Sunday, November 27, 2011

घरेलू हिंसा का समाजशास्त्र


घरेलू हिंसा का समाजशास्त्र



‘प्राचीन भारत में पितृसत्तात्मक युग से पहले मातृसत्तात्मक युग था। नारी शक्ति की परिचायक हुआ करती थी। यह पाषाण युग के बाद का काल था।’1 लेकिन सहस्त्राब्दियों के बाद नारी के जीवन में बदलाव आने लगा और नारी पर धीरे-धीरे पुरूषों का अधिपत्य स्थापित होने लगा। मातृसत्ता की समाप्ति और पितृसत्ता के उदय ने नारी के जीवन को पूर्णतः बदलकर रख दिया। उनके अधिकारों का दोहन शुरू हो गया था। वैसे महिलाएं शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर होती हैं इसलिए पुरूष जब-तब उन्हें ताकत के बल पर झुका लेना चाहता है। औरतों को घर के बाहर तो शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना ही पड़ता है लेकिन घर के भीतर भी वे सुरक्षित नहीं हैं। घर के भीतर महिलाओं को पति के हाथों पिटना पड़ता है। यह किस्से -कहानियों की बात नहीं है कि कुछ पति अपनी पत्नियों को जानवरों की तरह मारते-पीटते हैं। यह निम्न वर्ग के अशिक्षित लोग ही अपनी पत्नियों को मारते-पीटते हैं तो यह गलत है। सच्चाई तो यह है कि उच्च शिक्षित अत्याधुनिक युवतियां भी घरेलू हिंसा का शिकार होती है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि, ‘‘घरेलू हिंसा’ एक प्रकार की अनचाही बलि है जो पत्नी के साथ मारपीट करने, उसकी हत्या करने उसे पागल घोषित करने या छोड़ देने, तलाक देने या किसी स्थान पर बंदी बनाने की घटनाओं के रूप में दिखायी देती हैं। ‘घरेलू हिंसा’ में घमकी देने के रूप में महिलाओं को घूरकर और इशारे से डराया धमकाया जाना  एवं उसकी सम्पत्ति नष्ट किए जाना आदि है।’’2

अक्सर ऐसा होता है कि पति-पत्नी के बीच किसी बात को लेकर विवाद पैदा हो जाता है। विवाद कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि पुरूष हिंसक हो उठता है और वह अपनी पत्नी को लात-घूंसों से पीटने लगता है। चूंकि महिलाएं शारीरिक रूप से पुरूषों के मुकाबले कुछ अक्षम हैं इसलिए पारिवारिक हिंसा का शिकार सदैव औरतें ही होती हैं। ‘घरेलू हिंसा’ किसी एक देश या समाज तथा सीमित नहीं बल्कि दुनिया भर की औरतें ‘घरेलू हिंसा’ का शिकार होती है। निम्न वर्ग के लोग भी घर में औरतों को पीटते है तो उच्च शिक्षित औरतें भी घरेलू हिंसा अभिशप्त हैं। और तो और कामकाजी महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है, पति के हाथों पिटना पड़ता है।

       ‘‘विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों के आधार पर दोनों प्रकार के देशों - औद्योगिक रूप से विकसित और विकासशील देशों में घेरलू हिंसा भड़कने के कारण की एक सूची तैयार की है जो इस प्रकार है’’3 -

§  पुरूषों की आज्ञा न मानना

§  उलटकार बहस करना या जवाब देना

§  वक्त पर खाना तैयार न होना

§  घर के बच्चों की ठीक से देखभाल न करना

§  पुरूषों से घन या गर्ल फ्रेंड्स के बारे में पूछताछ करना

§  पति की अनुमति के बगैर कहीं चले जाना

§  पुरूषों को सेक्स के लिए मना करना

§  पुरूषों को पत्नी पर विश्वासघाती होने का संदेह

लगभग सभी वर्ग और सभी सभ्यताओं में महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। यह बात महिला के व्यक्तित्व पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालती है क्योंकि इसके कारण महिलाओं को अपना अस्तित्व खतरे में नजर आने लगता है। घरेलू हिंसा का सीधा-सा अर्थ घर के भीतर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और मार-पिटाई से है। घरेलू हिंसा के कई आयाम हैं आमतौर पर घरेलू और वैवाहिक हिंसा को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है। वास्तव में ऐसा नहीं है इन दोनों के बीच में एक बारीक-सा अंतर है। ‘घरेलू हिंसा’ एक व्यापक शब्द है जिसे पारिवारिक हिंसा भी कहते है। इसमें सास, ससुर, देवर, जेठ, नंनद आदि द्वारा स्त्री(बहू) को सताना और मारना-पीटना भी शामिल है। घरेलू हिंसा कानून को बने पांच साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है। पर अब तब तस्वीर साफ नहीं हुई है कि इस कानून के तहत देश भर में कितने मामले दर्ज किए गए है। पर 2009 में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह बात निकलकर सामने आई है कि ‘‘तकरीबन 40 फीसदी महिलाएं रोजाना अपने पतियों से पिटती हैं।’’4

घरेलू हिंसा के बारे में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, ‘‘हिंसा के विरूद्ध शिकायत करने वाली महिलाओं में 12 प्रतिशत महिलाएं दहेज के कारण प्रताड़ना की शिकायत करने वाली होती है।’’5  ‘घरेलू हिंसा’ पर काम कर रहे इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन की संचालनात्मक अनुसंधान परामर्शदाता सुश्री नंदिता भाटला ने अपने एक लेख में कैई चैकाने वाले तथ्य दी कि, ‘‘महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के अखिल भारतीय आंकड़े बेहद खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत दे रहे हैं- पिछले पांच साल में ने केवल महिलाओं के विरूद्ध अपराधों में वृद्धि हुई है, बल्कि उत्तरोत्तर अपराधों की संख्या में वृद्धि हुई है। घर के अंदर भी महिलाओं के विरूद्ध घरेलू हिंसा में अत्यंत नाटकीय बढ़ोतरी हुई है। घरेलू हिंसा के मामले में महिलाओं के विरूद्ध हिंसा करने वाले उनके पति और रिश्तेदार शामिल होते हैं। महिलाओं पर घर में हिंसात्मक प्रहार करने वालों में इन लोगों की संख्या सबसे अधिक है।’’6

इंडिया सेफस्टडी द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, ‘‘घरेलू हिंसा पूरे भारत में वर्ग, जाति शिक्षा और रोजगार के स्तर से परे व्यापक रूप से फैली हुई है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि 58 प्रतिशत महिलाओं ने पति द्वारा उन पर की जा रही हिंसा को स्वीकार तो किया पर साथ ही यह भी कहा है कि वे उसके साथ इन मान्यता के आधार पर रह रही हैं, क्योंकि विवाहित जीवन में हिंसा की घटनाएं आम बात होती है।’’7

‘‘भारत एक ऐसा देश हैं जहां हर साल महिलाओं के विरूद्ध अपराध के 1.5 लाख मामले दर्ज किए जाते हैं।’’8 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण कार्यक्रम में घरेलू हिंसा के संबंध में चैकाने वाले आंकडे़ं पेश किये। सर्वेक्षण में 37.2 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया कि विवाह के बाद पति के हिंसात्मक आचरण का शिकार हुई। विवाहित महिलाओं के विरूद्ध की जाने वाली हिंसा के मामलों में बिहार सबसे आगे है जहां 59 प्रतिशत महिला घरेलू हिंसा की शिकार हुई, उनमें से 63 प्रतिशत शहरी इलाकों से थे। दूसरे राज्यों की स्थिति बहुत ठीक नहीं है। मध्य प्रदेश में 45.8, राजस्थान में 46.3, मणिपुर में 43.9, उत्तर प्रदेश में 42.4, तमिलनाडु में 41.9 तथा पश्चिम बंगाल में 40.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा हुई।

‘घरेलू हिंसा’ एक विश्व व्यापी समस्या है और दुनिया भर की महिलाएं किसी-न-किसी रूप से इसका शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोश की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की 70 फीसदी महिला किसी-न-किसी रूप से कभी-न-कभी घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में घरेलू हिंसा के मामले में 53 प्रतिशत की दर बढ़ रहे हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी) की धारा 498ए के अंतर्गत दर्ज मामले (पति और रिश्तेदारों द्वारा अत्याचार व क्रूरता) के होते है।

घरेलू हिंसा को रोकने के लिए भारत सरकार ने सन् 2006 के अंत में ‘घरेलू हिंसा निषेध कानून, 2005’ को लागू करने संबंधी अधिसूचना जारी की जिससे यह कानून पूरे देश में लागू हो गया है।‘‘9 महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण विधेयक, 2005 को लोकसभा द्वारा 24 अगस्त, 2005  और राज्यसभा द्वारा 29, अगस्त, 2005 को पारित किया गया। 25 अक्टूबर का दिन देश की महिलाओं ने लिए कोई सामान्य दिन नहीं था। वह भारत में वैवाहिक मामलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन था। ‘‘उस रोज देश के राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। इस कानून के तहत वित्तीय अधिकारों की रक्षा करते हुए पहली बार घर में ‘‘अदृश्य हिंसा’’-शारीरिक यातना और गाली गलौज एवं यौन अत्याचार को दूर करने का प्रयास किया गया है।’’10 प्रारंभ में इस कानून के तहत महिलाओं को पति व बिना विवाह के साथ रह रहे पुरूष और रिश्तेदारों के हाथों हिंसा से बचाने की बात कहीं गयी थी लेकिन बाद में पति की मां, बहन तथा अन्य महिला रिश्तेदारों को भी इसके दायरे में ले लिया गया।

