Sunday, November 20, 2011

क्‍या होगा उत्‍तर प्रदेश का


                           क्‍या होगा उत्‍तर प्रदेश का

कुछ महीने और बाकी हैं और वो समय जल्द् ही हमारे नजदीक आ जाएगा जब उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से चुनाव का बाजार गर्म होगा। और यह बाजार का भाव (चुनाव के परिणाम) यह निर्धारित करेंगा, कि उत्तर प्रदेश का अगामी मुख्यमंत्री कौन बनेगा। कौन पांच साल तक गरीब जनता पर राज करेगा। वैसे अभी से सभी पार्टियों के कार्यकर्ता आने वाले चुनाव के लिए जी-तोड़ कोशिश में जुट गये हैं। सभी पार्टियां ये आश लगाये हुए हैं कि अगामी मुख्यमंत्री हमारी ही पार्टी का होना चाहिए। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री पुन: गद्दी पर विराजमान होने के गुनताड़े बिठाने में लगीं हैं। शायद हमें परिणामों की बात नहीं करनी चाहिए, जब चुनाव होंगे तो स्व़त: सभी को ज्ञात हो जाएगा कि ऊंठ किसी करवट बैठेगा।

इस आलोच्य में देखा जाए तो आजादी के बाद से बहुत-सारे मुख्यमंत्रियों ने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी सपा, तो कभी बसपा। जिसका क्रम लगातार चलता रहा। और सभी मुख्यमंत्रियों द्वारा यही बयान दिया गया कि उत्तर प्रदेश का विकास हो रहा है। किस तरह का विकास है जो सिर्फ मुंह जबानी या कागजों में दिखाई देता है और जिसे विकास को नाम दे दिया जाता है। हां ये बात सोलह आने सही है कि विकास तो हुआ है पर किसका, यह भविष्य के गर्द में है। परंतु विकास उत्तर प्रदेश का नहीं हुआ, बल्कि मुख्यमंत्रियों और उनके रिश्तेदारों व पार्टियों के कार्यकर्ताओं का हुआ। जिन्होंने दिन दूनी-रात चौगनी तरक्की की है, इजाफा किया है अपनी कमाई में।

मैं किसी पार्टी विशेष पर इल्जाम नहीं लगा रहा हूँ। मैं सिर्फ विकास बता रहा हॅू कि विकास हुआ है। चाहे जिसका हुआ हो। वैसे सभी ने विकास के नाम पर लूटा बहुत। किसी ने आवास के नाम पर, किसी ने अधिकरण के नाम पर, किसी ने मनरेगा के नाम पर, किस ने रोजगार के नाम पर, किसी ने भर्तियों ने नाम पर, किसी ने बैकलोक के नाम पर, किसी ने पैंशन के नाम पर। लूटा सभी ने है। किसी ने कम लूटा तो किसी ने अति से भी अधिक। और इस लूट का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

यह बात कहने में गलत नहीं होनी चाहिए कि नेताओं ने गरीब जनता को लूट-लटकर अपने घर में रोशनी की है। जिसको जनता ने अपनी किस्मत मान लिया है। इसी बदनसीबी और अपनी भूल को बदलने के लिए जो उन्होंने पांच साल पहले की थी। पर होता ढांक के तीन पात। कि सांज हुई सजने लगे कोठों के बाजार, और ग्राहक मन का न मिल बदन लुटा सौ बार।

Thursday, November 17, 2011

मीडिया और मानवाधिकार


                               मीडिया और मानवाधिकार



मीडिया का प्रमुख कार्य है, आम जनता तक सही सूचनाएं सही समय पर पहुंचाना ताकि वे अपना निर्णय स्वयं ले सकें और अपनी परिस्थितियों को अच्छी तरह आंक सकें। मीडिया से निर्भीकता तथा सत्यनिष्ठा की जो उम्मीदें की जाती हैं, वे इस कारण कि वह जनसामान्य के प्रति अपनी इस प्रतिबद्धता से विचलित न हो।

‘‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसके समानांतर ही एक भूमिका निभाता है। वह जनसामान्य को उसके सभी रिश्तों में वास्तविक भूमिका और उचित जानकारी से संपन्न कराने का उत्तरदायित्व लेता है। जब कभी भी मनुष्य को उसकी गरिमा से वंचित करने की कोशिश की जाती है, तो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अपने अनिवार्य हस्तक्षेप से उसे दूर करने का प्रयास करता है। इस प्रकार मानव अधिकार एक आंदोलन है। जब हम मानव अधिकारों के वर्तमान संदर्भ की बात करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया का मूल स्वरूप मानव अधिकारों के पैरोकार के रूप में सामने आता है तथा उसका मूल उद्देश्य दुनियाभर के लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना है।’’

भारतीय परिपे्रक्ष्य में संचार माध्यमों को अपनी ताक़त का अंदाजा स्वाधीनता आंदोलन से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व स्वयंसेवी संगठनों का आपस में गहरा रिश्ता रहा। और, यही रिश्ता आज मानव अधिकारों के संदर्भ में और अधिक सबल हुआ है। आयोग का मीडिया के साथ चोली-दामन का संबंध है। आयोग द्वारा मीडिया के साथ अपने संबंधों को बहुत व्यापक परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र हित को ध्यान में रखकर एक ऐसे तंत्र की स्थापना की कोशिश की गई है, जो देश भर में मानव अधिकारों के आंदोलन की ज़मीन तैयार कर सके।

आज मीडिया ने अपनी अहमियत से सबको परिचित करा दिया है। मीडिया ने वर्तमान संदर्भ में एक नयी संस्कृति को विकसित करने की कोशिश शुरू की है, जिसे हम सशक्तिकरण की संस्कृति भी कह सकते हैं। निःसंदेह, अब मीडिया शक्तिशाली भूमिका में आया है। आज मीडिया के कारण ही मानव अधिकारों के बहुत सारे संवेदनशील मामले सामने आए हैं।

