Friday, February 10, 2012

भारतीय महिलाओं का शोषण: वैदिक काल से अब तक



भारतीय महिलाओं का शोषण: वैदिक काल से अब तक



औरतों के पक्ष में लिखना मेरे लिए बडे़ गौरव की बात है सदियों से उपेक्षाओं और त्रासदी की मार झेल रही औरतों को सम्मान का दर्जा/हक दिला पाने में जिस प्रकार की कोशिशें की जा रही हैं उसमें अंश मात्र भी मेरे योगदान से ये औरतें अपने आपको उपेक्षाओं से बचा सकें, तो मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। इस आलोक में देखा जाए तो समाज की बात यथार्थ रूप से बेमानी लगने लगती है,जिस समाज में नारी को देवी का ओहदा हासिल है वहीं नारी के साथ अत्याचारों की लंबी कतार भी खड़ी दिखाई देती है। ये बात सही है कि पूर्व काल में नारी का अधिपत्य था। नारी ही पुरूषों, बच्चों और बुर्जुगों का पालन-पोषण करती रही है। बच्चों की पहचान भी माता के नाम से होती थी। वक्त के परिवर्तन के साथ पुरूषों ने नारी की सत्ता का दोहन कर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। अपनी सत्ता छीन जाने के बाद नारी के इतिहास में तरह-तरह के उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं।
वैदिक काल में ‘‘महिलाओं की स्थिति समाज में काफी ऊंची थी और उन्हें अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। वे धार्मिक क्रियाओं में भाग ही नहीं लेती थीं बल्कि, क्रियाएं संपन्न कराने वाले पुरोहितों और ऋषियों का दर्जा भी उन्हें प्राप्त था।’’ उस समय महिलाएं धर्म शास्त्रार्थ इत्यादि में पुरूषों की तरह ही भाग लेती थी। उन्हें ‘‘गृहणी, अर्धांगिनी कह कर संबोधित किया जाता था। पुत्र-पुत्री के पालन-पोषण में कोई भेदभाव नहीं किया जाता था।’’ उपनयन संस्कार और शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भी स्त्रियों को पुरूषों की भांति समान रूप से प्राप्त था। तत्कालीन युग में महिलाएं सार्वजनिक जीवन में भाग लेती थी। ‘‘अस्पृश्यता, सती प्रथा, पर्दा प्रथा तथा बाल विवाह जैसी कुप्रथा का प्रचलन भी इस युग में नहीं था।’’ ‘‘महिलाओं की शादी एक परिपक्व उम्र में होती थी, संभवतः उनको अपना जीवन साथी के चुनाव का पूर्ण अधिकार प्राप्त था।’’ ‘‘यद्यपि विधवा पुर्नविवाह प्रचलित नहीं था लेकिन विधवाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता था और उन्हें अपने पति की सम्पत्ति पर अधिकार प्राप्त था।’’ यूं कहा जा सकता है कि, स्त्रियां किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से पीछे नहीं थी। ‘‘भारतीय समाज के वैदिक काल में नारी को पुरूषों के समाज में शिक्षा, धर्म, राजनीति और सम्पत्ति के अधिकार एवं सभी मामलों में समानाधिकार प्राप्त थे।’’ इसके बाद धीरे-धीरे नारी को प्रदत्त अधिकारों में हा्रस बढ़ता गया और नारी को प्रदान अधिकारों, शिक्षा,स्वतंत्रता, धार्मिक अनुष्ठानों आदि से वंचित किया जाने लगा। जिससे वह पूर्ण रूप से पुरूषों पर आश्रित हो गयी। वहीं मनु ने कहा कि ‘‘नारी का बचपन में पिता के अधीन, यौवनवास्था में पति के आधिपत्य में,तथा पति की मृत्यु के उपरांत पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए।’’ इस फतवे के बाद नारी की बची-खुची आजादी का भी हनन हो गया और नारी का स्तर दोयम दर्जे की ओर बढ़ता चला गया। भारतीय इतिहास का वास्तविक काल वैदिक सभ्यता से जुड़ा हुआ है। ‘‘चतुर्वेदों में ऋग्वेद को सबसे अधिक प्राचीन वेद माना है। इसके बाद यजुर्वेद, समार्वेद और अर्थर्ववेद को माना जाता है।’’ ऋग्र्वेद में ब्रम्हज्ञानी पुरूषों के साथ-साथ ब्रम्हवादिनी महिलाओं का भी नाम आता है। इनमें विश्ववारा लोप, मुद्रा, घोषा, इन्द्राणी, देवयानी आदि प्रमुख महिलाएं हैं।