घरेलू हिंसा निवारण कानून एक महत्वपूर्ण कानून है और इसके द्वारा घरेलू हिंसा को प्रभावी तरीके से रोका जा सकेगा। इस कानून में निम्नलिखित कृत्यों को अपराध घोषित किया गया है।

§  महिला का शारीरिक, भावनात्मक, आर्थिक या यौन शोषण करना या इसकी धमकी देना।

§  महिला को ताने मारना।

§  पुरूष द्वारा घर में महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा जीवन और शरीर को कोई नुकसान या चोट पहुंचाना।

§  महिला को किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक कष्ट देना या ऐसा करने की मंसा रखना।

§  महिला का यौन उत्पीड़न

§  महिला की गरिमा व प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना

§  बच्चे न होना या पुत्र न होने पर ताने मारना

§  महिला को अपमानित करना।

§  महिला की आर्थिक व वित्तीय जरूरतों को पूरा न करना।

§  महिला (पत्नी को ) शारीरिक संबंध बनाने या अश्लील चित्र आदि देखने को मजबूर करना।

§  सेक्स के दौरान ऐसा कृत्य जिससे पत्नी को चोट पहुंचती हो।

§  दहेज न लाने के लिए प्रताड़ित करना।

§  महिला या बच्चों को पीटना, धक्के मारना, घूंसे मारना।

§  महिला को आत्महत्या की धमकी देना।

इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना जायेगा। दोषी पाए जाने पर एक साल की सजा या 12 हजार रूपये का जुर्माना या दोनों सजा साथ-साथ दी जा सकती है। कानून में पीड़ित महिलाओं की मद्द के लिए एक संरक्षण अधिकारी और गैर-सरकारी की नियुक्ति का प्रावधान है ये पीड़ित महिला की मेडिकल जांच, कानूनी सहायता, सुरक्षा व छत मुहैया कराने का काम करेंगे। इन कानून में घरेलू हिंसा को रोकने के लिए बेहद सख्त प्रावधान बनाये गये हैं। लेकिन कानून बना देना ही समस्या का समाधान नहीं है। कानून के बावजूद महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। इस कानून में यह प्रावधान किया जाये कि प्रत्येक जिले में कम-से-कम एक संरक्षण अधिकारी अवश्य नियुक्त किया जाये और कोशिश की जाये कि यह अधिकारी यथासंभव महिला ही हो, और इन अधिकारी द्वारा ग्रामीण और निम्न वर्ग की महिलाओं को इस कानून और इसके प्रावधानों के बारे में विस्तार से समझाया जाये ताकि वे घरेलू हिंसा निवारण कानून के लाभ को प्राप्त कर सके और घर में भी सिर उठकर सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सके।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1- कादम्बिनी-मातृसत्तात्मक युग से अब तक नारी-नवंबर, 2009, पृ. 24
2- ममता, प्राक्कथन प्रो. आभा आहूजा- घरेलू हिंसा अधिकारों के प्रति महिलाओं की जागरूकता-   रीजनल  पब्लिकेशन, नई दिल्ली-2010, पृ. 15
3- देवसरे, विभा- घरेलू हिंसाः वैश्विक संदर्भ- आर्य प्रकाशन मंडल, दिल्ली- 2008, पृ. 124-125
4- पति से रोज पिटती हैं, चालीस फीसदी महिलाएं- बेवदुनियां, हिंदी- 26 अक्टुबर, 2008
5-देवसरे, विभा- घरेलू हिंसाः वैश्विक संदर्भ- आर्य प्रकाशन मंडल, दिल्ली- 2008, पृ. 113
6- वही,  पृ. 114
7- वही, पृ. 115
8- इंडिया टुडे- नए कायदे विवाह के- 6 दिसंबर, 2006, पृ. 20
9- अरोड़ा, सत्यार्थ- घरेलू हिंसा से महिलाओं का सरंक्षण अधिनियम, 2005- अरोड़ा बुक कम्पनी, मेरठ-2010, पृ. 8
10-इंडिया टुडे- नए कायदे विवाह के- 6 दिसंबर, 2006, पृ. 18

Saturday, November 26, 2011

टीआरपी की नीति और विज्ञापन


                                    टीआरपी की नीति और विज्ञापन
टीवी का एक अपना अलग अर्थशास्त्र है, जिसके तहत टीवी काम करता है। किसी भी चैनल की अर्थव्यवस्था उसके विज्ञापन पर निर्भर करती है। विज्ञापन उसी टीवी चैनल को मिलता है जिसका टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) अच्छा है। टीआरपी एक निज़ी संस्था के जरिए किया गया टीवी चैनलों का सर्वेक्षण है, जिससे यह पता चलता है कि किस चैनल को कितने दर्शक मिल रहे हैं।
वर्ष 1986 में टीआरपी की यात्रा ‘आई एम आर बी’ (इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो) के माध्यम से अस्तित्व में आई। मंडलोई, लीलाधर, इनसाइड लाइव, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, 2006. (इनसाइड लाइव, लीलाधर मंडलोई, पृ.-108) इस पूरी व्यवस्था और इसके सूत्रपात्र के पीछे बाजार का दबाव था। यही कारण था कि भारत में इसे सबसे बड़ा बाजार मुंबई से शुरू किया गया। शहरों में इस सर्वेक्षण के पीछे यह भी उद्देश्य था कि चैनल के आधार पर यह पता लगाया जाए कि शहर में ऐसे कितने दर्शक हैं, जो क्रय क्षमता रखते हों, जो टीवी कार्यक्रमों की जीवनशैली को अपनाएं और वे बाजार के अधीन होते जाएं। आज टीआरपी सभी टेलीविजन चैनलों की हृदयगति है। हिंदी में इसे हम टीआरपी की जगह ‘दर्शक मीटर’ कह सकते हैं। यह वह पैमाना है, जिसके द्वारा चैनलों की लोकप्रियता को प्रतिशत में एक निश्चित अवधि के लिए दर्शाया जाता है।
टीवी कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों की संख्या से जुड़ा यह तकनीकी शब्द जिस तरह प्रचलित हुआ है, वैसा ही प्रिंट मीडिया की प्रसार संख्या को जानने के लिए एक तरीका है- ‘एबीसी’ अर्थात् ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सुर्कलेशन’। टीवी और टीआरपी को लेकर एक मुहावरा बना है- ‘फलां टीवी चैनल टीआरपी के लिए विवाद दिखा रहा है।’’ यह टीआरपी ही विज्ञापन जगत के करोड़ों रुपयों की दुनिया का भाग्यविधाता है। विज्ञापनदाताओं का सीधा गणित टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट से चलता है। अतः यह समझना जरूरी है कि विज्ञापन और टीआरपी का क्या संबंध है।
टीआरपी मीटर प्रत्येक शुक्रवार को टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट के माध्यम से इस बात का पता लगाती है कि किस चैनल को और किस कार्यक्रम को देखने के लिए सबसे ज्यादा दर्शक मिले। उसके बाद दौड़ शुरू होती है, विज्ञापनदाताओं की। विज्ञापन का मूल उद्देश्य उत्पाद से परिचय कराने के साथ-साथ उसे बेचना अर्थात् ज्यादा-से- ज्यादा ग्राहक तैयार करना भी होता है। और, विज्ञापनदाताओं के इस मूल उद्देश्य को पूरा करने की संभावना एक हद तक ज्यादा देखे जाने वाले चैनल और कार्यक्रम पूरी करते हैं। इसीलिए विज्ञापन एजेंसियां ज्यादा टीआरपी वाले चैनल या कार्यक्रम को अपना विज्ञापन देती हैं, जिसके लिए करोड़ों की बोलियां लगायी जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है। उदाहरण प्रस्तुत है-
‘‘सर्दियां आने वाली हैं। हम कुछ खास आपकी त्वचा के लिए लेकर आ रहे हैं। कमिंग सून।’’ ऐसे विज्ञापन अक्सर )तु परिवर्तन से पहले आते हैं। और, बाद में संबंधित उत्पाद का विज्ञापन आता है। दर्शक के दिमाग में नए-नए तरीके से पकड़ बनना विज्ञापन का पहला काम होता है। भले ही वह उत्पाद न खरीदे। हालांकि, विज्ञापन का असर उपभोक्ता के दिमाग पर वे लम्बे समय तक रखने में कामयाब होते हैं।
दरअसल, ‘कमिंग सून’ के विज्ञापन कुछ खास चैनलों पर आते हैं, जिन्हें देखने के लिए दर्शक चैनल नहीं बदलता और इसी आधार पर टीआरपी का घोड़ा लम्बी दौड़ लगाने में सफल हो जाता है। स्टारप्लस पर आने वाला एक प्रसिळ कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ भारतीय टेलीविज़न के सबसे चहेते कार्यक्रमों की शृंखला में उच्च स्थान रखता है। यह कार्यक्रम अपनी दूसरी पारी वर्तमान समय में दिखा रहा है। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसको भारतवर्ष में प्रायः सभी क्षेत्रों में पसंद किया जा रहा है। इसके आंकलन का पैमाना टीआरपी है। अर्थात् टीआरपी के माध्यम से यह पता चलता है कि किस दिन और कितना समय कौन-सा चैनल टीवी पर सबसे ज्यादा चला है। जाहिर है कि यदि हम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ नामक कार्यक्रम देखते हैं, तो टीआरपी मीटर में समय के साथ कार्यक्रम व चैनल का नाम भी सेव हो जाता है। इस विधि में आंकलन शुक्रवार को होता है, जिससे पता चलता है कि सोमवार से शुक्रवार शाम 8 से 9 बजे तक भारतीय टेलीविजन में सबसे ज्यादा स्टार प्लस देखा गया है। क्योंकि, इस अवधि में इस चैनल पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ कार्यक्रम चलता है। अब टीआरपी तय करता है कि कार्यक्रम के समय में आने वाले विज्ञापन अपना कितना समय खरीदते हैं। यह समय खरीदने की प्रक्रिया बोली से तय होती है। उदाहरणस्वरूप यदि ‘कौन बनेगा करोड़पति’ कार्यक्रम के समय विज्ञापन का समय 10 मिनट है, तो इस दस मिनट में कितने विज्ञापन दिखाए जा सकते हैं, यह चैनल तय करता है। और, अब शुरू होती है यहां से विज्ञापनदाताओं की भूमिका। मान लीजिए 30 सेकेंड के विज्ञापन के लिए ‘स्टार प्लस’ को नोकिया फोन Õ 20 लाख देता है। यदि उसी समय के लिए वोडाफोन ने ‘स्टार प्लस’ को 25 लाख देना स्वीकार करता है, तो वह समय (विज्ञापन) वोडाफोन का होगा। इस प्रक्रिया में जहां विज्ञापन को ज्यादा बाजार उपलब्ध होता है, वहीं दूसरी ओर चैनल भी अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर लेते हैं। टीआरपी, चैनल, कार्यक्रम और विज्ञापन के इस गठबंधन में यदि कोई ईकाई कमजोर पड़ती है, तो वह है- ‘व्यक्ति’। यहां व्यक्ति ;समाजद्ध की भूमिका केवल ‘उपभोक्ता’ की बन कर रह जाती है। भले ही इस पूरी प्रक्रिया में ‘व्यक्ति’ केन्द्र में हो, लेकिन वहां मानवता जैसी भावना का स्थान ‘व्यक्ति विशेष’ बड़ी चतुरता से ले जाता है।
समग्रतः टीआरपी और विज्ञापन की नीति के सामने व्यक्ति आज बहुत ही सूक्ष्म इकाई बन कर रह गया है। विज्ञापनदाता को चैनल या कार्यक्रम से कोई लम्बा चैड़ा लेना-देना नहीं होता है। इस पूरी शृंखला में टीआरपी का सिक्का ही चलता है। इस टीआरपी के लिए चैनल चाहे वह खबरिया चैनल हो या फिल्मी चैनल हो या तथाकथित पारिवारिक चैनल हो, अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ उल-जलूल कार्यक्रम प्रसारित करते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर कलर्स चैनल का ‘बिग बॉस’, एनडीटीवी ईमेजिन का ‘स्वयंवर’ आदि कई ऐसे कार्यक्रम पेश किए जाते हैं, जिनके चलते उन्हें दर्शक मिलते हैं। इन दर्शकों का मिलना ही अब चैनलों के जीवत रहने का एक मात्र उपाय रह गया है। क्योंकि, जिस चैनल के पास जितने दर्शक (टीआरपी) हैं उसे विज्ञापन उतनी ही आसानी से मिल जाते हैं। अस्तु, संप्रेषण के संसाधनों में टीआरपी की यह दखल दिन-प्रतिदिन प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से अति संवेदनशील बनती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप चैनल अपनी-अपनी निज़ी लाभोपार्ज़न व सीमित मनोवृत्ति के आधार पर कार्यक्रम बना रहे हैं, ताकि उनकी टीआरपी न बिगड़े। एक अनुमान के मुताबिक 2020 तक विज्ञापन का कारोबार लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। मंडलोई, लीलाधर, इनसाइड लाइव, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, 2006. (इनसाइड लाइव, लीलाधर मंडलोई, पृ.-12)

