों की भांति सब कुछ लूट लेता है। 
वैसे नेताओं के परिदृश्य में बात करें तो हमारे समाज में दो तरह के नेताओं की जमात मौजूद है। पहला तो वह जिनके बाप-दादाओं की वजह से राजनीति विरासत में मिलती है और दूसरे वह जो अपने बलवूते पर राजनीति में कदम रखते हैं। इस असमानता के बावजूद इन नेताओं में एक तरह की समानता देखी जा सकती है वो भी राजनीति की। यानि गिरी हुई नीछ प्रकार की राजनीति की।
हालांकि नेता चाहे जो भी, हां जैसे बने हों उनका सिर्फ-और-सिर्फ एक ही मकसद होता है इस देश को जितना ज्यादा से ज्यादा लूटने कर अपना और अपने परिजनों के घरों को भरने का। चाहे जनता भाड़ में क्यों न चली जाए। पाकिस्तान, चीन हमारी छाती पर दिन-रात मूंग क्यों न दलें। इन नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
अगर राजनीति में वर्तमान सरकार की बात कही जाए तो इस सरकार ने हाल ही में अपने दूसरे कार्यकाल के चार साल पूरे किए हैं हां पूरे चार साल। जिस पर हमारे मूक प्रधानमंत्री ने कहा है कि इन चार सालों में विकास हुआ है। जीडीपी ग्रोथ बढ़ी है। परंतु उन्होंने यह बताने की जहमत नहीं उठाई, कि उनकी सरकार ने इन चार सालों में और क्या-क्या किया। उनको तो जनता को यह बता देना चाहिए था कि उनकी सरकार के नेताओं ने इन चार सालों में कितने घोटले किए हैं और किस प्रकार जनता का खून चूसा है। साथ-ही-साथ यह भी बता दिया होता कि इन अरबों-खरबों के घोटले कि रकम को किस हिसाब से और किस अनुपात में नेताओं में बांटबारा हुआ है। इसके साथ ही यह भी बता देना चाहिए था कि उनकी सरकार में किस-किस नेता ने विदेशी बैंकों में इन चार सालों में कितनी रकम जमा की है। परंतु यह नहीं बताया। विकास की बात करके चले गए, अपने बिल में।

वैसे तो सभी जानते है कि हमारे मूक प्रधानमंत्री सिर्फ एक पियादा मात्र है जिसको आगे रखकर कांग्रेस दोगलेपन की राजनीति का गंदा खेल खेल रही है। इस दोगलेपन के खेल के साथ अब कांग्रेस सरकार दिखावे की भी राजनति करने लगी है। क्योंकि वह चाह रही है कि आने वाले चुनाव तक उसकी छवि जनता के सामने साफ-सुधरी हो जाए, तभी तो उसने अपने कुछ नेताओं के सिर पर से अपना हाथ खींच लिया है। एक तो हमारे रेल मंत्री जिनके भतीजे की वजह से उनको इस्तीफा दिलाया गया। और दूसरे बीसीसीआइ के अध्यक्ष जिनके दामाद स्पॉट फिक्सिंग में फंसे होने के कारण सरकार उनको इस्तीफे देने पर जोर डाल रही है। ताकि वह यह कह सके कि हम दोषी लोगों को ही नहीं, उनके परिजनों के भी दोषी होने पर अपनी पार्टी से निष्कासित कर देते हैं। परंतु मेरी समझ में यह नहीं आया कि करे कोई और भरे कोई। यदि ऐसा ही है तो सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के रहनुमा को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि वह यह क्यों भूल जाती हैं कि उनके प्रिय दामाद पर भी घोलाटे तथा उनके लाडले पुत्र पर बलात्कार का आरोप लग चुके हैं। जिसको सरकार व कानून ने एक सिरे से नकार दिया। शायद इसी को राजनीति कहते है कि तुम करो तो रासलीला, हम करें तो करेक्टर ढीला। तुम करो तो चमत्कार और हम करें तो बलात्कार।

Monday, May 20, 2013

क्यों परेशान हो रहे हो?



क्यों परेशान हो रहे हो?