मीडिया मानव अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। हालांकि, समाचारपत्रों में मानवाधिकारों के हनन के नाम पर सिर्फ़ पुलिस हिरासत और जेल हिरासत में होने वाली गतिविधियों तथा मौतों की ख़बरें ही अधिकांश रूप से प्रकाशित की जाती हैं। परंतु, सामाजिक घटनाओं को (मानवाधिकार हनन) अब भी वह स्थान नहीं मिल पा रहा है, जो उसे मिलना चाहिए। उल्लेखनीय है कि मानव अधिकार आयोग ने भी संवाददाता द्वारा प्रकाशित बहुत-सी मानव अधिकार हनन जैसी घटना को आधार मानकर कार्रवाई की है। कई बार तो मामले प्रकाश में आए हैं, और बहुतों को इससे राहत भी मिली है। उदाहरणस्वरूप देश के समक्ष बाटला हाऊस मुठभेड़ काफी सुर्खियों में रहा। तत्कालीन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस. राजेंन्द्र बाबू ने कहा कि ‘‘मीडिया केवल सामाजिक मुद्दों, गरीबी से उत्पन्न समस्याओं तथा कुपोषण से होने वाली मौतों पर ज्यादा ध्यान दें न कि मुठभेड़ों और पुलिस हिरासत में हुई मौतों को अधिक ऐहमियत दें। मीडिया को आज अपने अधिकारों से वचित लोगों के अधिकारों की रक्षा के मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।’’ समाचारपत्रों की अपेक्षा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मानवाधिकार से संबंधित ख़बरों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

मानव अधिकारों का दायरा बहुत व्यापक है। इसके बाद भी आज मीडिया से जुडे़ लोगों को इसकी विस्तृत जानकारी नहीं है। इससे यह पता चलता है कि मीडियाकर्मी कितने संवेदनशील हैं। अधिकांश मामलों में होता यह है कि संवाददाता या रिर्पोटर पुलिस द्वारा दी गई रिपोर्ट/जानकारी को ज्यों-का-त्यों प्रकाशित कर देते हैं, चाहे वो गलत ही क्यों न हो। इसके साथ-साथ मानवाधिकार से संबंधित बड़ी ख़बरों को समाचारपत्रों में स्थान नहीं मिल पाता। सन् 1984 में इलाहाबाद जिले में पुलिस द्वारा आदिवासियों के साथ उत्पीड़न की ख़बर को बहुत से पत्रकार कवरेज करने पहुंचे। परंतु, यह ख़बर केवल जनसत्ता में ही प्रकाशित हुई, और किसी अन्य समाचारपत्र ने इस ख़बर को महत्त्व देने की जरूरत महसूस नहीं की। जनसत्ता में छपी इस ख़बर से विधानसभा में खलबली मच गई और सभी दोषियों को सज़ा मिली। हालांकि, इस ख़बर को जो प्रमुखता दी जानी चाहिए, वह नहीं मिल सकी। कहना गलत न होगा कि समाचारपत्र और टी.वी. चैनल मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता का प्रचार-प्रसार करने में एक अहम् रोल निभा सकते हैं। परंतु मीडिया मानव अधिकारों से संबंधित मामलों से कन्नी काटते रहते हैं।

भारत सरकार के ऐसे बहुत से आयोग है, जिनका मीडिया से कोई संवाद का रिश्ता नहीं है। ये आयोग मीडिया को किसी वार्षिक आयोजनों में ही आमंत्रित करते हैं। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के गठन के बाद आयोग और मीडिया के बीच एक गहरा रिश्ता बना है। इस रिश्ते के कारण आयोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञाप्तियों, न्यूज़़ लेटर और पत्रिकाओं को भी प्रकाश में लिया जाता है। आयोग ने मीडिया और मुख्य तौर पर क्षेत्रीय भाषाई पत्रकारों को अपने अभियान में जोड़ने की पहल की है। परंतु, मानव अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले पत्रकारों को ही पुलिस और प्रशासन की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ता है। इसके साथ-ही-साथ मीडिया यह भी मानता है कि लाइव कावरेज के नाम पर और टी.आर.पी बढ़ाने के लिए उसने सारी हदें पार कर कर दी है। परिणामस्वरूप ताज होटल में फंसे बंधकों और सुरक्षा बलों की जान को भी खतरा पैदा हो गया था। इसी क्रम में मीडिया ने कई गलत ख़बरें भी प्रकाशित की। यह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरे पहलू में सैकड़ों पत्रकार देश और समाज के लिए अपनी जान भी जोखिम में डाल रहे हैं।

आज कई इलाकों में सशस्त्र टकराव की स्थिति बनी हुई है। इससे निपटने के लिए प्रायः पुलिस, अर्ध सैन्य बलों तथा सेना की तैनाती की मांग उठती रहती है। छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, बिहार आदि समेत एक दर्जन राज्यों में लगभग 127 जिले नक़्सलवाद की चपेट में आ गए हैं। इनमें भी 9 राज्यों के 76 जिलों की हालत अत्यंत गंभीर बनी हुई है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत 14 राज्य सांप्रदायिक दृष्टिकोण से संवेदनशील हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जातीय सेनाओं का गठन और राजनीतिक दलों में गिरोहबंदी का गठन हो चुका है। और इस तरह के गठनों ने कई नरसंहार को अंज़ाम भी दिया है।