अश्लीलता का बाजार- गंदा है पर धंधा है ये ?

                     अश्लीलता का बाजार- गंदा है पर धंधा है ये ?

भारतीय समाज में अश्लीलता सदियों से व्याप्त रही है। जिसको भिन्न-भिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। परंतु समाजशास्त्रियों तथा बुद्धजीवियों ने अश्लीलता को असभ्यता से जोड़कर देखा है। ज्यों-ज्यों सभ्यता का विकास हुआ त्यों-त्यों समाज ने अश्लीलता को नग्नता से जोड़ दिया। हालांकि सदियों से मौजूद नग्नता को अश्लीलता नहीं माना जाता था, क्योंकि देखने का नजरियां, उनका दृष्टिकोण कुछ अलग था।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अश्लीलता को नारी शरीर से जोड़ दिया है। यह अश्लीलता नारी शरीर से जुड़ा एक ऐसा पहलू है जिसमें लगातार पुरूष का दृष्टिकोण परिवर्तित होता रहता है। यह परिवर्तन अभी तक अपने से इतर सभी पर लागू होता था, परंतु अब घर की चारदीवारी में भी प्रवेश कर चुका है। क्योंकि पुरूष की मानसिकता में जो बदलाव आया है उस बदलाव के कारण वो सभी को कामुक दृष्टि से निहारने लगा है। जिसका साथ वर्तमान परिदृश्य लगातार दे रहा है।
आज अश्लीलता दिन-प्रतिदिन अपनी चरम सीमा को लाघंते हुए बाजार तक पहुंच गया है। इस अश्लीलता को सभ्य समाज ने कभी भी मान्यता प्रदान नहीं की। परंतु वो ही समाज अब धीरे-धीरे उसका समर्थन करने लगा है। इसका मूल कारण कुछ भी हो सकता है, चाहे मजबूरी कहें या वक्त की मांग। समर्थन तो दे दिया है।
यह बात सही है कि जब से निजी चैनलों का आगमन हुआ तब से इसमें वृद्धि हुई है, और इस वृद्धि में तीव्रता इंटरनेट ने ला दी है। पहले अश्लीलता लुके-छिपे बहुत कम संख्या में अश्लील साहित्यों में प्रकाशित होती थी। परंतु टी.वी. और इंटरनेट ने इसमें चार चांद लगा दिए हैं। इस मुखरता और आर्थिकीकरण ने अश्लीलता को बाजार की दहलीज तक पहुंचा दिया है। जो आज पूंजी कमाई का सबसे आसान जरीया बन चुका है। अश्लीलता के इस धंधे में छोटे-से-छोटे अपराधियों से लेकर, बडे़-से बडे़ माफियाओं, बाहुवलियों, समाज के सभ्य बुद्धजीवियों और-तो-और समाज को आईना दिखाने वाला मीडिया भी उतर चुका है। क्योंकि मीडिया भी इस बाजार की चकाचैंध से अपने आपको बचा नहीं सका। मीडिया में प्रकाशित विज्ञापन हो या फिर चैनलों में प्रसारित खबरें? अश्लीलता पूरी तरह साफ देखी जा सकती है। वहीं मीडिया यह कहकर अपना पल्ला झांड देता है, कि जो बिकता है हम वही दिखाते हैं। बिकने का क्या है? आज हर चीज बिकाऊ हो चुकी है। मिर्ज़ा गालिब़ ने ठीक ही कहा था- ‘‘हमको मालूम न था क्या कुछ है बेचने को घर में, ज़र से लेकर ज़मी तक सब कुछ बिकाऊ है।’’ उसी तर्ज पर मीडिया विज्ञापनों और खबरों को और गरमाता जा रहा है। जिससे उनके चैनलों की आमदनी में इजाफा हो सके। इस गरमाहट के बाजार का मुख्य कारण कम व्यय में अधिक आमदनी भी है। जिससे इस बाजार में हर कोई आने की होड़ में दिखाई दे रहा है।
ध्यातव्य है कि, अश्लीलता का आरोप हम केवल-और-केवल पश्चिमी देशों पर नहीं मड़ सकते, कि सिर्फ वहां से ही अश्लीलता का बाजार गरमाता है और उसकी गरमाहट हमारे देश तक आती है। यह बात हमारे देश पर भी लागू होती है कि अश्लीलता के बाजार की आग हमारे यहां भी जलायी जा रही है। वो भी बिना रोक-टोक के। अश्लीलता की अग्नि को रोकने के लिए बने कानून भी कारगर सिद्ध नहीं हो रहे हैं, इसलिए अब यह बाजार कानून को मुंह चिड़ाता हुआ खुल्लम-खुल्ला चलाया जा रहा है।
आज बाजार में अश्लील साहित्यों से लेकर, विज्ञापन, खबरें, पोर्न फिल्में सभी कुछ उपलब्ध है। एक सर्वे के अनुसार, ‘‘लगभग 386 पोर्न साइटें अश्लीलता को बढ़ावा दे रही हैं, जिस पर करोड़ों लोग प्रतिदिन सर्च करते हैं।’’ वहीं टी.वी की बात क्या करें? विज्ञापन और खबरों की आड़ में मानों पोर्न परोस रहे हो। क्योंकि यह अश्लीलता बिन बुलाए मेहमान की तरह सीधे हमारे घरों में प्रवेश कर चुका है। चाहे कॉडोम का प्रचार हो या फिर बलात्कार की खबरें। अश्लीलता इतनी भर दी जाती है जिसे देखकर हर कोई शर्मसार हो न हो पर, घर में सबकी निगाहें यह बताने का भरकर प्रयास करती हैं, कि हमने कुछ नहीं देखा। वहीं कुछ पत्रिकाएं तो इस पर अपना विशेषांक भी निकाल रही हैं। चाहे इसका समाज पर नकारात्मक प्रभाव ही क्यों न पड़ें। क्योंकि जो चीज लगातार हमारे समझ परोसी जाती है उसके प्रति मनुष्य की मानसिकता बन ही जाती है। इस मानसिक बदलाव के चलते पुरूषों में कामुकता बढ़ना स्वाभिक है। बढ़ती कामुकता के कारण, समाज में अश्लील हरकतें, बलात्कार, प्यार के नाम पर धोखा देना, फिर उसकी अंतरंग तस्वीरों को खीचना, उसको ब्लैकमेल करना, उससे पैसे की मांग करना, उसक एम.एम.एस. बनाकर सार्वजनिक करना आम हो जाता है, और समाज में महिलाओं के प्रति अपराध में इजाफा होने लगता है। मैं केवल पुरूषों की मानसिकता पर इल्जाम नहीं लगा रहा हूं, इस अश्लीलता के वातावरण ने पुरूष हो या स्त्री, सभी को अपनी चपेट में ले लिया है। वहीं स्त्री अपने आपको उच्च स्तर पर पहुंचाने के लिए इसका सहारा लेने से भी नहीं चूकती। यही हो रहा है।
समाज में व्याप्त इस अश्लीलता का कौन जिम्मेदार है? यह कहना मुश्किल है। बस यहां यही कहा जा सकता है कि गंदा है पर धंधा है ये ?