‘‘एक तरफ जहां भारतीय संस्कृति में नारी को सदा ऊंचा स्थान मिला है। नारी को मर्यादा के क्षेत्र में पुरूषों से अधिक श्रेष्ठ माना गया है, तथा स्त्री और श्री में कोई भेद नहीं किया गया है।’’ वहीं उसी नारी के साथ अत्याचारों का सिलसिला शुरू हो चुका था। नारी के ऊपर तरह-तरह की बंदिसें जैसे-पर्दे में रहना,पुरूषों की आज्ञा का पालन करना, प्रति उत्तर न देना, चारदीवारी में रहना आदि। इन सब बंदिसों ने नारी को नारी से भोग्या के रूप में परिवर्तित कर दिया, तब नारी मात्र संतान पैदा करने की मशीन के रूप में प्रयोग की जाने लगी। द्वापर में द्रौपदी के साथ जैसा हुआ वैसा किसी भी युग की नारी के साथ देखने को नहीं मिलता हैं। वह विवाहिता हुई अर्जुन की, और पांच पाण्डवों में बंटी। किसी वस्तु की तरह जुए में दांव पर लगा दी गई, और हारने के उपरांत दुर्योधन के हाथों में ऐसे सौंप दी गई जैसे किसी कसाई के हाथों में बकरी सौंप दी जाती है।
हालांकि उत्तर वैदिक काल ईसा के 600 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के 300 वर्ष बाद तक का युग उत्तर वैदिक काल कहा जाता है। इस काल में महिलाओं की स्थिति में गिरवट आने लगी थी। वैदिक काल में पिण्डदान इत्यादि के लिए पुत्र जन्म की कामना रहती थी, लेकिन पुत्री के जन्म पर भी कोई विशेष आपत्ति नहीं होती थी। उत्तर वैदिक युग में पुत्री के जन्म को बुरा माना जाने लगा। इस युग में महिलाओं के धार्मिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। ‘‘इस काल में महिलों को यज्ञादि कर्मो,बाल विवाहों का प्रचलन तथा विधवा पुनर्विवाह पर रोक लगाना शुरू हो गया था।’’ अनुलोम-प्रतिलोम विवाहों के प्रतिबंध,स्त्री शिक्षा को सीमित करना, उपनयन संस्कार की औपचारिकता, कर्मकाण्डों की जटिलता की शुरूआत इसी काल में हुई। मनु और याज्ञवल्क्य जैसे स्मृतिकारों के द्वारा महिलाओं पर प्रतिबंधात्मक निर्देश तथा पतिव्रत धर्म का पालन करना, और पति को परमेश्वर का रूप माना जाना आदि के निर्देश दिए गए। इस युग में वैदिक युग का प्रभाव बना हुआ था। इस कारण से उनकी स्थिति विपरीत रूप से अधिक प्रभावित नहीं हो सकी। इससे केवल अशिक्षित और अल्प-शिक्षित तथा निम्न वर्ग की स्त्रियां ही प्रभावित हुई। अभिजात वर्ग की कुलीन महिलाएं अपनी शिक्षा और सम्पन्नता के बल पर पुरूषों के साथ समानता का व्यवहार पाती थी।
गौर तलब है कि 11वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी के काल को मध्यकाल कहा जा सकता है। इस काल को स्त्रियों की दृष्टिकोण में काला युग कहा जा सकता है। भारत में राजाओं की आपसी फूट का फायदा मुसलमानों ने उठाया और भारत देश पर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। कुछ एक बादशाहों ने जोर-जबरदस्ती करके धर्म परिवर्तन करवाया तथा महिलाओं के साथ ज्यादतियां शुरू कर दी। जिसके परिणामस्वरूप ‘हिन्दुओं ने स्त्रियों पर अनेक प्रतिबंधात्मक निर्देशों और स्मृतिकारों की मनगढ़न्त बातों को धार्मिक स्वीकृति प्रदान की गई।’ यह भी कहा गया कि, स्त्री को कभी अकेली नहीं रहना चाहिए उसे हमेशा किसी न किसी के संरक्षण में ही रहना चाहिए। ‘‘बाल्यावस्था में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहने का विधान भी इसी युग में दिया गया।’’इस काल में नारी की दशा दयनीय हो गई। ‘‘पर्दा प्रथा ने नारी को घर की चारदीवारी की कैद में रहने के लिए मजबूर कर दिया, और बाल विवाहों का बाहुल्य हो गया तथा शिक्षा के द्वारा उसके लिए लगभग बंद कर दिये गयें। इसके साथ-साथ सती-प्रथा भी अपने शिखर पर पहुंच गई थी।’’इस काल में महिलाओं को घर के कामकाज तक ही सीमित कर दिया गया। ‘पति परमेश्वर’ ‘पतिव्रत धर्म’और पति के आदेशों पर महिलाओं को चलने की नैतिकता का कड़ाई से पालन इसी काल में हुआ। वस्तुतः मध्यकाल में स्त्रियों की स्वतंत्रता सब प्रकार से छीन ली गई और उन्हें जन्म से मृत्यु तक पुरूषों के अधीन कर दिया गया।