हिंदी और भाषाई पत्रकारों को ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक तरफ तो वे आंतकियों या असामाजिक तत्वों के हत्थे चढ़ते हैं, तो दूसरी तरफ मानव अधिकार उल्लंघन जैसे मुद्दों में रिपोर्ट प्रकाशित करने पर सुरक्षा बलों की भी नराज़गी मोल लेनी पड़ती है। ऐसा प्रतीत होता है कि पत्रकारों को पुलिस के अधिकारियों और जवानों ने अपनी राह का रोड़ा मान लिया है। कई बार तो सामान्य जानकारियों को शासकीय गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर सूचना देने से मना कर दिया जाता है। लोगों में ऐसी धारणा है कि अधिकांशतः पुलिस द्वारा ही मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है। यदि पत्रकार उचित तथ्यों के साथ उजागर करते हैं, तो उन्हें उग्रवादी गुटों का समर्थक बताकर नाहक ही परेशान किया जाता रहा है। सन् 1993 में भारतीय सेना मुख्यालय में मानवाधिकार प्रकोष्ठ का गठन किया गया था, और सैनिकों को, खासतौर पर मानवाधिकारों के लिए क्या करें?, क्या न करें? की सूची भी प्रदान की गई थी। फिर भी, मानव अधिकार हनन और उल्लंघन के मामले प्रकाश में आते ही रहते हैं। यदि मीडिया द्वारा ऐसे मामलों को प्रकाश में लाने की कोशिश की जाती है, तो सुरक्षा बलों के कई अधिकारी उन्हें परेशान करते हैं।

यह कटु सत्य है कि देश के सभी हिस्सों में पुलिस के साथ प्रेस का संबंध तनाव पूर्ण रहा है। पुलिस की अकर्मठता, निष्क्रियता, बलात्कार, नरसंहार और खराब कानून व्यवस्था आदि के बारे में जब पत्रकार लिखते हैं, तो वे पुलिस के बड़े अधिकारियों की आंख में किरकिरी बनने लगते हैं। मानवाधिकारों के संरक्षण का पूरा दायित्व पुलिस पर भी है। पुलिस के पास कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए गिरफ़्तार करने, तलाशी लेने, समान जब्त करने, अदालत में फौजदारी जैसे मामलों को दायर करने के अधिकार हैं। परंतु, विडंबना है कि जिसके पास मानवाधिकारों की रक्षा का भार है अधिकतर उसी के द्वारा ही उसका का गला घोंटा जा रहा है।

मानव अधिकार आयोग तथा आम कार्यकत्र्ताओं के लिए यह चिंता का विषय बना हुआ है कि तमाम प्रयासों के बाद भी पुलिस की मनमानी पर लगाम नहीं लग पा रहा है। भारत में सबसे अधिक मानवाधिकार हनन के मामले पुलिस हिरासत में ही होते हैं। पुलिस हिरासत में कैदियों की मौतें, महिला कैदियों तथा बच्चों के यौन-उत्पीड़न की घटनाएं, समय-समय पर प्रकाश में आती रहती हैं। अधिकांश राज्य के थानों में प्राथमिकी दर्ज कराना भी बड़ी मुश्किल का काम है। इसका कारण यह है कि प्रभारी अपने इलाकों के अपराध की दरों को कम दिखाना चाहते हैं। इसके चलते मीडिया और पुलिस के मध्य जगह-जगह तनाव के मोर्चे खुल गये हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के गठन से पूर्व तो अधिकतर जेलों की दयनीय दशा की जानकारी कभी-कभी मिलती थी। हालांकि, आयोग के गठन के बाद मीडिया और जेलतंत्र के बीच संवाद का अभाव अब भी बना हुआ है। परिणामस्वरूप मानवाधिकार हनन की ख़बरें प्रकाश में नहीं आ पाती हैं।

एक सच बलात्कार से जुड़ी श्रेणियों का भी है। मीडिया में बलात्कार की कवरेज पीड़िता की क्लास (निम्न, मध्य या उच्च वर्ग), जगह (स्लम, पॉश या मध्यम वर्गीय), पारिवारिक पृष्ठभूमि, शहर, शैक्षिक योग्यता आदि के आधार पर जगह और प्राथमिकता पाती है। इसके अलावा आरोपी की पृष्ठभूमि भी काफी मायने रखती है। कहना गलत न होगा कि बलात्कार जब तक ठोस ख़बर की वजह नहीं बनता, वह मीडिया की नज़रों से अछूता रहता है। और, कई बार तो वह न्याय पाने में भी पिछड़ जाता है। ऐसे तमाम बलात्कार, जो कि मीडिया को किसी भी तरह से कौतूहल बनाने लायक लगते रहे हैं, की कवरेज भरपूर रस के साथ की जाती रही है। मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज का बलात्कार मामला (15 नवंबर, 2002) मध्यम वर्गीय पढ़ी-लिखी युवती का था, जिसमें बलात्कार पुलिस मुख्यालय के एकदम करीब हुआ था। दिल्ली में ही राष्ट्रपति के सुरक्षा गार्डो ने जब बुद्धा गार्डेन में एक युवती से बलात्कार किया (6 अक्टूबर, 2003), तो उसे मीडिया ने खूब जगह दी। यह मामला भी कुछ ही घंटों में सुलझा लिया गया। इसी तरह जयपुर में एक विदेशी महिला के बलात्कार के मामले पर तो ‘फास्ट कोर्ट’ का ही गठन कर दिया जाता है, और अपराधियों को चुटकियों में सज़ा दे दी जाती है। लेकिन, दूसरी तरफ गरीब बस्तियों में होने वाले बलात्कार बमुश्किल दो कॉलम की ख़बर बन पाते हैं। एक तो मीडिया इन्हें ‘खास’ नहीं मानता और दूसरे, इसमें चटखारे लेने लायक कुछ नहीं होता। वैसे भी, मीडिया ऐसे वर्ग से जुड़े लोगों को कवर करने में दिलचस्पी लेता है, जिससे वह खुद का जुड़ाव महसूस करता हो। चूंकि, मीडिया में एक बड़ी हिस्सेदारी मध्यम या उच्च वर्ग के पत्रकारों की है, अतः इसी श्रेणी से कवरेज अपेक्षाकृत ज्यादा तवज्ज़ो भी पाती है। मीडिया के इस रवैये को अब पुलिस भी पहचानने लगी है। यही वजह है कि निम्न वर्ग पर हुए आपराधिक मामले आज भी थानों में आसानी से दर्ज नहीं हो पाते। अगर दर्ज होते भी हैं, तो बड़े सच को छोटे में तब्दील कर दिया जाता है। यहां बलात्कार को अक्सर ‘छेड़छाड़’ का मामला बना दिया जाता है।