Friday, November 25, 2011

मीडिया में सांप्रदायिक शक्तियाँ


            मीडिया में सांप्रदायिक शक्तियाँ



हम सबने बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मीडिया की रिपोर्टिग के विषय में सुना है जो वे छोटे-छोटे देशों में संक्रमण के दौरान काम करते हैं। यहां मैं उस बात को दोहराऊंगा नहीं, बल्कि अलग बातें करूंगा। मैं सोचता हूं कि किसी बड़े देश, मसलन भारत में कोई बड़ा मीडिया हाउस संक्रमण के समय कैसे काम करता है। एशिया के विभिन्न देशों के मीडिया के विश्लेषण से अनेक बातें सामने आती हैं। वह भारत हो या पाकिस्तान या श्रीलंका या नेपाल, मैं ऐसे देशों की बात कर रहा हूं जहां प्रसारित समाचार को लाखों की संख्या में दर्शक-पाठक यानी अटूट सत्य के रूप में अंगीकार करते हैं। रेडियो पर प्रसारित एक झूठी ख़बर ऐसी उग्र भीड़ इकट्ठा कर सकती है उसकी कल्पना यूरोपीय देशों में नहीं की जा सकती।

आज से वर्षों पहले भारत की प्रसिळ प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपात्काल की घोषण कर संवैधानिक व्यवस्था को निरस्त कर दिया था, लोगों से उनके मूलाधिकार छीन लिये थे, मानवाधिकर पर बंदिश लगा दी थी। उस समय जार्ज फर्नांडिस पर यह आरोप था कि वे संसद भवन को बम से उड़ाने की साजिश रच रहे थे। तीन वर्ष जेल में बंद रहने के बाद जब फर्नांडिस छूटे तो उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए ये शब्द कहे ‘‘इंदिरा गांधी ने आपको सिर झुकाने के लिए कहा लेकिन आप उनके पैरों पर लेट गए, उन्होंने आपको थोड़ा झुकने के लिए कहा आप उनके तलवे चाटने लगे।’ मुझे संशय है कि वर्षो के बाद भी भारतीय मीडिया के स्वरूप में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। बड़े पूंजी वाले मीडिया घरानों की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है।

चंद अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के समाचारपत्रों ने तानाशाही शक्तियों के सामने अपनी हार नहीं मानी। उनका संघर्ष आज भी जारी है। लेकिन दुःखद आश्चर्य है कि ऐसे समाचार पत्रों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मीडिया मानवाधिकार से जु़ड़े हुए आंदोलनों का आधार स्तंभ है। उसकी आवाज़ में बुलंदी है जो लोगों के लिए अत्यंत ही आवश्यक है। बहुसंख्यक समाचार पत्र राजनीतिक और प्रशासनिक दबावों के चंगुल में फंसे हुए हैं। महज पैसे, लालच और स्वार्थ के ख़ातिर पत्रकारिता की निष्पक्षता की कुर्बानी दे दी जाती है।

राजनीतिज्ञों द्वारा झूठ की तस्वीर बनाने में मीडिया सहायता करता है। इस झूठ की बुनियाद पर समाज को ‘अपने’ और ‘दूसरे’ जैसे खेमों में बांट दिया जाता है। दरअसल, हर जातीय और सांप्रदायिक दंगे की जड़ के पीछे यही झूठ छिपा होता है। बहुसंख्यक समुदाय के बीच यह संशय बना होता है कि उनके बीच भी अल्पसंख्यक समुदाय का बोध किसी न किसी रूप में छिपा हुआ है। भारत की जनसंख्या तकरीबन 105 करोड़ है। हमें नहीं मालूम इस विशाल जनसंख्या के अंतर्गत कितने यूरोप बनाए जा सकते हैं। ईसाई समुदाय का प्रतिशत करीब 2.3 है। मुसलमान करीब 12 प्रतिशत है और सिख 2 प्रतिशत हैं। अगर बहुसंख्यक समुदाय में अल्पसंख्यकवाद की भावना नहीं है तो वह किस भय से ग्रसित है? महज 2.5 करोड़ ईसाई, 2 करेाड़ सिख या 12 करोड़ मुसलमान से उन्हें क्या डर हो सकता है। उनकी तादाद तो 85 करोड़ से भी अधिक है।

झूठ इस बुनियाद पर टिका है कि ‘अगर आप मेरे जैसे नहीं हो तो आप अलग हो’, ‘अगर आप अलग हो तो आप मेरे दुश्मन हो’। चूंकि आप दुश्मन हो तो आपका अंत निहायत लाज़िमी है। आज की नियति यही है। सच तो यह है कि हंगटिंगटन ने ‘सभ्यताओं की लड़ाई’ का सिळांत भारत से ही लिया होगा। इस झूठ को फलने-फूलने में राज्य के तंत्र भी उसके साथ हैं। इस बुनियाद पर नए नियम बनाए जा रहे हैं, जिसके अंतर्गत मुसलमानों को मस्ज़िद बनाने का अधिकार नहीं है। ईसाई को चर्च बनाने का अधिकार छिन लिया गया।

अगर आपको अपना धर्म बदलना है तो आपको पुलिस-कोर्ट में हाज़िरी देनी होगी। अगर आपको अपने परिचितों के शव को दफ़न करना हेागा तो आपको कोसों दूरी तय करनी होगी, क्योंकि शवगृह के दरवाजे नगर निगम के जिम्मे आते हैं और वहां पर भी अल्पसंख्यक समुदायों के साथ न्याय नहीं होता। ये परिस्थितियां घृणा और तिरस्कार की राजनीति से उत्पन्न हुई है। जिसके निशाने पर ईसाई, सिख और मुसलमान समुदाय के लोग ही हैं।

मुझे दुख है कि इतना कुछ होने के बावजूद मीडिया चुप है क्योंकि उसे विश्वास है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह सही है। ऐसा इसलिए कि इसमें बहुसंख्यक समुदाय की आवाज मिली है। लोकतंत्र भी तो बहुसंख्यकवाद पर ही टिकी हुई है। लेकिन दर्द इस बात का है कि मीडिया अत्यंत ही घिनौनी और स्वार्थपूर्ण और अन्याय की राजनीति को अपने आंखों से देखने के बावजूद भी चुप है। भारतीय मीडिया एक ओर ब्रिटिश मीडिया के नक्शे कदम को अख्तियार कर अपने आपको निष्पक्ष और स्वतंत्र मानता है। लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। यहां के महत्त्वपूर्ण मीडिया घराने उद्योगपतियों या राजनीतिक दलों के हिमायती बने हुए हैं। आज से पांच वर्ष पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था एक बंद व्यवस्था थी। उद्योगपतियों को मुनाफे के लिए सरकारी तंत्रों की जरूरी थी। ऐसे माहौल में मीडिया की निष्पक्षता कैसे स्थापित हो सकती है। मुनाफे के लिए हर मीडिया हाउस को सरकारी अनुदेशों को मानना होता है। अगर कोई कोलंबिया स्कूल से भी पत्रकारिता की डिग्री करके आया हो तो भी कुछ बात बनने वाली नहीं है। वह भी दमघोटू वातावरण में अपनी निष्पक्षता और गुणवत्ता को भूलकर महज दकियानूसी व्यवस्था का एक पालतू जीव बनकर रह जाता है। मालिक सरकारी हुक्म का हिमायती होता है तो पत्रकार मालिक के आदेशों का पालन करता है। क्या ऐसे माहौल में मीडिया की निष्पक्षता बन सकती है?