यदि इसे भारतीय नारी का दुर्भाग्य कहें या कुछ और कि उसे एक तरफ देवी बनाकर पूजा जाता है, तो दूसरी ओर सेविका बनाकर शोषण किया जाता है। एक युग था, जब नारी को पत्थर की मूर्तियों के भेंट चढ़ाया जाता था और अंत में वेश्यालयों में बेच दिया जाता था। आज भी दक्षिण भारत में कुंआरी कन्याओं का विवाह पूर्व मंदिरों में किया जाता है तथा उनका पण्डों द्वारा शोषण होता है। यह सभ्य समाज में पुरूष प्रधान व्यवस्था के कारण है। पुरूष अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए नारी का उपयोग एक वस्तु की तरह करता आया है। अतिथि को देवता समझकर भोजन और मदिरा की तरह रात को कुंआरी कन्या का सौंपना क्या था। इन सब के पीछे पुरूष की कामुक भावना और चतुराई काम करती है। पुरूष ने स्त्री के खून में यह भावना, संस्कार की तरह कूट-कूटकर भर दी है कि वह सिर्फ और सिर्फ शरीर है। शरीर के सिवा पुरूष किसी और पहचान से इंकार करता है। वही पन्त कहते हैं कि, ‘‘योनि मात्र रह गई मानवी।’’ और‘‘कंकाल’ उपन्यास में प्रसाद ने स्वीकार किया है कि, ‘‘पुरूष नारी को उतनी ही शिक्षा देता है, जितनी उसके स्वार्थ में बाधक न हो।’’ तभी तो कन्याओं को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। अब विज्ञान भी ‘‘औरत को मारने के तथा उसे जड़ से मिटाने के नित नए तरीके ईजाद करता जा रहा है। यदि भू्रण को ही मार दिया जाए तो शिशु को मारने की नौवत नहीं आएगी।
एक भयानक सच यह भी है कि हमारे सभ्रांत समाज में आज भी बेटियों को टेंटुआ दबाकर मार दिया जाता है। बिहार, राजस्थान,मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में बेटी का जन्म होते ही, उसे पैदा करवाने वाली दाई कुछ अतिरिक्त पैसा लेकर नवजात का गला दबाकर, उसे आक का दूध पिलाकर, धान की भूसी मुंह में डालकर या सुतली गले में लपेटकर, उसे मरोड़कर अथवा सर्दी के दिनों में गीला कपड़ा लपेटकर बच्ची की जान ले ली जाती हैं।’’इसका एक मात्र कारण ‘‘समाज में औरतों को बराबरी का दर्जा न मिल पाना/मिल सके।’’ क्योंकि पुरूष आज भी नहीं चाहता कि, नारी उसके समकक्ष आकर खड़ी हो। ‘‘हमारे समाज में औरतों पर लगी पाबंदियां आज भी ज्यों की त्यों हैं। पुरूष चार जगह प्रेम करें या तीन शादियां, वह स्वतंत्र है। उसे समाज बहिष्कृत नहीं करता। उसे कुलटा और करमजली नहीं कहा जाता। औरत यदि अपना जीवन अपने अनुसार बिताना चाहे तो सारे नियम बदल जाते हैं।’’ उसे तरह-तरह के नामों से संबोधित किया जाता है जिसको नारी कभी सपने में नहीं सोच सकती कि जिस पुरूष पर अपना सब कुछ निछावर कर देती है, वही पुरूष उसके साथ अत्याचार करता है। और नारी की विवसता का अनुचित लाभ उठाने से भी नहीं चूकता।
वर्तमान परिवेश में तो नारी पर दहेज के नाम पर, बलात्कार का शिकार बनाकर, मारपीट करके अपना गुलाम बनाना आम बात हो चुकी है। बहुत बार तो ‘‘परिवारों में महिला को निकटतम् संबंधियों की भूख का शिकार होना पड़ता है।’’ जिनसे वो आस लगती हैं अपनी सुरक्षा की,वो ही ईज्जत का तार-तार करते रहते हैं। जिसको अपना नसीब मानकर जुल्मों को बर्दास्त करती है और ईश्वर से जरूर कहती है कि ‘‘अगले जनम मोहे बिटिया न की जो।’’