अपराध की हर पल की रिपोर्ट से भले ही पुलिस पर अतिरिक्त दबाव पड़ जाए, लेकिन इस वजह से कई बार या तो सही अपराधी पकड़ में नहीं आता या फिर उसे अपनी बात कहने का पूरा मौका नहीं मिला पाता। साथ-ही-साथ मामला आनन-फानन में सुलझा हुआ दिखा दिया जाता है। बाद में न्यायिक प्रक्रिया भी कई बार मीडिया रिपोर्ट से प्रभावित होती दिखाई देती है।

वैसे इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि मीडिया का महिला अपराध के प्रति शुरू से ही भेदभाव पूर्ण नज़रिया रहा है। पुरूष द्वारा किसी महिला का यौन-शोषण होना कोई बड़ा व तीखा सवाल खड़ा नहीं करता। लेकिन, महिला अगर पुरूष पर हमला कर देती है, तो यह ‘मेन बाइट्स डॉग’ की तरह देखा जाता है। यह दिलचस्प है कि पूरी दुनिया में मुख्यधारा की मीडिया में इस तरह की मानसिकता रही है।
 

Friday, November 4, 2011

इरोम बचाओं, सशस्‍त्र बल अधिनिम हटाओं

            5 नवम्बंर, 2011 पूरे 11 साल हो चुके हैं, एक महिला को अनशन पर बैठे हुए। हम और हमारा सभ्यं समाज, देश मौन होकर तमाशवीन की भांति तमाशा देख रहा है। मैं उन लोगों को बता दूं जो इनके बारे में नहीं जानते। जी हां मैं इरोम शर्मिला चानू की ही बात कर रहा हूं। जो अपने समाज के अधिकारों की लड़ाई के लिए पिछले 11 साल से लगातार अनशन पर बैठी है। जिसने अपने जीवन के अमूल पल सरकार द्वारा थोपे गये कानून सशक्त बल विशेषाधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) के लिये गंवा दिये।

अगर पूरे मामले पर विस्तार से गौर किया जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सबके सामने आ जाएगी कि जब से सरकार द्वारा मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून पारित किया गया. और जिसका फायदा उठाकर सशस्त्र बलों ने 12 लोगों को दिन दहाड़े गोलियों से भून दिया. यह एक घटना नहीं थी बल्कि ऐसी बहुत-सी मानवाधिकार हनन की घटनायें आये दिन मणिपुर में होती रहती हैं; इसी के विरोध में 5 नवम्बर, 2000 से इरोम शर्मिला अनशन पर बैठी हैं। वो चाहती हैं कि मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (ए.एफ.एस.पी.ऐ.) को हटा दिया जाए. जिसके तहत अशांत घोषित क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को सरकार द्वारा विशेष शक्तियां प्रदान की गई हैं। जिसका फायदा सशस्त्रि बल आये दिन उठाते रहते हैं। सरकार द्वारा इन सेना बलों को कुछ ऐसे विशेष अधिकार प्रदान किये गये हैं  जो राज्यन सरकार द्वारा पारित कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं भले ही इसमें किसी की जान क्यों न चली जाए. इसका परिणाम यह है कि सैनिक दल इसका दरूपयोग करते हैं. और इस कानून की आड़ में हत्या, बलात्कार, र्टाचर, गायब कर देना और गलत गिरफतारी जैसे कार्य सशक्त बलों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं.

मेरे जहन में यह सब देखकर एक बात बार-बार कौंधती है कि क्या हमारा देश वाकैई में आजाद है। या फिर आजाद भारत का एक राज्य अब भी गुलामों की जिंदगी बसर कर रहा है। जहां अंग्रेजों की जगह हमारे सैनिकों ने ले ली है। जो आये दिन मणिपुर की जनता के साथ बर्बरतापूर्ण कार्यवाहियों को अंजाम देते रहते हैं। क्या कारण है कि 58 सालों से अब भी वहां पर सशस्त्र बलों का जमावड़ा लगा हुआ है, जो दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है।

मैं और शायद मेरे जैसे हजारों लोगों तत्कालीन व वर्तमान सरकार साथ-ही-साथ कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ये यह प्रश्ना पूछ रहे हैं कि वो कौन-से कारण हैं जिस कारण से अब भी सशस्त्र बल वहां पर तैनात हैं। जिसको अभी तक नहीं हटाया गया। उसी के विरोध में पिछले 11 सालों से अपनी जिंदगी व अधिकारों की लड़ाई को लड़ती इरोम शर्मिला, जिसकी सुध-बुध आज तक किसी सरकार ने नहीं ली और न ही किसी सरकार ने इस बात पर विचार किया कि सशस्त्र बलों की तैनाती अभी भी वहां पर क्यों है। इसे क्या हम सरकार की मिलभगत कहे या फिर लाचारी, जिस कारण से सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही है और मणिपुर की जनता को इस तरह के अत्याचार की आग में झोंक रही है।

आज मैं पूरे देशवासियों से यह आवहान करता हूं कि इरोम शर्मिला का साथ दें, और मणिपुर में लागू विशेष सशस्त्र बल अधिनियम को हटाने के लिये सरकार से मांग करें। क्योंकि हमें खुश होने की जरूरत नहीं है ये सरकार गद्दी की आड़ में कही भी ऐसा मंजर करवा सकती है। हम सभी को जागने की जरूरत है नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे देश के अधिकांश राज्यों में मणिपुर जैसा मंजर दिखेगा।