सरकारी आगोश में फल-फूल रही मीडिया यही करती है। इसे ही हम राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देशभक्त मीडिया का दर्जा दे रहे हैं। दरअसल, यह राष्ट्रभक्ति एकपक्षीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती है। जिसमें न तो सहनशीलता होती है और न ही सर्वांगीण समाज के विकास की भावना मसलन ‘एक राष्ट्र, एक लोग, एक धर्म और संस्कृति’ की बुनियादी पर यह राष्ट्रवाद टिका होता है। अगर इस विचारधारा को आत्मसात कर लें तो भारत का आधारभूत स्वरूप ही विखंडित हो जाएगा क्योंकि हमारी शक्ति या विशिष्टता तो विविधताओं में एकता की है। वर्षों से विभिन्न समुदाय के लोग सप्तरंगी धनुष में बंधकर भारत की प्रतिष्ठा और श्ािक्त को बढ़ाते रहे हैं। यूरोप में भी 1920 के दशक में अतिराष्ट्रवाद की भावनाओं से उत्पन्न स्थिति को जर्मनवासी देख चुके हैं। जिसने हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाहों को जन्म दिया। इसलिए स्थिति सचमुच में भयावह है। सरकारी तंत्रों में फंसा मीडिया सरकारी अनुदेशों का तो पालन कर सकता है लेकिन अल्पसंख्यक वर्ग के दुख-दर्द को नहीं बांट सकता।

बहुतेरे बड़े समाचार पत्रों के संपादक सत्ताधारी पार्टी के सहयोग से संसद के सदस्य बने बैठे हैं। कुछ संपादक जो राजनीतिक समीकरण के जरिए संसद भवन में पहुंचे हैं और कुछ की सांठगांठ सत्ताधारी पार्टी से है। ऐसे माहौल में निष्पक्ष पत्रकारिता की कल्पना भी बेकार है। दक्षिणपंथी विचारधारा की बातें समाचार पत्र की सुर्खियों में हर सुबह दिखाई देती है और लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाओं का हनन होता है। दरअसल, यही स्थिति टेलीविजन इलेक्ट्रॅनिक मीडिया की है। बहुत हद तक यह मीडिया सरकारी तंत्रों द्वारा नियंत्रित है।

दूसरी तरफ अंतराष्ट्रीय मीडिया है जिनके पुरोधा स्टार टेलीविजन के श्री मडॉक हैं। उनके द्वारा भारत में एमटीवी, विदेशी फिल्में और समाचार चैनेल दिखाए जाते हैं। वर्तमान कानूनी पेचीदगियों की वजह से स्टार चैनेल की अपलिंकिंग विदेशों से ही होती है। ऐसी स्थिति समस्याओं का हू-ब-हू चित्रण संभव नहीं हो पाता। कभी-कभी लोग बीबीसी और सीएनएन की तरफ मुड़ते हैं। लेकिन बीबीसी भारत में अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रहे समाचार को कहां-कहां कवर कर पाएगी?

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में फेरबदल की वजह से भारत अमेरिका का सहयोगी बन गया है। इसकी वजह से अमेरिका का नजरिया भी भारत के प्रति बदल गया है। मानवाधिकार के विषय पर अमेरिका भारत की खिंचाई नहीं करता। यह परिवर्तन खतरनाक संकेत का सूचक है। हमें नहीं मालूम कि जर्मनी में भारत संबंधी मानवाधिकार हनन के मसले पर कितना विचार विमर्श होता है। भारत में बाल मजदूरी से लेकर बहुओं को जलाने तक की घटनाएं रोज होती हैं। मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय पर अत्याचार का सिलसिला अनवरत जारी है। इसलिए जरूरी है कि एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की जाए जिसमें मीडिया के लोगों को शिक्षा दी जाए कि मानवाधिकार से संबंधित मसलों पर निष्पक्ष और संतुलित रिपोर्टिं कैसे की जाए।

भारत के इर्द-गिर्द भी माहौल वैसा ही है। श्रीलंका के जातीय युद्ध की लड़ाई समाचार पत्रों की सुर्खियों में भी दिखाई देती है। समाचार पत्र भी दो खेमों में बंटे हुए हैं। ये खेंमे एक-दूसरे पर छींटाकशी से बाज नहीं आते। पाकिस्तान और नेपाल में भी प्रेस की निष्पक्षता खतरे में है। इसलिए हमारी कोशिश पूरे दक्षिण एशिया में और विशेषकर भारत में ऐसी प्रशिक्षण संस्थाओं की स्थापना से है।

मैं मीडिया से अपील करना चाहता हूं कि आप विषयों को भलीभांति समझें, उनकी समीक्षा करें। यूरोप भारतीय उपमहाद्वीप में कई और सरकारी संस्थाओं को सामाजिक कार्यों के लिए आर्थिक सहायता मुहैया कराती है। दरअसल, इन्हीं संस्थाओं में कई संस्थाएं किसी खास विचारधारा से जुड़ी हैं। उन्हीं के द्वारा अल्पंसंख्यक वर्गों पर अत्याचार होता है। इसलिए जरूरत है उनके चेहरे पर लगे नकाब को हटाकर पहचानने की, उनकी विगत गतिविधियों की जांच करने की। जब तक ऐसा नहीं होगा अल्पसंख्यक वर्गों का शोषण होता रहेगा। हमारी अपील है कि आप ऐसी किसी संस्था को आर्थिक सहायता न दें जो विषवमन करती हो और उस विष के पीने से हजारों लोग मरते हों।

महिला राजनीतिक सशक्तिकरण और मीडिया


                     महिला राजनीतिक सशक्तिकरण और मीडिया


मीडिया और स्त्री के निहितार्थ विभिन्न घटकों में मीडिया के सापेक्ष स्त्री और स्त्री के सापेक्ष मीडिया का मूल्यांकन शमिल है। आज के मीडिया का अर्थ जहां अब तोते, कबूतर, दूत-दूती, पोस्टमैन, घोड़ा वगैरह नहीं रह गया है, वहीं आज की स्त्री का मतलब भी करूणामूर्ति, हूर, अबला, मां, बहन, पत्नी, कुमारी, सुकुमारी आदि तक सीमित नहीं है। मीडिया हमारे समय का बहुत प्रबल घटक है। और, महिला हमारे समय में अपनी पहचान और छाप और होने की पूरी शिद्दत के साथ अपने बूते पर दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। इस संदर्भ में महिला मीडिया की ओर आषा भरी निगाहों से देख रही है। मीडिया अपनी चमक को और चमकीला बनाने के लिए स्त्री का उपयोग करने के लिए आतुर है, जबकि स्त्री अपनी अस्मिता को साबित करने के लिए मीडिया का उपयोग करने के वास्ते हलकान है। इस जुगलबंदी में मीडिया की मंषा और उसका वर्तमान तो काफी हद तक स्पष्‍ट है। लेकिन, स्त्री की मंशा और उसकी ऐतिहासिक स्थिति इससे काफी जटिल है। आंकड़ें बताते हैं कि आधुनिक विश्‍व में सामाजिक स्तर पर क्या विकसित, क्या विकासशील और क्या अविकसित देशों में थोड़े-बहुत हेर-फेर के स्त्री को पुरूष के सापेक्ष दोयम दर्जे का ही नागरिक माना जाता है, और इसी आधार पर उनके साथ होने वाला उत्पीड़न प्रायः सार्वभौमिक है। इस दृष्टि से समूची दुनियां की स्त्री के दुख, समस्या और परिस्थिति एक जैसी है। और, स्त्री की सत्ता कई तरह से बीच बहस में है, केंद्र में है।

समकालीन परिवेश में विश्‍व की गिनी-चुनी शक्तियों में मीडिया की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता है। अस्तु, मीडिया सशक्त माध्यम है, जनभावनाओं को व्यक्त करने का। मीडिया अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से रखता है, जिसका सीधा-सीधा प्रभाव देखने वालों पर पड़ता है। साथ ही मीडिया ने वैश्विक दूरियों को कम किया है। राष्‍ट्रीय और वैश्विक स्तर पर घटित घटनाओं को सामने रखा है। मीडिया के दोनों माध्यमों इलेक्ट्रॅनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया का आज भी खास प्रभाव है। इसलिए महिलाओं से जुड़े तमाम देखे-अनदेखे, ज्ञात-अज्ञात मुद्दों को सामने लाने में मीडिया की भूमिका ध्यातव्य है। मीडिया में इस हेतु संवेदनशील गहरी अंतदृष्टि अपेक्षित है। इतना ही नहीं, वैश्विक समस्याओं से लेकर स्थानीय मामलों तक को मीडिया उठाता है हालांकि, जीवन के सथार्थ से जुड़े मुद्दों को लेकर मीडिया के दोनों माध्यमों की सक्रियता कम दिखती है, अभिरूचि कम दिखती है। इस संदर्भ में उदाहरण स्वरूप कहना चाहिए कि वे स्त्रियों से जुड़े मामलों को उतना महत्त्वपूर्ण नहीं मानते है। मीडिया में भी वही पितृसत्तात्मक मानसिकता काम करती है, जो सदियों से स्त्रियों के लिए नियम-कायदे बनाती चली आई है।