संदर्भ-ग्रंथ1. ब्होरा, आशा रानी, प्राचीन काल से मध्यकाल तक, www.srijangatha.com , 1 नवम्बर, 2007
2. पुरूषों को भी न्याय मिले, सरोकार की मीडिया, www.gajendra-shani.blogspot.com, 21 मई, 2010
3. वैदिक काल,
4. भारत में महिलाएं, वही
5. लता, डॉ. मजु, अनुसूचित जाति में महिला उत्पीड़न,अर्जुन पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 2010, पृ. 5
6. कौर, डॉ. अजुमन दीप, कामकाजी नारीः उपलब्धि और संताप के दायरों में, दीपक पब्लिशर्ज़, 2006,पृ.29
7. कृष्णकांत, सुमन, शीला झुन झुनवाला, इक्कीसवीं सदी की ओर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001, पृ. 25
8. पाटिल, डॉ. अशोक डी., डॉ. एस.एस. भदौरिया, भारतीय समाज, 2007, मध्य प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी,भोपाल
9. सिंह, चेतन, चन्द्र, क्या अपराध है औरत होना?, ग्रंथ विकास, जयपुर, 2009, पृ. 17
10. वही, पृ. 30
11. वर्मा, डॉ. ओ.पी., भारतीय सामाजिक व्यवस्था, विकास प्रकाशन, कानपुर, 2004, पृ. 371
12. लता, डॉ. मजु, अनुसूचित जाति में महिला उत्पीड़न,अर्जुन पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 2010, पृ. 6
13. यादव, राजेन्द्र, आदमी की निगाह में औरत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. 15
14. वही
15. मनीषा, हम सभ्य औरतें, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2004, पृ. 15
16. वही, पृ. 14
17. वही, पृ. 31
18. जैन, डां. सुधा, आधुनिक नारी दशा और दिशाएं, सूर्य भारती प्रकाशन, दिल्ली, 2004, पृ. 46
19. सिंह, चेतन, चन्द्र, क्या अपराध है औरत होना?, ग्रंथ विकास, जयपुर, 2009, पृ. 51