Sunday, October 23, 2011

कांग्रेसी चुनावी जीत का इतिहास


कांग्रेसी चुनावी जीत का इतिहास

लोकतांत्रिक प्रणाली में जीत सतत सावधानी] सतत मेहनत और लोक कसौटी पर खरे उतरने से मिलती है। इसके बावजूद अगर हम कांग्रेस की चुनावी जीत का इतिहास पलटेंगे तो तसवीर खुद-व-खुद साफ होती नजर आयेगी कि सीटों की संख्या सरकार बना तो देती है, सरकार टिकाना उसमें एकदम भिन्न बात होती है।

सन् 1951 के समय से गौर करें तो जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस को 44.0 फीसदसी वोट से 364 सीटें मिली थीं। यह आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू का सबसे मोहक व चमकीला सर्वण दौर था। इसके बावजूद भी कांग्रेस 50 फीसदी मत भी न ला सकी, जबकि लोकतंत्र बहुमत की बात करता है और बहुमत का मतलब है 51 फीसदी मत मिलना। जो कांग्रेस को आज तक नहीं मिलें।

संपूर्ण चुनाव का विश्लेषण करें तो सन् 1957 में 47.788 फीसदी मत से कांग्रेस को मिलीं 371 सीटें। सन् 1962 में यह आंकड़ा 44.72 फीसदी के हिसाब से 361 सीटें। यह जवाहर काल का अंत था। इसके बाद सन् 1967 में कांग्रेस को 40.78 फीसदी मत से 283 सीटें ही मिल सकी। सन् 1971 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस तोड़ने का दांव खेला और अपने बल पर 43.68 फीसदी मत से 352 सीटें बटोर लायी। यह करीब-करीब जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष का प्रदर्शन था। इसके बाद जो हुआ सब जानते हैं कि किसी प्रकार इंदिरा जी ने अपनी मनमानी का राजनीतिक खेल खेला। जो भारतीय परिदृश्य में पहले कभी नहीं देखा गया। सन् 1973-74 को 352 बहुमत वाली सरकार धराशायी हो गयी। सन् 1977 के चुनाव में सब कुछ गवां कर कांग्रेस ने 34.52 फीसदी मतों से 154 सीटें ही ला सकीं। 352 सीटों वाली कांग्रेस जो पाठ नहीं पढ़ सकी, जनता पार्टी के मोरारजी देसाई भी नहीं पढ़ सकें और 1980 को फिर से चुनाव हुआ। 1977 के परिणाम के मुगालते में रहने वाली जनता पार्टी इस बार ऐसी पिटी की पार्टी जैसी उसकी कोई हैसियत नहीं बची और इंदिरा गांधी 42.69 फीसदी मत से 353 सीटें पा गई।

इसके बाद सन् 1984 को हुई इंदिरा गांधी की शर्मनाक हत्या के बाद 1984 में दुवारा चुनाव हुए। जिसमें इंदिरा गांधी के सुपुत्र राजीव गांधी ने 49.01 फीसदी मतों से 404 सीटों पर अपार बहुमत जुटा लिया। यह पहला अवसर था कि जब कोई पार्टी करीब-करीब 50 फीसदी जैसा समर्थन जुटाने में कामयाब हो सकी। लेकिन 404 सीटों वाली राजीव गांधी की सरकार 1989 में हुए चुनाव के बाद 39.33 फीसदी यानी 197 सीटें ही जुटा सकी तथा गिरने से खुद को नहीं रोक सकी। 1991 में फिर राजीव गांधी की हत्या की लहर पर कांग्रेस सवार हुई तो 35.66 फीसदी मतों से 266 सीटें जमा कर ले गई। 1996 से 2004 तक कांग्रेस 144 से 145 सीटों के बीच में घूमती रही। 1991 के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस ने 200 सीटों की सीमा पर की है।

यह आंकडे बताते हैं कि सीटों की संख्या से सरकार की ताकत नहीं मापी जा सकती है। लोकतंत्र में आप आंकड़ों से जीतते हैं लेकिन आंकड़ों से जीत नहीं हैं। सवाल तो अब आगे खड़ा होता है कि भ्रष्टाचार और मंहगाई की मार झेल चुकी जनता आने वाले चुनाव में कांग्रेस को फिर से सरकार के रूप में चाहेंगी या फिर एक बार फिर से कांग्रेस को मुंह की खानी पडे़गी यह मेरे लिए एक शोध का विषय और कांग्रेस सरकार के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

सभार
सबलोग] जुलाई] 2009

Thursday, October 20, 2011

मीडियानेट व प्राइवेट ट्रिटीज का मामला


                       मीडियानेट व प्राइवेट ट्रिटीज का मामला

यह कहा जा सकता है कि मुनाफे के पीछे भागने के कारण कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के उंचे सिद्धांतों व अच्छे कामकाज की शैली की बलि चढ़ा दी है। कुछ समस पहले तक इस तरह की चीजों में सिर्फ कुछ लोग लिप्त पाए जाते थे, जैसे कि रिपोर्टर व संवाददाताओं को नगद या अन्य तरह से लुभाया जाता था। उन्हें देश-विदेश में किसी कंपनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबरें छापने पर पैसा मिलता था पर हाल में ये सारी चीजें नियम न होकर अपवाद की तरह ही थीं। इस तरह की खबरें संदिग्ध समझी जाती थीं क्योंकि भले ही खबर पूरी तरह सही व वस्तुनिष्ठ होने का दावा करे पर जिस अंदाज से घटनाओं या व्यक्तियों के बारे में चापलूसी की जाती थी, वह आसानी से पकड़ में आ जाती थी। पत्रकारों की बाइलाइन सबसे उपर प्रमुखता से छपती थी। पर धीरे-धीरे इस तरह के निजी विचलनों ने संस्थागत रूप धारण कर लिया।