हमकों मालूम न था क्या कुछ है घर में बेचने को......... ज़र से लेकर ज़मीन तक हर चीज़ बिकाऊ है। ग़ालिब की यह चंद लाइनें आज आम जनता से लेकर लोकतंत्र के चारों स्तंभों कार्यपालिकाविधायिकान्यायपालिका और मीडिया पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। जिसने आज हमारे समूचे लोकतंत्र व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। चारों तरफ बाज़ारवाद हावी हो चुका है। सब-के-सब बिकने के लिए खड़े हैं बाज़ार में। बस खरीददार चाहिएबोली लगाने वाला चाहिए। क्योंकि आज के परिप्रेक्ष्य में नेता से लेकर अभिनेता तकवेश्या से लेकर खिलाड़ी तक सभी बिकाऊ हैं। फिर क्यों परेशान हो रहे हैं हम। चाहे वो पुलिस हो या मीडिया। आप सोच रहे होगें कि मैं किस मुददे पर चर्चा कर रहा हूं। तो बता दूं कि मैं मैंच फिक्सिंग में फंसे श्री के संत और अन्य खिलाड़ियों की बात कर रहा हूं। जिसको लेकर पुलिस और खास तौर पर मीडिया बहुत व्याकुल नजर आ रहा है। और वह न जाने कौन सा तानाबाना बुन रहा हैसमझ से जुदा है।
वैसे यह कोई पहला मामला तो है नहींफिक्सिंग का। अगर श्रीसंत और अन्य खिलाड़ियों ने मैंच फिक्स कर भी लिया और उस एवज में चंद रुपए ले भी लिए तो क्या गुनाह कर दिया। हालांकि आईपीएल-6 में हो चुके करोड़ों के घोटालों और हर रोज हमारे नेताओं द्वारा किए जा रहे घोटालों से तो कम है। फिर भी कहीं न कहीं नेताओं द्वारा किए गए घोटालों से प्रेरणा लेकर इसने यह कदम उठाया होगा। क्योंकि आए दिन नेताओं द्वारा किए जा रहे घोटालों और मीडिया द्वारा उनकी प्रस्तुति का ढंग भी इस मैंच फिक्सिंग के जिम्मेवार हैं। क्योंकि नेता अरबों का घोटाला करते हैं और मीडिया दिखाता है कि फलां-फलां नेता ने इतने अरबों का घोटाला किया है। नेता को पुलिस ने उसके आवास से पकड़ लिया है। सरकार ने सीबीआइ जांच के आदेश दे दिए हैं तथा जांच के लिए एक कमेटी का भी गठन कर दिया है जो पूरे प्रकरण पर अपनी रिपोर्ट पेश करेंगी। वहीं कुछ दिनों के बाद अपने जेल कार्यक्रम के उपरांत यह नेता पुनः अपनी गद्दी की शोभा बढ़ाते नजर आ जाते हैं। होता क्या है कुछ नहीं। फिर इतनी हाय-तौबा आखिर क्यों?
सरकार को मैंच फिक्सिंग की रकम से कुछ दान-दक्षिणा या चढ़ौत्री चाहिए हो तो इस पर भी एक कर लागू कर दें और उसका नाम रख दें मैंच फिक्सिंग टैक्स। यानि खिलाड़ी व सटोरिए जितने रुपए में मैंच को फिक्स करेंगे उन रुपयों का 40 या 50 प्रतिशत टैक्स के रूप में सरकार को देना होगा। इससे सरकार भी खुश हो जाएगी और खिलाड़ी भी। इसके साथ-साथ सट्टेबाज भी तथा पुलिस व सीबीआइ को भी परेशान नहीं होगा पड़ेगा। अगर वास्वत में मैंच फिक्सिंग से सरकार तिलमिला रही है तो पहले उसे अपने गिरेवान में झांककर देखने होगा कि उसके दामन में कितने दाग लगे हैं और लगते जा रहे हैं।
मेरे हिसाब से तो जितना रुपया मैंच फिक्सिंग में इन खिलाड़ियों को मिला है उतना रुपया जब्त करके छोड़ देना चाहिए इन खिलाड़ियों को। परंतु नहीं इन खिलाड़ियों की कोई भी वकालत क्यों नहीं कर रहा समझ से परे लग रहा है। हां वैसे हमारे काटजू साहब को तो इन खिलाड़ियों का पक्ष लेना चाहिए था वो भी नदारत नजर आ रहे हैं। शायद कोई कानून तलाश कर रहे होंगे इन खिलाड़ियों के पक्ष में बोलने तथा इनकों बचाने के लिए। ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। हालांकि मैं इसके पक्ष में कदापि नहीं हूं फिर भी लगने लगा है कि समाज अपने विनाश की ओर अग्रसर हो चुका है। तभी तो इसकी लौ का अपने पुरजोर तरीके से फड़फड़ा बदस्तूर जारी है। अब देखना बाकी है कि कब इसका पूर्णतः अंत या विनाश होगा। क्योंकि सभी कुछ खरीद लिया इन खरीददारों ने।