इसमें संदेह नहीं कि मीडिया ने स्त्री के लिए संभावनाओं के कई आयाम खोल दिए हैं। ये जितने रूपहले और चमकीले हैं, उतने ही आत्मस्मृति मुलर (अपने को पहचान की सुविधा प्राप्त करने वाले) और आत्मनिखार के अवसर देने वाले भी। हम अगर उसे वैश्विक संदर्भ में सिर्फ़ बाजार मान लें, तभ भी एक यह गुंजाइश तो बची ही रहती है कि हम वहां एक प्रतिस्पर्धी उपस्थिति के लिए स्वाधीनता के साथ संघर्षरत रहें। गायन, नृत्य, अभिनय, कला-कौशल की अन्य भूमिकाओं में मीडिया ने स्त्री के लिए लगभग युगांतर की स्थिति / उपस्थिति पैदा कर दिया है। जानी-मानी गायिकाएं, युवा-नृत्यांगनाएं, अभिनेत्रियां अनेक महत्वपूर्ण चैनलों से जुड़ी सूचना और संवाद दूतियां इस सच्चाई को प्रमाणित करती हैं कि महिलाओं के जीवन के इतिहास में एक नए युग की शुरूआत हो चुकी है। इस संदर्भ में मीडिया हस्तक्षेप व दखल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए अब महिलाओं के समक्ष चुनने की क्षमता अथवा उनके विकल्पों में इज़ाफा हुआ हैं और वह नई दृष्टि से अपने आस-पास को देखने लगी हैं। मेरा मानना है कि स्त्री हमेशा से अधिक नैतिक, मानवीय और उर्जामयी रही है। आगे भी उसकी यही छवि रहेगी। क्योंकि, वह जितनी भावनात्मक है, उतना ही मर्यादामय भी। मीडिया की कार्यशैली व सोच में महिला की दृष्टि बहुत अधिक दिनों तक अछूती नहीं रहेगी। वह आयाम एक नयी दृष्टि लेकर महिला सशक्तिकरण के समस्त प्रयासों को उर्जामय बना देगी, ऐसी संभावना व्यक्त की जा सकती है।

अपराध और मीडिया

                                                      अपराध और मीडिया

अपराध का इतिहास तो बहुत ही पुराना है। देखा जाय तो हर समाजशास्त्री ने अपराध को अपने-अपने नजरियें से परिभाषित किया है और अपराध को एक सामाजिक संबंध में बांध दिया है। जिसमें उसके नियम और कानून का पालन करना पड़ता है। भारतीय समाज में अपराध कई रुपों में व्याप्त है। यह बात सही है कि अपराध के लिए भारतीय समाज की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितयाँ उत्तरदायी हैं, जैसे-गरीबी, आर्थिक-पिछड़ापन, विषमता, सामाजिक व्यवस्था, निरक्षरता, अज्ञानता आदि, जिनसे विवश होकर लोग आपराधिक प्रवृत्ति का रास्ता चुन हैं। एक ओर अपराध जगत आकर्षित करता है और दुसरा अपराध जो घृणा, द्वेष, राजद्रोह, अलगाववाद, मजहवी उन्माद आदि से प्रेरित होता है। जिसके कारण आतंकवादी एवं हिंसक गतिविधियाँ बढ़ती हैं।
निजी चैनल के आगमन की बात कहें तो सबसे पहले निजी चैनलों में जी.टी.वी. का आगमन 1993 में हुआ, उसके बाद स्टार न्यूज आया।  निजी चैनलों ने अपने प्रसार कार्यक्रमों के निमार्ण में, सबसे पहले सामाजिक परिवेश को समझा और धीरे-धीरे अपने अनुरुप कार्यक्रमों का निमार्ण किया। दर्शकों को अपनी ओर खीचा, दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए नये-नये कार्यक्रमों का प्रसारण शुरु कर दिया, जिसे मानवीय रिश्तों के कार्यक्रम कहा जाता है। लेकिन अवमानवीय संबंधों को अनसुना कर दिया गया। नये कार्यक्रमों के साथ-साथ अपराध कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया जाने लगा। जिसे अमानवीय कहा जा सकता है। लेकिन आज हर न्यूज चैनल अपराध की खबरों को महामंडित करके खुलेआम परोस रहे हैं। जो अपराधी नहीं हैं, उनको भी अपने कार्यक्रमों के द्वारा उन पर मुकद्मा चलावा देते हैं। और दर्शकों को लगता है, कि यही अपराधी होगा। क्योंकि दर्शक जब टेलीविजन कार्यक्रम देखता है तो जो दृश्य उसके समाने परोसे जाते हैं वो उसके चेतन मन में घर कर जाते हैं। चाहे वो सही हो या गलत,  वैसे दो प्रवृत्तियां समाज में काम करती हैं-
एक तत्यपरक रिर्पोटिंग और दूसरी प्रवृत्ति के रुप में पुरानी किसी घटना को जीवंत कर या नाटकीय रुपांतरण करके दिखाना। इस तरह के कार्यक्रमों में अपराध को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। अब तत्यपरक रिर्पोटिंग को देखा जाय तो आज तक, स्टार न्यूज और NDTV चेनलों में अपराध खबरे, सामाजिक प्रभावों के बारे में बिना सोचे दिखा दिया जाता है, कि अपराध आम जन-जीवन के लिए समस्या अंग हो। आज साधारण और असाधारण खबरों में फर्क ही महसूस नहीं हो पा रहा है। कौन खबर सामान्य है? और कौन असामान्य है? ये खबरियां चैनल अपराध को सकारात्मक रुप में पेस कर रहे हैं। अपराधी को किसी ग्रुप से जोड़कर, प्रचार-प्रसार किया जाता है। जिससे अपराधियों को और मद्द मिल रही है। अपराधी के व्यवहार को रोमांटिक रुप में पेश किया जा रहा है। अपराध के बारे में तो बताया जाता है लेकिन अपराधी की गिरफ्तारी को नहीं बताया जाता। आज अपराधियों को ताकतवर रुप, समाज पर तीव्रगति से असर करता है। अपराध की खबरे व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होती है। अपराधिक कार्यक्रमों को देखा जाए तो सभी चैनल का यह एक अभिन्न अंग बन चुका हैं जो चैनल के लिए ज्यादा-से-ज्यादा टी.आर.पी. बढ़ाने के चक्कर में अचार संहिता को भी ताक पर रख दिया जाता है।
 यह बात सही है कि सामाजिक सरोकार नैतिक मान्यताओं के साथ जुड़ा हुआ है। सभी प्रकार के समाजों में कुछ व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार प्रतिमानों का उल्लंघन करते हैं, जिसमें अपराध का प्रतिमान नजर आता है। दुनिया को एक नजर देखा जाए तो पूरे विश्व में किसी-न-किसी रूप में अपराध देखने को मिलता है। भारत में टेलीविजन के आगमन होना और समाज के लिए शिक्षा, सूचना और मनोरंजन के रूप में कार्यक्रमों का निर्माण करना और समाज को एक नई दिशा के रूप अहम भूमिका का निवर्हन करता है।
समाज में घटित होने वाली घटनाओं को दूरदर्शन पर ‘आँखों देखी’ का एक कार्यक्रम में प्रस्तुत किया जाता रहा, लेकिन जैसे ही दूरदर्शन का एकाधिकार समाप्त हुआ और टेलीविजन की दुनिया में निजी चैनलों का आगमन होने तथा वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण ने हर चैनलों को अपने मुनाफे कमाने का एक रास्ता खोल दिया। इसके साथ-साथ अधिक-से-अधिक टी.आर.पी. को बढ़ाने के लिए आपराधिक कार्यक्रमों का बोलबाला होने लगा। अमेरिकन ‘मोस्ट वाटेड’ कार्यक्रम के तर्ज पर सुहेव इलियासी ने इंडियाज मोस्ट वांटेड कार्यक्रम को चर्चित कर दिया। इस कार्यक्रम ने अनेक अपराधी पकड़वाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। निजी चैनलों में क्राइम शो को लेकर सभी चैनलों में एक होड़-सी मच गयी और क्राइम शो के आधार पर हर समाचार निर्मित किये जाने लगे हैं। अपने शो को चलाने के लिए अपने विषय का चुनाव करने वाले NDTV ने FIR शुरू किया तो वहीं आज तक ने (जुर्म) और जी न्यूज ने (क्राइम फाइल) और (रेड एलर्ट) स्टार न्यूज ने शुरू किया। 2005 तक आते-आते क्राइम शो का बाजार इतना फैल गया की अन्य समाचारों की अपेक्षा अपराध कार्यक्रमों की टी.आर.पी. अधिक होने लगी, जिस कारण से अपराध कार्यक्रमों से अधिक-से-अधिक विज्ञापन मिलने लगे।
क्राइम शो के निर्धारण का समय लगभग 11 बजे रात को किया गया, जिसे आज (टी.आर.पी.) की दृष्टि से भी दर्शक की संख्या कम नहीं होती है। क्राइम घटनाओं में मसाला लगाकर इस तरह परोसा जाने लगा कि दर्शक कार्यक्रमों से बंधे रह जाते हैं। हर चैनल अधिक- से-अधिक टी.आर.पी. बटोरने के चक्कर में पड़ गया है व अपराध और सामाजिक नैतिक मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं रह गया है। हर ख़बरियां चैनल ही टी.आर.पी. की लूट-घसोट में पड़ा है। एक-दूसरे से प्रतिस्पद्र्धा है। सभी तरह से समझौता करके चैनल नंबर वन होना चाह रहे हैं। देखा जाय तो टेलीविजन पर सेक्स और अपराध का आधारित कार्यक्रमों की भरमार लगी है।
आज समाज जागरूक हो रहा है। जब ‘इण्डियाज मोस्ट वांटेड’ क्राइम शो शुरू किया गया था तो लगभग छियासी (86 अपराधी पकड़े गये थे। कार्यक्रमों के उपलब्धि के रूप में माना जाता है। जैसे जालसाजी, ठगी, बेईमानी, धोखेबाजी, की वारदातों से समाज का हर व्यक्ति जागरूक हुआ है। आज देखा जाय तो 2011 में हर चैनल आपराधिक कार्यक्रमों समय जरूर दे रहे हैं। आज दर्शक को एक उपभोक्ता के रूप में देखा जा रहा है। फिर भी सामाजिक जन-जीवन को ध्यान में रखकर ही कार्यक्रमों का निर्माण किया जाता है। इससे दर्शकों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अगर समाज का अध्ययन किया जाए तो जितनी भी विचारधारा होती हैं, वे किसी के लिए सकारात्मक होती है तो किसी के लिए नाकारात्मक। उसी तरह से दर्शक में कुछ में नकारात्मक तो कुछ में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। यह कारण सर्वमान्य हो सकते हैं कि समाज में अगर अपराध नहीं होता, तो अपराध खबरों के कार्यक्रमों का निर्माण खबरियां चैनलों द्वारा नहीं किया जाता। इससे समझ में आ रहा है कि समाज में भी हर कोई आपराधिक कार्यक्रमों से कहीं-न-कहीं प्र्रभावित तो जरूर होता है।
अब बात यहां आकर रूक जाती है कि अपराधिक खबरों के प्रसारण से समाज में कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके लिए एक शोध की आवश्यकता महसूस होती है। परंतु संपूर्ण कार्यक्रम के प्रसारण करने का ढंग देखा जाए तो अपराधिक प्रवत्तियों को कहीं-न-कहीं बढ़ावा देती नजर आती है। क्योंकि समाज जितना अच्छाई को स्वीकार करता है उसकी तीव्र गति से उसकी बुराईयों को स्वीकार कर लेता है। इस आलोच्य में कहा जाए तो जब से अपराधिक कार्यक्रमों की बाढ़-सी आई है तब से समाज में अपराध बढ़े हैं कम नहीं हुए, और इन अपराधों की संख्या में इजाफा का जिम्मेवार उन अपराधियों के साथ-साथ मीडिया भी है जिसे मीडिया माने या न माने पर जिम्मेवारी तो उसको लेनी ही पडे़गी। क्योंकि मीडिया, अपराध को जिस तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, और समझता है कि हमारा कम तो हो गया। हां काम तो हो गया, समाज को उस अपराध से रू-ब-रू कराने का, जिनसे अभी तक समाज अनभिज्ञ था। इस तरह अपराधों को यदि मीडिया दिखाता रहा तो समाज में अपराधियों की बढ़ोत्तरी को सरकार तो क्या खुद मीडिया भी नहीं रोक पायेगा। वक्त रहते संभलने की जरूरत है या टी.आर.पी. के खेल के चलते, समाज में अपराध को बढ़ाने की, यह मीडिया और समाज भलीभंति सोच सकते हैं। सोचों, आखिरी सोच आपकी है और समाज हमारा।