1980 के दशक में जब टाइम्स‍ ऑफ इंडिया समूह की पत्र-पत्रकाओं का प्रकाशन करने वाली कंपनी बेनेट कोलमैन कंपनी लिमिटेड (बीसीसीएल) में समीर जैन एक्जी्क्यूटिव हेड बने तभी से भारतीय मीडिया के कामकाज की शैली व नियमों में बदलाव आने शुरू हो गए। मूल्यों को तय करने में गलाकाट प्रतियोगिता के अलावा बीसीसीएल को देश का सबसे अधिक मुनाफे वाला मीडिया समूह बनाने के लिए मार्केटिंग का सबसे ज्यादा रचनात्मक इस्तेमाल किया गया। अब यह अन्य सभी प्रकाशन उद्योगों की कुल आय की तुलना में अधिक मुनाफा कमाता है, हालांकि एक कार्पोरेट समूह के रूप में स्टार ग्रुप ने हाल के वर्षों में अधिक मात्रा में सालाना कारोबार किया है।

मीडिया के क्षेत्र में आगे चलकर जिस चीज ने काफी खलबली पैदा की, वह था 2003 में बीसीसीएल द्वारा पैसे के बदले प्रकाशन यानी पेड कंटेंट की मीडियानेट नाम से सेवाएं आरंभ करना। इसके तहत पैसों के बदले पत्रकारों को किसी प्रोडक्ट के लांच या व्यक्ति से संबंधी कार्यक्रमों व घटनाओं को कवर करने के लिए भेजने का खुला प्रस्ताव दिया गया। जब दूसरे अखबारों ने इस तरह की गतिविधियों से पत्रकारिता के उसूलों के उल्‍लंघन का सवाल उठाया तो बीसीसीएल के अधिकारियों व मालिकों ने तर्क दिया कि इस तरह के एडवरटोरियल्स टाइम्स ऑफ इंडिया में नहीं छप रहे हैं। केवल वे शहरों के रंगीन स्थानीय पेजों के लिए हैं जिसमें ठोस खबरों के प्रकाशन के स्थान पर समाज की हल्की-फुल्की मनोरंजक बातों के बारे में सामग्री प्रकाशित की जाती है। यह भी कहा गया कि अगर जनसंपर्क से जुड़ी एजेंसियां पहले ही अपने ग्राहकों के बारे में खबरें छपवाने के लिए पत्रकारों को रिश्वत दे रही हैं तब इस तरह की एजेंसियों जैसे बिचौलियों के खत्म करने में क्या बुराई है।

मीडियानेट के अलावा बीसीसीएल ने एक और नए तरह की मार्केटिंग व जनसंपर्क की रणनीति ईजाद की। 2005 में वीडियोकॉन इंडिया और कायनेटिक मोटर्स समेत 10 कंपनियों ने बीसीसीएल को अघोषित कीमत वाले इक्विटी शेयर प्रदान किए ताकि उन्हें बीसीसीएल द्वारा संचालित मीडिया के विभिन्न प्रकाशनों में विज्ञापन के लिए जगह मिल सके। इस योजना की सफलता ने बीसीसीएल को भारत के सबसे बड़े निजी इक्टिवी निवेशकों में बदल दिया। 2007 के अंत में इस मीडिया कंपनी ने अन्य क्षेत्रों समेत उडान, खुदरा बाजार, मनोरंजन, मीडिया आदि क्षेत्रों की 140 कंपनियों में निवेश का दावा किया जिसकी कीमत 1500 रूपये के करीब थी। बीसीसीएल के एक प्रतिनिधि (एस.शिवकुमार) द्वारा जुलाई, 2008 को एक वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यू के मुताबिक कंपनी के साथ 175 से 200 के बीच निजी समझौतें (प्राइवेट ट्रीटी) वाले ग्राहक जुड़े हुए हैं और उनके साथ 15 से 20 करोड़ रूपये वाले समझौते किए गए हैं। इस तरह कुछ निवेश 2600 करोड़ रूपए से लेकर 4000 करोड़ रूपए तक का किया गया है।

यह अलग बात है कि 2008 में स्टाक मार्केट के धराशायी होने के फलस्व़रूप बीसीसीएल द्वारा किए गए निजी समझौतों के उद्देश्यों की हवा निकल गई। बीसीसीएल द्वारा खरीदे गए विभिन्न‍ कंपनियों के शेयरों की कीमतें गिर गईं, उसके बावजूद मीडिया कंपनी को विज्ञापन की जगह देने के पुराने समझौते को पूरा करना पड़ा, वह भी शेयरों की पुरानी उंची कीमतों पर और उसे आमदनी में भी दिखाना पड़ा जिस पर टेक्स भी चुकाना पड़ता है।

निजी समझौतों की इस योजना का उद्देश्य टाइम्स ऑफ इंडिया में विज्ञापन की प्रतिस्पर्धा को कमजोर करना था, पर बाद में कई दूसरे अखबारों व टीवी चैनलों ने भी इसी योजना को आरंभ कर दिया। बीसीसीएल द्वारा शुरू की गई निजी समझौतों की योजना में इक्विटी निवेश के बदले निजी कंपनियों व विज्ञापनदाताओं के लिए विज्ञापन प्रसारित किए जाते थे, हालांकि कंपनी के अधिकारी इस बात से इंकार करते हैं कि निजी समझौते करने वाली कंपनियों व ग्राहकों के बारे में प्रशंसापूर्ण खबरें छापी जाती हैं या उनके बारे में आलोचना को छापने से रोका जाता है।