Monday, February 6, 2012

प्यार.............????????

प्यार.............????????

प्यार शब्‍द अपने आप में बहुत ही संवेदनशील है। इस संवेदनशीलता के कारण हम, जिंदगी भर प्‍यार को तलाशते रहते हैं। प्‍यार की खोज निरंतर जारी रहती है। हां ये बात और है कि, उम्र के पढ़ाव के साथ-साथ हमारी खोज भी मध्‍यम होने लगती है, परंतु खत्‍म नहीं होती। वैसे हमें एक सच्‍चे प्‍यार की तलाश ताउम्र रहती है। जीवन के उतार-चढ़ाव के दौरान हमें एक सच्‍चा साथी मिलें तो हम अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली मानते हैं। हालांकि किसी का प्यार तभी पाया जा सकता है जब तक हम अपने आप को उसके भरोसे के काबिल न बना लें। क्‍योंकि प्यार का दूसरा नाम भरोसा है और जहां भरोसा नहीं होता वहां प्यार दूर-दूर तक नहीं रहता। हालांकि प्‍यार की पहली सीढ़ी मित्रता होती है, जो विश्‍वास पर टिकी होती है। बिना विश्‍वास के मित्रता नहीं हो सकती और न ही मित्रता, प्रेम में तबदील हो सकती है।
वैसे आज के परिप्रेक्ष्‍य में मित्रता हो या प्‍यार दोनों किसी-न-‍किसी स्‍वार्थ की नींव पे टिके होते हैं। जैसे ही स्‍वार्थ पूरा हो जाता है वैसे ही मित्रता या प्रेम स्‍वत: ही खत्‍म हो जाते हैं। इसे हम एक एग्रीमेंट के रूप में भी देख सकते हैं। काम खत्‍म तो एग्रीमेंट भी खत्‍म। इस आलोच्‍य में आगे बात करें, तो हम देख सकते हैं कि कुछ लोग इस एग्रीमेंट को प्‍यार का नाम देते हैं। जो इस प्‍यार की गहराई में इतने उतर चुके होते हैं कि जहां से निकलना इनके लिए नामुमकिन हो जाता है। जिसे ये लोग धोखे का भी नाम देते रहते हैं, कि फलां-फलां से हमने प्‍यार किया था और उसने हमें इस मोड़ पर धोखा दे दिया। इस संदर्भ में कहा जाए तो इंसान की फितरत में जैसे प्‍यार करना शामिल होता है वैसे ही धोखा देने की फितरत भी होती है।
इस धोखे की फितरत इंसानी सभ्‍यता में सदियों से रही है, चाहें पुरूष हो या स्‍त्री। दोनों में प्‍यार करने और धोखा देने के गुण एक समान होते हैं। एक तरफ पुरूष अपने स्‍वार्थों के चलते तो दूसरी तरफ स्त्रियां मजबूरियों के चलते, एक-दूसरें को धोखा देते रहते हैं। धोखा के बारे में एक व्यापक और प्रचलित मिथक यह भी है कि यदि स्त्री-पुरुष के बीच सेक्स स्थापित नहीं होता तो उसे धोखें का नाम दे दिया जाता है। अगर मैं इस बारे में सोचू कि स्‍त्री-पुरूष के बीच सेक्‍स संबंधी नहीं बनते तो उसे धोखा देना कहेंगे, हां भी और नहीं भी। मैं न तो किसी के पक्ष में बात कर रहा हूं और न ही किसी के विपक्ष में। अपना-अपना मत रखने की स्‍वत्रंता सभी को हैं। मैं न तो किसी को मूर्ख कह रहा हूं, न ही विद्वान। बदलती संस्‍कृति से सभी लोग भलीभांति परिचित है किसी को यहां यह बताने की आवश्‍यकता महसूस नहीं होती कि आज समाज में क्‍या हो रहा है। हमारी जिंदगी किस राह पर जा रही है। जिस राह पर जा रही है, उसी राह पर निकल पड़ते हैं। चाहे वह राह भंवर की हो या बवंडर की।
अगर मैं, कहूं कि इस संस्‍कृति ने प्‍यार के मायने ही बदल दिये हैं तो कहना गलत नहीं होगा। आज प्‍यार संवेदलशील के स्‍थान पर सेक्‍सशील हो चुका है। इस बदलाव ने पूरी सभ्‍यता को अपने मकड़ जाल मे फंसा लिया है जहां से निकला नहीं जा सकता, लाख कोशिशों के बाद भी। वहीं प्‍यार भी अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति पर टिक गया है। इच्‍छा पूर्ति तक ही प्‍यार है, और एक बार इच्‍छा पूरी हुई कि प्‍यार हमारे बीच में कहां नदारत हो जाता है यह कोई नहीं जानता। और शायद जानना भी नहीं चाहता, इच्‍छा पूरी तो हो रही है। उससे इच्‍छा पूरी नहीं हुई तो कोई और, उससे न हो, तो कोई और। एक कतार बना चुका है प्‍यार के नाम की। प्‍यार को खाला का घर बना दिया जाता है, जिसकी जब मर्जी हो आये, जब मर्जी हो जाये। कोई फर्क नहीं पड़ता, और पड़ना भी नहीं चाहिए। आखिर प्‍यार ही तो है। कब कहां हो जाए ये बीते दिनों की बात हो चुकी है आज प्‍यार, जरूरत के हिसाब से, इंसान की सुंदरता और उसके स्‍टेटस के हिसाब से होता है या किया जाता है। जिसे प्‍यार का नाम देकर सेक्‍स की एक इस प्रकार की पृष्‍ठभूमि तैयार की जाती है जिस प्‍यार के साथ जोड़कर देखा जाता है। इस जुड़ाव का कहीं कोई अंत नहीं है संस्‍कृति और सभ्‍यता के बदलाव के साथ हमने इसको ग्रहण कर ली लिया है। और जी रहे हैं, इसी प्‍यार और सेक्‍सशील संस्‍कृति को।