Wednesday, November 23, 2011

मीडिया और मानवाधिकारों का हनन

                                           मीडिया और मानवाधिकारों का हनन
टेलीविजन समाचारों के आने के बाद समाचार के क्षेत्र में क्रांति आई है। जल्दी और ताजा खबरों की मांग बढ़ी है। फोटो का महत्त्व बढ़ा है। स्वयं को देखने सजने] संवरने और ज्यादा से ज्यादा मुखर होने की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। व्यक्तिवाद में वृद्धि हुई है। किंतु इसके साथ साथ खबरों को छिपाने या गलत खबर देने की प्रवृत्ति में भी वृद्धि हुई है। खासकर मानवाधिकारों के हनन की खबरों को छिपाने के मामले में मीडिया खासकर टीवी सबसे आगे है। चूँकि मानवाधिकार का संदर्भ किसी व्यक्ति के जीवन] स्वतंत्रता और गरिमा से सम्बद्ध है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा 1948 विश्व की एक महत्त्वपूर्ण घटना है और संयुक्त राष्ट्रसंघ की महान उपलब्धि है।
मानवाधिकार स्थैतिक नहीं है। ये गतिशील है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के विकास कार्यक्रम के तहत् हर वर्ष प्रकाशित मानव विकास रिपोर्ट में नए आयामों की झलक मिलती है। वे सब तत्व जो मानव के विकास के मार्ग में बाधक हैं वहां मानवाधिकारों का उल्लंघन है] रोजगार भी उतना ही बड़ा मानवाधिकार है जितना जीने का अधिकार है। मंहगाई भी मानवाधिकार का हनन है] आबादी की विस्फोटक बाढ़ मानवाधिकार का हनन है] प्रदूषित पर्यावरण मानवाधिकार पर अतिक्रमण है।
भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन अक्टूबर 1993 में हुआ। राष्ट्रीय तथा राज्य मानवाधिकार आयोगों को विशेष रूप से उन मानवाधिकारों की रक्षा का भार सौपा गया है जिनका पुलिस तथा सुरक्षा बलों द्वार अतिक्रमण किया जाता है, यह पर्याप्त नहीं है वास्तव में मानवधिकार आयोग को दण्ड तथा राहत देने का भी अधिकार दिया जाना चाहिए।
मानवधिकार आयोग के अब तक जितने अध्यक्ष रह चुके है उन सबने ज्यादा अधिकारों की मांग की है। मानवाधिकारों की मौजूदा परिभाषा में व्यक्ति अधिकारों की मांग की है। मानवाधिकारों की मौजूदा परिभाषा में व्यक्ति के जीवन] स्वतंत्रता] समानता और गरिमा से जुड़े संवैधानिक अधिकारों में वे अधिकार भी जोड़े जाए जो उन अतंरराष्ट्रीय संधियों व परम्पराओं में किए गये है जिनमें भारत का एक पक्षकार है। साथ ही सरकार को आयोग की सिफारिशें भी मानना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पश्चिमी संगठनों का एकतरफा पक्षपातपूर्ण नजरिया रहता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित सभी संगठन केवल अपराधियों एवं आतंकवादियों के मानवाधिकारों को बात करते हैं। लेकिन आतंकवादियों के हाथों मारे गए निर्दोष लोगों के बारे में कुछ नहीं कहते। भारत में जम्मू-कश्मीर में मारे गए निर्दोष लोगों की बात एमनेस्टी इंटरनेशनल नहीं करता है। पाश्चात्य देशों में मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट इतनी ज्यादा एकतरफा और पूर्वाग्रह ग्रस्त होती है कि उनकी नीति और उद्देश्यों पर शक होने लगता है।
 जर्मनी यदि भारत के कालीन उद्योग में बच्चों के अधिकार का सवाल उठाता है तो इसके पीछे उसका व्यावसायिक हित छिपा दिखाई देता है। अमेरिका भी यदि चीन में किसी घटना के बहाने मानवाधिकार का प्रश्न उठाता है तो उसके पीछे मकसद वहां की सरकार और उसकी व्यवस्था को बदनाम करना होता है। वास्तव में मानवाधिकार का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के ब्रिटिश विभाग के एक पत्र में मुखपृष्ट पर इस मानवाधिकार संघ ने कश्मीरी महिलाओं पर सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले अत्याचार बताने के नाम पर एक दक्षिण भारतीय स्त्री का चित्र दे दिया था। ऐसे कई उदाहरण है जिनमें इन संगठनों का पक्षपातपूर्ण रवैया रहा है।
प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान] सूचना और बौद्धिक संतुष्टि पाने का मानवाधिकार है। इसके लिए मीडिया उसका उपयुक्त एवं स्वतंत्र साधन है। मीडिया लोकतंत्र की आत्मा है] राजनैतिक और सामाजिक संवाद का प्राण तत्व है। यह स्वतंत्रता का प्रतीक है। जन-जन की आवाज है] लेकिन मीडिया यह तभी कर सकता है] जब उस पर सरकारी अंकुश न हो] उसकी आवाज दबाई न जाए। जैसे-जैसे सरकार राजनैतिक] संगठन अपनी मर्यादाओं और नियमों के बाहर जाकर फायदा उठाने की कोशिश करंगे] उतना ही मीडिया पर दबाव और हमले बढ़ते जाएंगे। लोकतंत्र के आधारों में से मीडिया एक महत्त्वपूर्ण आधार स्तम्भ है। परंतु विश्व में मीडिया के ऊपर हमले बढ़ते जा रहे हैं। मीडियाकर्मी की हत्याएं बढ़ती जा रही हैa। इंटरनेशनल प्रेस इंस्ट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पत्रकारों का पूरे विश्व में सरकारी दमन हो रहा है। पत्रकारों पर हमले की घटनाएं विश्व के अधिकांश देशों में हो रही हैं। इनमें कई विकासशील तथा पूर्वी यूरोप के देश शामिल है। मीडिया को दबाने की कोशिश पश्चिमी देशों में भी हो रही है। विश्व के विभिन्न देशों में पिछले वर्षों में कई पत्रकारों की हत्याएं हुई।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिकांश देशों में से कुछ ही मीडिया की स्वतंत्रता का गंभीरतापूर्वक सम्मान करते है। सत्तारूढ़ व्यक्तियों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का दमन किया जाता है। युनेस्को के महानिदेशक ने कहा कि सच्चाई बताने वालों को अक्सर राजनैतिक] जातीय] धार्मिक] असहिष्णुता का कोपभाजन बनना पड़ता है। चीन] इरान] म्यांमार] जाम्बिया] इण्डोनेशिया] मैक्सिको] सर्बिया टयूनीशिया और यमन में हालात खराब है। उगांडा तथा अलजीरिया में मीडिया के विरूद्ध हिंसा की घटनाएं इस्लामी विद्रोहियों तथा सरकारी सैनिकों दोनों ही पक्ष से हुई है। इसके कारण कई पत्रकारों को देश छोड़कर भागना पड़ा है। रूस में भी पत्रकारों के लिए काम करना कठिन रहा है।
संपादकों को रासुका में बंद रखना तानाशाही मानसिकता के सूचक है। कोयंबटूर में राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों को चाकू मारे। कश्मीर घाटी में पत्रकारों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। वहाँ पत्रकारों को सरकार तथा आतंकवादियों दोनों का शिकार होना पड़ता है। महाराष्ट्र से प्रकाशित समाचार पत्रों के कार्यालयों पर शिवसैनिकों ने कई बार हमले किए।
तमिलनाडू में पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमें लगाए गए। तहलका डाट काम के पत्रकारों पर भी मुकदमें दायर किए जा रहे है। नागालैण्ड में पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों पर हमला किया। मानवाधिकार आयोग ने इसे घोर आपत्तिजनक माना है। शिवानी हत्याकाण्ड में एक आई.पी.एस. अधिकारी पर मुकदमा चल रहा है। बहुजन समाज पार्टी के सुप्रिमों भी पत्रकारों को पीट चुके है। फिल्मों में काम करने वाले कलाकार भी कई बार पत्रकारों पर हमला बोल देते है। राजनैतिक लोगों के अपराधियों से संबंध होते है और उनके माध्यम से पत्रकारों को डराया धमकाया जाता है।
उपर्युक्त सभी घटनाएँ यह परिलक्षित करती है कि मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा और दबाव बढ़ रहा है उस पर नियंत्रण आवश्यक है। लोकतंत्र के लिए विधायिका] कार्यपालिका] न्यायपालिका एवं खबरपालिका चारों स्तंभ महत्त्वपूर्ण है। भारत के संविधान में विधायिका] कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के संबंध में स्पष्ट प्रावधान है परंतु मीडिया के संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। न तो उनके अधिकारों के बारे में और न ही उनकी सुरक्षा के संबंध में। बल्कि शासनीय गुप्त बात अधिनियम जैसे कानून आज भी विद्यमान है। इस अधिनियम के प्रावधानों से मीडियाकर्मियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। सूचना के अधिकार बिल को संसद में रखा जा रहा है परंतु सरकारी गोपनीय कानून को समाप्त करने या संशोधन करने के विषय में सरकार बिल्कुल भी नहीं सोच रही है। वर्ततान समय में सरकारी गुप्त बात अधिनियम अप्रासंगिक हो चुका है। इसी प्रकार मानहानि तथा न्यायलय की अवमानना कनूनों में भी संशोधन की आवश्यकता है। इस संबंध मं सरकार को गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
मीडिया से संबंधित लोगों पर हो रहे हमलों के संबंध में सरकार को कारगर कदम उठाना चाहिए। जो मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है यदि उसी के मानवाधिकारों का हनन होगा तो वह इतनी महत्त्वपूर्ण जिम्मदारी कैसे निभायेगा। इसलिए मीडिया पर बढ़ रहे दबाव एवं उनके मानवाधिकारों के हनन को रोकना होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना होगा तभी मीडिया अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा पायेगा। इस प्रकार मानवाधिकार संस्कृति को बढ़ावा देने में मीडिया महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।