पर भले ही बीसीसीएल के प्रतिनिधि अपनी पत्र-पत्रकाओं व चैनलों में पैसे लेकर अनुकूल खबरें छापने व दिखाने की बात का खंडन करें पर सच यह है कि खबरों से जुड़ी ईमानदारी व निष्पक्षता में समझौता किया गया है। 4 दिसंबर, 2009 को इकोनामिक टाइम्स व टाइम्स ऑफ इंडिया में निजी समझौतों (प्राइवेट ट्रिटीज) की सफलता पर जश्न मानते हुए आधार पेज के रंगीन विज्ञापन छपे, ‘हाउ टू परफार्म द ग्रेट इंडियन रोप ट्रिक’ जिसमें पेंटालून का खास उदाहरण दिया गया। जो बताने की कोशिश की जा रही थी, वह यह थी कि टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के साथ पेंटालून की रणनीतिक साझेदारी ने किस प्रकार से लाभ पहुंचाया है। विज्ञापन के मुताबिक, मीडिया हाउस के लाभ के तौर पर टाइम्सन प्राइवेट ट्रिटीज (टीपीटी) अपने साझीदार पर आर्थिक बोझ कम करते हुए निवेशक की चिर-परिचित भूमिका से बाहर निकल गया। ऐसा इसलिए भी हुआ क्यों कि भारत के सबसे आगे रहने वाले मीडिया घराने के पास विज्ञापन की अतुलनीय ताकत है। जब पेंटालून का तेजी से विकास हुआ, टाइम्सी प्राइवेट ट्रिटीज ने भी पूरी कोशिश की कि उसे विज्ञापनों के लिए अखबार में पूरा स्पेस मिले। टीपीटी ने इसके लिए बेहतर शब्द  इजाद किया, ‘बिजनेस सेंस’।

कई मीडिया संगठनों में खबर को विज्ञापनों से अलगाने के लिए एडवरटोरियल या एडवरटीजमेंट जैसे शब्दी इस्तेमाल किए जाते हैं। विज्ञापनों के लिए अलग किस्म के फांट व फांट साइज, उनके चारों ओर लकीरें खींचने या स्पांसर्ड फीचर अथवा विज्ञापन में कहीं कोने में एडीवीटी जैसे शब्द बहुत छोटे आकार में लिखने का काम किया जाता है जो कई बार पाठकों की निगाह में पड़ता है और कई बार नहीं। जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया के सिटी सप्लीमेंट के तौर पर छापने वाले दिल्ली टाइम्स के त्वंचा की देखभाल वाले प्रोडक्ट ओले के बारे में एक साल तक छपी स्टोरी अपने सारे खंडन या अखबार के द्वारा किए इंकार के बावजूद पेड न्यूज की ही श्रेणी में आती है। बीसीसीएल के प्रतिनिधि प्राय: यह कहते हैं कि कंपनी की प्राइवेट ट्रिटीज स्कीम किसी भी सार्वजनिक जांच के लिए खुली हुई है, क्योंकि जिन कंपनियों में बीसीसीएल की भागीदारी है, वह सब कुछ सार्वजनिक ही है और उसका अपनी वेबसाइट में उल्लेख है। पर बहस व विवाद का कारण कुछ और है। वह यह कि ये सभी कंपनियां अखबार में छपने वाली सामग्री को प्रभावित करती हैं।

इसी तरह सीएनएन-आईबीएन टीवी न्यू्ज चैनल पर प्रसारित रेजर ब्लेड बनाने वाली कंपनी जिलेट का विज्ञापन अभियान-वार अगेंस्टू लेजी स्टरबल में फीचर कथाएं व नामचीन हस्तियों के साक्षात्कार दिखाए गए। इसके अलावा इस मुद्दे पर पैनल की बहस आयोजित की गई कि मर्दों को शेव करना चाहिए या नहीं और इस निष्कुर्ष को पहले से इस बहस में केंद्र में रखा गया कि भारतीय स्त्रियां क्लीन शेव मर्दों को ज्यादा पसंद करती हैं। यह दावा किया गया कि जिलेट व सीएनएन-आईबीएन की साझेदारी दोनों के लिए लाभप्रद है। एडवरटोरियल से जुड़े ऐसे अन्य कई उदाहरण और भी हैं।

Tuesday, October 18, 2011

मीडिया परहेज करें अपराध खबरों से

मैं कोई नई विधा नहीं बता रहा हूँ जैसा सभी जानते हैं कि भारत सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक देश है। जहां सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं। इसके बावजूद यह अनेक विवादों और समस्याओं से लबालब भरा हुआ है और भरता ही जा रहा है। जिस हम मीडिया में आसानी से देख सकते हैं। वैसे मीडिया में आपराधिक कार्यक्रमों की बाढ़-सी आ गयी है। वह लगातार बढ़-चढ़कर उसका कवरेज कर रहा है। मीडिया ने अपने कार्यक्रमों के माध्यकम से क्षेत्रीय, धार्मिक, जा‍तीय एवं भाषाई विवादों का भी निर्माण किया है जिसमें अनेक संवेदनशील मुददों पर गंभीरतापूर्वक बहस को भी स्थान दिया है़ जो कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी रूप में सामाजिक सरोकरों से हमारा परिचय करवाती है। इन सामाजिक सरोकार के साथ-साथ मीडिया जन समस्याओं और आम लोगों की दु:ख-तकलीफों, उत्पीड़न, शोषण, प्रशासनिक बेरूखी और लापरवाही देह व्या‍पार एवं अंधविश्वास की समस्याओं से भी रू-ब-रू कराते रहते हैं। जो कहीं-न-कहीं किसी रूप में समाज में होने वाली अपराध घटनाओं को कम करने में सहायक सिद्ध होती हैं। इस आलोच्य में मीडिया से हम लोकतांत्रिक होने की आशा करते हैं। जो समाज में मौजूद विवधाओं के बावजूद एक लोकतांत्रिक समाज बनाने मदद करता है।