Saturday, February 4, 2012

सपनों के सागर में



सपनों के सागर में

हसीन सपनों के सागर में
डूबता चला जा रहा हूं
धीरे-धीरे-धीरे
मैं खुद नहीं चाहता हूं, निकलना
इस भंवर से
सपनों के सागर में जो हूं, वो भी हसीन
क्यों निकलू,सपनों में ही रहने दिया, खुद को
निकलकर,कर भी क्या सकता हूं
बहुत जाग लिया, इस दुनिया में
देखा,सबको देखा
इन आंखों से
सूरज को,चांद को,दिन को,रात को
बदलते हुए मौसम को, देखा वो भी देखा
जो गंवारा न था, इन आंखो को देखना
लूट को,मार-पीट को, रहनुमाओं की भ्रष्टाचारी को
बलात्कार को, अत्याचार को, बढ़ती मंहगाई को
शाही थाली को, कचरे की जिंदगी को
देखा सबकुछ देखा
अब और नहीं देखना चाहता
इसलिए सोना चाहता हूं, गहरी नींद में
नहीं चाहता, नींद से उठना
कर भी क्या सकता हूं, और कर भी क्या लूगा, उठकर
लचार हूं,वेबस हूं,कुछ नहीं कर सकता
चंद किताबों के ज्ञान से
बन तो सकता हूं, विद्वान
फिर भी नहीं कर सकता, इस देश का कल्याण
तभी,डूबा रहना चाहता हूं
हसीन सपनों के सागर में
कुछ न पा सकूं
फिर भी इतनी आस तो जरूर रहेगी, इस दिल में
पा सकूं उस तमन्ना को
जो सदियों से है मेरे दिल में
सपनों के सागर में रहकर....................!!