Tuesday, November 22, 2011

मुख्‍यमंत्री जी ये आप क्‍या करने जा रही हैं




                  मुख्‍यमंत्री जी ये आप क्‍या करने जा रही हैं

उत्तर प्रदेश में चौथी बार मुख्यामंत्री के पद पर विराजमान मायावती अपने किसी स्वार्थ पूर्ति के चलते उत्तर प्रदेश का बंटवारा करने पर उतारू हो गयी है। शायद ये अंग्रेजों की किसी रणनीति को अपने राजनीतिक क्रियाकलापों में ग्रहण कर, बंटवारा चाह रही हैं। जो अंग्रेजों ने किया उसी तर्ज पर मायावती चल रही हैं, यानि फूट डालों और शासन करो। शासन करने का ये कौन-सा नियम है समझ से परे की बात लगती है कि एक प्रदेश के इतने बंटवारे कर दिए जाए कि कुछ समय सीमा के उपरांत के बाद हम आपस में ही लड़ने लगे।

जैसा कि सभी जान रहे हैं कि मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित कर चुकी हैं। अगर ये प्रस्तार केंद्र सरकार द्वारा भी पारित कर दिया गया तो उत्तर प्रदेश चार भागों बंटने से कोई नहीं रोक सकता। क्योंकि किसी दबाव के चलते केंद्र सरकार को यह फैसला मानना पड़ सकता है। शायद सरकार को गिरने से बचाने के लिए। फिर चार मुख्यमंत्रियों का कब्जा उत्तर प्रदेश पर होगा। जो थोड़ा कुछ विकास हो रहा है गरीब जनता का, वो भी पूर्ण रूप से रूक जायेगा। क्योंकि इन मंत्रियों को अपनी झोली भरने से फुरसत ही कहां मिलेगी।

उत्तर प्रदेश का एक बंटवारा पहले भी हो चुका है जिसे हम उत्तराखंड़ के नाम से जानते हैं। इस प्रदेश के उत्तर प्रदेश से विभाजित होने पश्चात् उत्तराखंड़ का तो विकास हुआ, वहीं उत्तर प्रदेश के विकास की गति में एक और अवरोध उत्पन्न हो गया। यदि ऐसे ही बंटवारे का सिलसिला चलता रहा तो एक दिन उत्तर प्रदेश के कई भाग हो जाएंगें। ऐसा भी हो सकता है कि पूर्व में चलती रही राजा-रजवाड़ों की प्रथा, फिर से अपने पुरजोर पर हावी हो जाएगी। जितने जिले अभी हैं उतने प्रदेशों में तबदील हो जाएंगें, जिसमें किसी-न-किसी नेता की हुकूमत चलेगी। और वो जनता को कहीं अधिक लूट सकेगा। ध्यातव्य है कि हमारा देश एक बंटवारे की मार पहले ही झेल चुका है जिसकी मार हम आज भुगत रहे हैं। मैं पाकिस्तान के भारत से अलग होने की बात कर रहा हूँ।

इस परिप्रेक्ष्य में कहें तो क्या घरों का बंटवारा करने से कभी विकास हुआ है। जो गरीब है वो गरीब रह जाता है, जो अमीर है और अमीर बन जाता है। आज मुख्यामंत्री प्रदेश का हिस्सा करने पर अमादा हैं, तो कल दूसरा मुख्य मंत्री उसी प्रदेश को और भागों में विभाजित करवा देगा। यही सिलसिल चलता रहेगा, फिर एक दिन ऐसा भी हमारे समक्ष आ खड़ा होगा जब प्रदेश के कई हिस्से हो चुके होंगे और हर हिस्सा अपने आप में एक प्रदेश तो होगा पर जाति पर आधारित। कि फलां प्रदेश इस जाति का है और फलां इस जाति का। साफ शब्दों में कहा जाए तो जातिगत बंटवारा। यह बंटवारा कहीं-न-कहीं एक संकेत दे रहा है कि हम फिर से गुलामी की ओर बड़ी तेजी से बढ़ हैं। और सब-के-सब बुद्धजीवी लोग चुपचाप हाथों-पे-हाथ रख कर तमाशा देखने में लगे हुए हैं। कोई इसके विरोध में आवाज उठाने की जहमत नहीं करना चाह रहा है। क्योंकि सभी पार्टियों को इसमें अपना-अपना उल्लू सीधा करने को मिल जाएगा। पर वो आने वाले संनाटेपूर्ण विनाश की तबाही से बेखबर, अपनी-अपनी रोटियां सकने में तुल हुए हैं।

मेरा तो यही कहना है कि उत्तर प्रदेश की जनता को इस बंटवारे का पूर्णरूप से विरोध करना चाहिए, ताकि विकास के नाम पर होने वाली तबाही से हम सब बच सके। नहीं तो एक दिन यहीं नेता हम सबको बेच देगें,और हम यही कहेंगे कि अब पछतायें होत क्या, जब चिडियां चुग गई खेत।