आम तौर पर देखा जाए तो जिस तरह से मीडिया कार्यक्रमों में निरंतर बदलाव हो रहें हैं जिस कारण से एक नई संस्कृति का उदभव हो रहा है। इस नई संस्कृति को भविष्य में होने वाले विनाशक के रूप में देखा जा सकता है। मीडिया विशेषज्ञों का मत है कि भारतीय मीडिया में नित्य नये प्रयोग किया जा रहे हैं। अगर हम संपूर्ण देश की तुलना भारतीय मीडिया से करें तो इतने समाचार चैनल वो भी एक भाषा में कहीं नहीं चल रहे होंगे। एक भाषा में चलने की वजह से मीडिया में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ है। जो समय के साथ-साथ निरंतर गहरी होती जा रही है। इस प्रतिस्पर्द्धा के फलस्वरूप हर चैनल अलग दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है। आज के आधुनिक जीवन में फेशन और क्राइम बड़ी खबरों के रूप में उभरकर सामने आयी हैं। सेलीब्रिटी आज एंकर बन गये हैं। जो पत्रकारिता में निरंतर बदलाव करने पर अमादा हैं। वर्तमान में मीडिया द्वारा खबरों को नये ढ़ग से परोसने का काम रहा है। जो मीडिया का अभिन्न अंग बन गया है। हालांकि मीडिया आज सच्चाई को या यर्थाथ को दिखाने से पहरेज करता रहता है वह केवल चटपटा मसाला और कंटेट को मिक्स कर खबरों का निर्माण कर रहा है। वह यह कहने से नहीं चूकता कि जो बिकता है उसी को परोसा जा रहा है। इसे हम बाजार की मांग भी कह सकते हैं।

इसके अनेकों उदाहरण हमारे आंखों के सामने से प्रतिदिन गुजरते रहते हैं जैसे राखी मीका का विवाद या मटुकनाथ का प्रेम प्रसंग। इन खबरों पर मीडिया ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और समाज के सामने परोस दिया। जिसे हम खबर कहे या एक संकट। जो हमारे लिए चितंन-मनन का विषय बना हुआ है। यह कहने में कोई दोराह नहीं होना चाहिए कि मीडिया दिनभर कचरा परोसता रहता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मीडिया अपराध से संबंधित खबरों व कार्यक्रमों पर जोर देने में लगा हुआ है जिसका ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। दिनप्रति अपराधों से संबंधित खबरें देख-देखकर दर्शक उबने लगे हैं। यह कहना गलन न होगा कि निजी चैनल लड़कपन से निकलकर परिपक्य युवा हुआ है जिसे समझदार होने में समय लग सकता है। यह मीडिया के लिए बदलाव का दौर है इसमें सबकुछ जायज है। इस सबकुछ के चलते मीडिया से कंटेट ही गायब हो गया है। बिना कंटेट की खबरें और बदलते वक्त से मुखातिक होने के कारण समाज का नजरिया भी बदल गया है और 24 घंटे अपराधों को दिखाने के कारण समाज के सभी वर्गों पर एक बुरा प्रभाव देखने को मिल रहा है। क्योंकि जिस तरह से मीडिया नई तकनीक का सहारा लेकर अपराध से संबंधित खबरों को दिखा रहा है वो हमारे दिलों-दिमाग में जल्दी ही अपनी पैठ बना लेती है जिससे हमारे अंदर भी अपराध करने की प्रवृति पनपने लगती है। जो समाज और आने वाली पीढ़ी के हित में नहीं है। मीडिया को चाहिए कि अपराध खबरों को सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर दिखाना चाहिए न कि अपने हितों को।

Thursday, October 13, 2011

तत्काल की दुनिया

                                                                    तत्काल की दुनिया

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दुनिया कहा से कहा पहुंचती जा रही है। हम कह सकते है कि चांद तक पहुंच चुकी है। पर चांद तक पहुंच के हम क्या करेंगे, ये किसी ने नहीं सोचा। शायद तब तक हमारा बजूद ही न रहे। परंतु पहले ऐसा नहीं था, सभी का बजूद होता था, लोग दिन-रात मेहनत करते थे और लंबी उम्र तक जीवित रहते थे। वो बीमार होते थे और बिना दवाईयों के जल्द ही स्वस्‍थ्‍य भी हो जाते थे। लेकिन आज के भागमभाग की दुनिया में ऐसा देखने को नहीं मिलता। आज की संस्कृति में लोग तत्काल के पीछे दौड़ रहे हैं। रेल व हवाई यात्रा के आरक्षण के लिए तत्काल, कहीं का प्रोग्राम बने तत्काल, किसी से प्यार हो तत्काल, प्यार के बाद रिश्ते बने और फिर बनके बिगड़ जाए तत्काल, स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई तत्काल, कोई काम करना हो तो पैसे दो तत्काल, नेताओं को चुनाव के समय वोट चाहिए तत्काल, किसी बीमारी को ठीक करना हो तो डॉक्टर के पास जाओं तत्काल, एडस चाहिए तो बिना कंडोम के सेक्स करो तत्काल, जेल की हवा खानी हो तो अपराध करो तत्काल, जुर्म करके साफ निकल जाना हो तो जर्ज को खरीदो तत्काल, गरीबों का खून चूसना हो तो नेता बनो तत्काल, घोटाले करना हो तो ए राजा बनो तत्काल, समाज से भ्रष्टाचार मिटाना हो तो अन्ना हजारे बनो तत्काल, मरने के पहले अपनी प्रतीमा बनानी हो तो मायावती बनो तत्काल, मीडिया को बेचना हो तो प्रभु चावला बनो तत्काल, भारत में जुर्म फैलाना हो तो दाउद बनो तत्काल, परीक्षा में पास होना हो तो मुन्ना भाई बनो तत्काल, पढ़ाई पूरी हो चुकी है नौकरी चाहिए तत्काल, पता करना हो पेट में लड़का है या लड़की अल्ट्रा्साउड करवाओं तत्काल और बहुत से ऐसे काम जो तत्काल में किए जाते हैं या कर सकते हैं या हो रहे हैं।

ये तत्काल की दुनिया भी अजीबों-गरीब है। जिसको देख भाग रहा है तत्काल के पीछे। और भाग-भागकर खुद के वो सुखद पल जिनको वो जिया करता था, कब दुखद पल में तबदील हो गये हैं पता ही नहीं चला। अगर इसी तरह तत्काल के पीछे दौड़ते रहे तो ऐसा न हो एक दिन खुद तत्काल बनकर इस दुनिया से ही रूखसत हो जाओ और तुमको पता ही न चले तत्काल।