Thursday, February 2, 2012

बूढ़ा हो रहा हूं, मैं

बूढ़ा हो रहा हूं, मैं

हां बूढ़ा हो रहा हूं, मैं? यह एक गंभीर और विचारणीय विषय है, मेरे लिए। बूढ़ा होना? वैसे सभी के लिए भी यह एक चिंता का विषय है, क्योंकि समय के साथ-साथ हमारी उम्र भी बढ़ती जाती है और एक स्थिति ऐसी आती है कि हमारी कोशिकाएं क्षीण होने लगती हैं उनमें रोगों से लड़ने की शक्ति नहीं बचती। बाल सफेद हो जाते हैं चेहरे पे झुर्रियां पड़ जाती हैं। जिसे देखकर स्वतः ही समझा जा सकता है कि, यह सब बुढ़ापे के चिह्न हैं। बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रखने के साथ ही बच्चों द्वारा तिरस्कार का दंश भी झेलना पड़ता है। शायद यही बुढ़ापे की नियति है कि जिन बच्चों को खून-पसीना बहाकर, पाल-पोसकर बढ़ा किया जाता है वो बच्चें इस पढ़ाव पर साथ छोड़ देते हैं, और छोड़ देते हैं बुढ़ापे के लिए-अकेला। मैं भी अकेला होता जा रहा हूं। सभी मित्रों ने धीरे-धीरे साथ छोड़ दिया, रूकसत हो गये इस संसार से। बचे हुए हैं थोड़े अभी भी, उनमें से एक मैं भी हूं। तैयार हो रहा हूं, रूकसत होने के लिए। क्योंकि मैं बूढ़ा हो रहा हूं?
हां मैं, बूढ़ा हो रहा हूं, कि बूढ़ा होने के साथ-साथ जवान? यह खुद में एक विरोधाभास है। बूढ़ा वो भी जवान? हां मैं बूढ़ा हो रहा हूं फिर भी जवान हूं। मेरे चेहरे की झुर्रियां और बालों की सफेदी पर मत जाईये, निशानी है बुढ़ापे की। फिर भी मेरा दिल, दिनोंदिन जवां होता जा रहा है, सागर की लहरों की तरह। जो छू लेने चाहती हैं आशमां को, उठती हैं, गरती हैं, गिर के फिर उठती हैं, छू नहीं पाती आशमां को, पर कोशिशें निरंतर जारी हैं। हां ये बात और है कि वो उठती तो हैं एक मजबूती के साथ, पर किनारों से टकराके बिखर जाती हैं, खो देती है अपने अस्तित्व को। जो उनका हुआ करता था, कभी।
हां मैं बूढ़ा हो रहा हूं, तभी सागर और लहरों के बीच में आ गया। मैं लहरों की भांति उठने का प्रयास तो कर रहा हूं पर, खंड़-खंड़ में बिखरना नहीं चाहता? जैसे लहरें बिखर जाती हैं किनारों को छूकर। बूढ़ा जो होने लगा हूं। दिल बार-बार कहता है कि, इंसान शरीर से बूढ़ा हो सकता है, दिल से हमेशा जवां रहता है। इसी सोच ने इस उम्र में प्यार के चक्कर में फंसा दिया। हां बूढ़ापे में मुझे प्यार हो गया है वो भी..............? नाम के लिए तो पूरी जवानी लुटा दी। अब नाम में क्या रखा है चाहे मेरा हो या जिससे प्यार हो गया हो, उसका हो? प्यार तो हो गया, चलो जवानी में न सही बुढ़ापे में ही, हो तो गया। क्योंकि प्यार और बुढ़ापा छुपायें नहीं छिपता। तो सभी को मालूम हो गया कि मुझे बुढ़ापे में प्यार हो गया। दोस्तों ने समझाया, बहुत समझाया, ये उम्र नहीं है प्यार करने की? क्या करें? दिल है कि मानने को तैयार ही नहीं हुआ, और दिमाग फिर चलने लगा, कि ये लोग मुझसे और मेरे प्यार से ईष्या करने लगे हैं। तभी तो मुझे रोक रहे हैं, प्यार करने के लिए। मैंने भी जोश में आकर कह ही दिया। उम्र पच्चपन की जरूर हुई है दिल तो अभी भी बच्चपन का है।
ये बात तो सही है कि बुढ़ापे में दिमाग बहुत तेज गति से और दिल की धड़कन धीरे-धीरे धीमी होने लगती हैं तभी तो अपने बुढ़ापे के आगाज के साथ ही वो सारे काम करने शुरू कर दिये, जिन्हें सामाजिक और पारिवारिक दबाव के चलते पूरा नहीं कर सका। इसका एक कारण और है कि जब दीये का तेल खत्म होने लगता है तो एक बार लौ पुरजोर तरीक से जलती जरूर है और जलकर बुझ जाती है। शायद मेरे दीये का तेल भी खत्म होने वाला है, इसलिए मेरे जीवन की लौ फड़फड़ा रही है तभी तो जो काम जवानी में न कर सका, उनका पूरा करने चाह दिल में है। उसमें से एक प्यार भी है। आखिर मुझे भी प्यार हो ही गया। हो भी क्यों न? प्यार तो बांटने का नाम है। जगजीत सिंह ने गाया था कि, न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन, जो प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। अब मन की बात करू तो मन बहुत चंचल होता है एक ठहराव उसे कभी नहीं मिला। वो तो हिरण की भांति, कस्तूरी की तलाश में वन-वन भटकता रहा। भटकना ही उसके जीवन का एक मकसद है। और मेरा भी, हां भटकना नहीं पा लेना, उस प्यार को जो इस बुढ़ापे में हो गया है। कभी जवानी में, मैं भी सोचा करता था कि बुढ़ा होने के साथ-साथ बहुत-सारे रोग इस शरीर को हो जायेंगे, पर ये कभी नहीं सोचा था कि, इस बुढ़ापे में प्रेम का रोग भी हो जायेगा। हो गया क्या करें? ये इश्क की बात है, इसे अंदर की बात समझ सकते हैं कि कौन कहता है? कि बुड्ढे इश्क नहीं करते, बुड्ढे़ इश्क तो करते हैं पर लोग उन पर शक नहीं करते। मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, इश्क हुआ और लोगों के शक का शिकार भी हुआ। कुछ ने समझाया, कुछ ने बुढ़ा समझकर छोड़ दिया, कुछ ने धमकी भी दे डाली, कुछ ने तो यहां तक भी कहां कि बूढ़ा सटिया गया है। सुना सभी को सुना, फिर सोचा लोग दूसरों की बुराईयों को जल्दी ही पकड़ लेते हैं और अच्छाईयों को चने के झाड़ पे फांसी लगा देते हैं। हां चढ़ा सकते है फांसी पे, क्योंकि ये जनता है, बहती गंगा में हाथ धोना जानती है। एक भीड़ की जमात में मार तो सकती है किसी को, पर बचा नहीं सकती, देखती रहती है, तमाशबीन की तरह तमाशा। जैसे खेल खेला जा रहा हो बंदरों का, कभी-कभी तो इस तमाशबीनों से तालीयां भी नहीं बजती। इनका काम सिर्फ तमाशा देखने मात्र है, सिफ तमाशा।
हां बूढ़ा हो रहा हूं, मैं? तभी तो कहां से शुरू किया और कहा खत्म करना है ये भी नहीं सोच पा रहा हूं। फिर भी बहुत सालों से लिखने और पढ़ाने का काम कर रहा हूं तो कहीं-न-कहीं खत्म तो कर ही दूगां, आखिर हर फिल्म का दी एंड होता है, हां आज के परिपे्रक्ष्य में ये बात लागू नहीं होती, उसका पार्ट टू जरूरत न होने पर बना ही दिया जाता है। इस बुढ़ापे का क्या करें, दी एंड होने के बाद, इसका पार्ट टू भी नहीं बन सकता। और कौन बनाएगां? मेरा पार्ट टू।
अरे भई, आप लोगों को और नहीं पकाऊगां, सोच रहे होगें कितना पकाता है, हां यह तो बताना मैं, भूल ही गया कि मैं, बहुत अच्छा पका लेता हूं, हां भई खाना और क्या? अरे नहीं थोड़ा झेलने की क्षमता रखो, इतना झेल लिए, थोड़ा और। क्योंकि मैं बूढ़ा हो रहा हूं? और कुछ समय के बाद मैं इस संसार की पंचशाक्ति में वलीन हो जाउंगा। तब आपको न तो मेरे बुढ़ापे में हुए इश्क से एलर्जी होगी और न ही मेरे पकाने से। कुछ समय की बात और है, बस कुछ समय की। क्योंकि बूढ़ा हो रहा हूं, मैं? या जवान?